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क्लाईमेट चैंज से जूझता विश्व

 



साथियों! इस समय क्लाईमेट चैंज यानि जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख वैश्विक मुद्दा बना हुआ है। बता दें कि जलवायु परिवर्तन का अर्थ है कि तापमान और मौसम की निश्चित रूपरेखा में अनिश्चितकालीन त्वरित गति से आये बदलाव, से है। पहले यह बदलाव प्राकृतिक हुआ करते थे पर अब लगभग 1800 के दशक से, मानव की अंतरिक्ष चीरती महत्वाकांक्षाएं, पीड़ादायी जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण रहीं हैं।


बता दें कि हाल ही में क्लाईमेट चैंज पर मान. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विचार साझा करते हुए कहा है कि गरीब देशों के लोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले पर्यावरण प्रभावों से 'भारी कीमत' चुकाने जा रहे हैं। प्रकृति से सम्मान के साथ व्यवहार करना हमारा ना केवल नैतिक दायित्व है, बल्कि हमारे अपने अस्तित्व के लिए भी आवश्यक है। हमें न्याय की धारणा का विस्तार करने के प्रयास करने ही होगें।

आज हमारा महान भारत देश, प्रधानमंत्री मोदी जी की समभाव से बढ़ते प्रभाव की वैश्विक नीतियों के फलस्वरूप  जी-20 के मुखिया के रूप में विराजित है। जिसने पहले ही क्लाइमेट चैंज से जूझते विश्व को जगाने और इस मुद्दे की तरफ़ गम्भीरता से कदम बढ़ाने हेतु मिशन लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर एन्वायर्नमेंट) की शुरुआत की है। मतलब, लाइफस्टाइल और दूसरा एन्वॉयर्नमेंट।इस मिशन को लागू करने का सीधा लक्ष्य जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने की कोशिश है।इसके लिए तीन नियम बनाए गए हैं-रिड्यूज, रीयूज और रिसायकल।यानी बेवजह की चीजों को रिड्यूज करना।चीजों को दोबारा इस्तेमाल करना और कचरा घटाने के लिए उसे रिसायकल करना। इस मिशन का लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन को घटाने का है।इसके अलावा स्मार्ट सिटीज़ असेसमेंट फ्रेमवर्क शुरू कर दिया है, जो शहरों के लिए उनकी वर्तमान जलवायु स्थिति का आकलन करने का एक उपकरण है और भारतीय शहरों को कार्रवाई अपनाने और लागू करने के लिए एक ग्रीन रोडमैप प्रदान करता है। तथा सीओपी में शुरू की गई दो पहलें क्रमशः - एक अभियान और एक चुनौती, यानि प्रत्यक्ष शहरी जनादेश है। द कूल कोएलिशन ने बीट द हीट: नेचर फॉर कूल सिटीज चैलेंज लॉन्च किया, जो शहरों को 2030 तक अपने शहरी क्षेत्रों में प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ाने और 2025 तक ठोस प्रगति वचन नीति है। जिसमें 'रूफ ओवर आवर हेड्स 4 ग्लोबल कैंपेन' था। 

इन सबकी, भारत में सामुदायिक परियोजना प्रयोगशालाओं के साथ शुरुआत की गई। इसका लक्ष्य 2050 तक दो अरब लोगों को लचीला, कम कार्बन और किफायती घर उपलब्ध कराना भी शामिल है। बता दें कि 2022 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाइफस्टाइल फॉर द एनवायरनमेंट की प्रमुख दृष्टि की घोषणा की, जो दुनिया भर में प्रतिमान को विनाशकारी खपत से सचेत करता है। यह व्यक्तिगत कृत्यों, सहयोग और शहरों में एक सामाजिक, राजनीतिक प्रेशर के माध्यम से हो सकता है।जिसमें सिटी क्लाइमेट एलायंस जिसकी 126 से अधिक शहरों में उपस्थिति है और जलवायु कार्रवाई में मांग और आपूर्ति के अंतर को बढ़ावा देने और मिलान करने के लिए 70-विषम जलवायु साझेदार शामिल हैं। बता दें कि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए विकसित देश अब गम्भीर नजर आने लगे हैं। इस बार मिस्र के अंतरराष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन (कॉप-27) में इस बात को महसूस किया गया। दुनिया में जलवायु परिवर्तन की समस्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है वहीं इससे निपटने के  प्रयास में उतना ही जागरूकता का अभाव है

कॉप-27 में, मौसम में अचानक हो रहे बदलाव के कारण आर्थिक रूप से पिछड़े देशों को हुए बृहद नुकसान पर चर्चाएं हुईं और इसकी भरपाई के लिए धन मुहैया कराने समेत अन्य अहम मुद्दों को लेकर सहमति की रस्साकशी ने वैचारिक सत्य को रेखांकित कर दिया कि तथाकथित विकसित देश इस वैश्विक समस्या के प्रति नाटकीय रवैया अपना रहे हैं। बहरहाल,सम्मेलन के समापन पर ‘नुकसान और क्षति’ कोष स्थापित करने पर सहमति भले ही बन गई, लेकिन यह कोष कब तक बनेगा, यह स्पष्ट नहीं हुआ।सम्मेलन में सत्य को स्वीकार किया गया कि पिछले सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए जो संकल्प लिया गया था, वह पूरा नहीं हो सका। इसलिये एक बार फिर सभी 197 देशों ने कार्बन उत्सर्जन प्रक्रिया सुधार हेतु संकल्प लिया है। परन्तु न्यूयॉर्क शहर के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने एक बार प्रसिद्ध रूप से कहा था, "जब देश बात करते हैं, तो अक्सर अपनी ऊँची एड़ी के जूते खींचते हैं तथा शहर अभिनय करते हैं"। यानि जलवायु परिवर्तन एक युद्ध है जिसे शहरों के अपने रवैया या जागरूकता के कारण हारा या जीता जा सकेगा। 

 



बता दें कि क्लाईमेट चैंज के कारण भारतीय उपमहाद्वीप सहित कई यूरोपीय देशों को भयानक गर्मी तथा बाढ़ की मार झेलनी पड़ी है। भारत में ग्लोबल ट्रेम्परेचर के चलते होने वाला विस्थापन पैमाने से अधिक है। बता दें कि दिल्ली-एनसीआर और इसके पड़ोसी राज्यों में पराली आदि कारणों से उठे वायु प्रदूषण का जलवायु परिवर्तन ही कारण है । भारत में जलवायु परिवर्तन पर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फार एनवायरमेंट एंड डवलपमेंट की पूर्व में जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया था कि बाढ़-सूखे के चलते फसलों की तबाही और चक्रवातों के कारण मछली पालन में गिरावट रिकार्ड की गयी । देश के भीतर उत्तराखंड जैसे राज्यों में भू-स्खलन से अनेक लोग अपनी जान गंवाते रहते हैं। 
भू-स्खलन उत्तराखंड एवं हिमाचल जैसे दो राज्यों तक सीमित नहीं बल्कि केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, सिक्किम और पश्चिम बंगाल की पहाड़ियों में भी भारी वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन के चलते लोगों की जानें गवाह रही हैं, इन प्राकृतिक आपदाओं के शिकार साधनहीन नागरिक ही होते हैं, जिससे विस्थापन तेजी से बढ़ा है। देश के महानगर और घनी आबादी वाले शहर गंभीर प्रदूषण के चलते कैंसर जैसी बीमारियों के शिकार हैं। प्रकृति की शांति भंग करने में रूस-यूक्रेन युद्ध की भी प्रमुख भूमिका रही है । इस युद्ध से गैस की सप्लाई में बाधा के कारण कोयला आधारित बिजलीघरों को फिर सक्रिय करना पड़ा। इससे यूरोपीय देशों में मौसम इतना गर्म हुआ कि कई नदियों के पानी का स्तर सूखे में बदल गया। बता दें कि कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दुनियाभर में कोयले का इस्तेमाल घटाने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि इस अनिश्चितकालीन युद्ध ने कोयले का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा दिया।

अब सवाल यह है कि वैश्विक स्तर पर जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य कैसे हासिल हो सकेगा? इसके अलावा मैं स्पष्ट शब्दों में यह कहना चाहती हूँ कि विश्व के किसी भी देशों में होने वाले युद्ध से जन-धन की हानि तो होती ही है साथ में पूरी प्रकृति भी प्रभावित होती है। जिसकी कीमत पूरे विश्व के आर्थिक रूप से गरीब देशों को ज्यादा चुकानी पड़ती है। 

वहीं, अमेरिका, चीन और ब्रिटेन जैसे देश भी कोयले से चलने वाले बिजली घरों को बंद नहीं कर पा रहे। भारत के साथ पाकिस्तान और अफगानिस्तान सहित 11 ऐसे देश हैं जो जलवायु परिवर्तन के लिहाज से चिंताजनक श्रेणी में हैं। बता दें कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। भारत भी चीन के साथ जुड़ इसलिए जाता है क्योंकि इन दोनों ही देशों में उत्सर्जन की मात्रा साल-दर-साल बढ़ रही है। पर हथली पर आम उगाना सम्भव नहीं है कि रातों रात कोयला हटाकर अन्य संसाधन जुटायें, वो भी विकल्प, जो सोच से ज्यादा मंहगे हैं। 

बता दें कि पर्यावरण असंतुलन का बड़ा कारण ग्लोबल वॉर्मिंग भी है जिस कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल कर समुद्र का जलस्तर बढ़ा देते हैं। जिससे समुद्र किनारे बसे अनेक नगरों एवं महानगरों के डूबने का खतरा मंडराने लगता है। दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, असंतुलित पर्यावरण, जलवायु संकट एवं बढ़ते कार्बन उत्सर्जन जैसी चिंताओं से परेशान और प्रभावित है। जिसपर  कॉप-27 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को यहां तक कहना पड़ गया कि हमारी पृथ्वी एक तरह से जलवायु अराजकता की तरफ बढ़ रही है। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि इंसानी सभ्यता के सामने अब सिर्फ ‘सहयोग करने या खत्म हो जाने’ का विकल्प बचा है। अब इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि खतरा कितना बड़ा है। 

इसीलिए, हम सभी देश मिलकर कार्बन उत्सर्जन की रोकथाम के साथ-साथ ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने और जैव विविधता के नुकसान को खत्म करने के प्रयासों को जितना तेज करेंगे, उतना सुखी जीवन जी सकेगें। इसके लिए जलवायु परिवर्तन की दिशा में पूरी संवेदनशीलता के साथ वैश्विक स्तर पर जन जागरूकता हेतु घर-घर वैश्विक महाअभियान चलाने की महती आवश्यकता है। क्योंकि पर्यावरणविद और जलवायु परिवर्तन के जानकारों का कहना है कि इंसान अगर अभी भी न सुधरा तो 21वीं सदी सबसे भयानक इतिहास की साक्षी, सदी साबित होगी। 


_ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 
न्यूज एडीटर सच की दस्तक 






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