बढ़ रहा है शॉर्ट फिल्मों का क्रेज : - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Saturday, August 19, 2017

बढ़ रहा है शॉर्ट फिल्मों का क्रेज :









भारतीय शॉर्ट फिल्मों का सफल कारवां  :


            "समय की मांग है शॉर्ट फिल्में"

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दोस्तों ! हमारे भारत वर्ष और देश- दुनिया का सफल नाटक, चलचित्र और अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप स्थापित हुये सुनहरे जगमगाते 'भारतीय सिनेमा कला जगत' का पूरे सवा सौ वर्ष पुराना महानतम् प्रतिभाशाली और अत्यन्त गौरवशाली इतिहास है | आज उसका चरम सीमा तक विस्तार हो चुका है जिसमें 3डी फिल्मों, नवीन टेक्नोलॉजी पर आधारित ऐक्शन फिल्में, जबरजस्त ऐनीमेशन फिल्में बन रहीं है | हम कह सकते हैं कि आज भी 'सिनेमा' मनोरंजन का पहला लोकप्रिय साधन बना हुआ है | इस क्षेत्र में बेरोजगार प्रतिभावान युवाओं को रोजगार पाने और अपने स्वप्नों को साकार करने की अपार क्षमता और अनंत सम्भावनायें हैं | इस क्षेत्र में कलाकार अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहिचान बना सकता है और अपना मन चाहा मुकाम पा सकता है |
            इस कल्पना की खूबसूरत सुनहरी दुनिया 'सिनेमा' के इतिहास में साथियों ! विश्व की पहली फिल्म 'अरायव्हल ऑफ द ट्रैन' थी | हमारे देश 'हिन्दुस्तान' में  सिनेमा की शुरूवात 7 जुलाई 1886 में मुम्बई के वाटकिंस हॉटल में ल्यूमेरे ब्रदर्स ने 6 शॉर्ट फिल्में बनाकर किया था | इन ध्वनिरहित छोटी- छोटी फिल्मों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया और खूब वाहवाही भी बटोरी | इन शॉर्ट फिल्मों से प्रभावित होकर श्री एच.एस.भटवड़ेकर और श्री हीरालाल सेन जी ने मुम्बई और कलकत्ता में शॉर्ट फिल्म बनाने की शुरूवात की और उनकी मेहनत रंग लाई | उन्होने मुम्बई के हॉगिंग गार्डन में देशी खेल कुश्ती का आयोजन कर शॉर्ट फिल्म का निर्माण किया और उन्होने कौतुहलवश दूसरी फिल्म सर्कस के बंदरों को करवाते बनायी | फिर, उन्होने इन दोनों फिल्मों को एक ही समय में सन् 1899 में प्रदर्शित कर दिया | इस तरह 'हरिश्चन्द्र साखाराम भाटवड़ेकर' (सावे दादा) पहले भारतीय शॉर्ट फिल्म के निर्माता बने | सावे दादा की इन दोनों फिल्मों में केवल छायाचित्र होने के कारण और कोई कहानी न होने के कारण यह मात्र छायांकन फिल्म ही रहीं | अब इसी संघर्ष की कड़ी में शामिल हुये बहुमुखी प्रतिभा के धनी और जुझारू और जुनूनी व्यक्तित्व श्री घुंड़िराज गोविंद फालके  जी (दादा साहब फालके) | उन्होने सन् 1911 में क्रिसमस पर एक फिल्म देखी 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' | इस फिल्म को देखने के बाद उन्होने ठान लिया कि वो भी फिल्म निर्माता बनेगें और फिल्म बनायेगें | बस फिर क्या था पत्नी और दोस्तों की मदद से काफी परेशानियों से जूझते हुये वह लंदन पहुंचे | लंदन में उनकी मुलाकात 'बायस्कोप पत्रिका' के संपादक 'कबोर्ग' से हुई और उनकी मदद से उन्होने फिल्म निर्माण में प्रयोग होने वाला सब सामान खरीदा और भारत लौट आये | अब उन्होने अपनी फिल्म के लिये नायिका ढ़ूढ़ना शूरू किया पर इस काम की बारीकी और ऊंचाई को बहुत हल्के में लिया गया और किसी भी लड़की ने अभिनय करने की अपनी स्वीकृति नही दी | दादा साहब निराश नही हुये वो वैश्याओं के कोठे पर भी गये वहाँ उन्हें उनके कटु शब्द सुनने पड़े कि "उनका पेशा फिल्मों में बाई बनने से कहीं बेहतर है" दादा साहब  का उत्साह फीका नही पड़ा वह रास्ते में चलते हुये एक ढ़ावे पर बैठ कर चाय पीने लगे तो उनकी निगाह चाय देने वाले पर पड़ी उस वेटर की चाल-ढ़ाल और चेहरे में थोड़ा जनानापन था | वह मन ही मन बोले, "मिल गई नायिका" | दादा साहब ने उस वेटर के सामने फिल्म 'हरिश्चन्द्र' में 'तारामती' के किरदार को निभाने का प्रस्ताव रखा और वह मान
गया | अब, 1911 में  देश की पहली फिल्म 'हरिश्चन्द्र' की शूटिंग शरू हुई और 21 अप्रैल 1913 में मुम्बई के ऑलंपिया सिनेमा हॉल में इसका प्रदर्शन हुआ | इस तरह भारतीय सिनेमा जगत की पहली फिल्म पुरूष प्रधान रही जिसकी नायिका एक पुरूष थीं जिनका नाम था 'अण्णा सालुंके' | हरिश्चन्द्र चूंकि कहानी बेस फिल्म तो थी पर ध्वनि रहित थी | दादा साहब ने अपने जीवन में 20 कथा फिल्में और 180 लघु फिल्मों का कुशल निर्देशन किया | 
              फिल्म निर्देशन की इसी कड़ी में जोरदार दस्तक दी आर्देशिर ईरानी जी ने उन्होनें सन् 1931 में देश की पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' बनाई जिसका लेखन 'जोसेफ डेविड' ने किया तथा नायक 'मास्टर बिठ्ठल' और नायिका 'जुबेदा' थीं इस फिल्म पृथ्वीराज भी थे | देश की पहली बोलती फिल्म का पहला गीत था 'दे दे खुदा के नाम पे, ताकत है गर देने की | सन् 1937 में 'किसान कन्या' आर्देशिर ईरानी द्वारा बनाई देश की पहली बोलती रंगीन फिल्म थी | आर्देशिर ईरानी ने अपनी जिंदगी में 158 फिल्मों का निर्माण किया | भारतीय सिनेमा जगत/ फिल्म इंडस्ट्रीज यानि वॉलीवुड में उन्हें बोलती फिल्मों का जनक माना गया | आर्देशिर ईरानी जी की मजबूत दस्तक से भारतीय सिनेमा को अद्भुद पंख मिले | फिर सन् 1933 में आयी फिल्म 'कर्मा' ने लोकप्रियता के झण्ड़े गाड़ दिये और इस फिल्म की नायिका 'देविका रानी' को 'स्टार' कहने लगे | वह भारत की पहली महिला फिल्म स्टार बनीं | इस मनोरंजन की लोकप्रियता इतनी बढ़ी की देश की सभी भाषाओं में फिल्में बनी जो इस प्रकार हैं : मराठी भाषा में बनी फिल्म 'पुंडलिक' सन् 1912 में बनी जो "हरिश्चन्द्र" से भी पहले बनी था पर कुछ आधारभूत कमियों के चलते इसे देश की पहली फिल्म का दर्जा नही मिल सका बस केवल मराठी पहली फिल्म होने का गौरव जरूर मिला, बांग्ला में विलमंगल सन् 1919, मलयालम यानि मॉलीवुड में 'विगथकुमारण' सन् 1920, तेलगू यानि टॉलीवुड में 'भीष्म प्रतिज्ञा' सन् 1921, गुजराती में 'नरसिंह मेहता' सन् 1932, कन्नड यानि संदलवुड में 'सती सुलोचना' सन् 1934, असमिया में 'ज्यामिती' सन् 1935, उड़िया में सीता विवाह सन् 1936, पंजाबी में 'शीला' सन् 1936, कोंकणी में 'मगाचो अनवड़ो' सन्1950, भोजपुरी यानि पॉलीवुड में 'हे गंगा मैया तोहे पियरी चढाइबो' सन् 1963, तुलू में 'एन्ना थंगड़ी' सन् 1971, वडगा में 'काला थपिटा पयीलु' सन् 1979, कोसली भाषा में 'भूखा' सन् 1889 में, यह बहुभाषी पहली फिल्में बनीं | इस तरह भारतीय निर्देशकों, नायक और नायिकाओं के हौसलों के पंखों की गति आज आप सभी के सामने है | 
             दोस्तों ! आज समय बहुत बदल चुका है | आज हर किसी कि दिनचर्या इतनी व्यस्त है कि घर में रहने वाले एक साथ खाना तक नही खा पाते | इस आर्थिक युग की व्यस्त जीवनशैली में बड़ी फिल्म का स्थान लघु फिल्में ने ले लिया है जो दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाने के साथ उनका मनोरंजन करने में भी सफल रहीं है | दर्शकों में शॉर्ट फिल्म के बढ़ते क्रेज को देखते हुये हर दिन हजारों शॉर्ट फिल्में अपने नये संदेश के साथ प्रदर्शित हो रहीं है और अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा में अच्छा नाम और पैसा और ससम्मान हासिल कर अपने देश का नाम ऊंचा कर रही हैं | भारत में शॉर्ट फिल्मों का सफल कारवां देख हम यह कह सकते हैं कि यह दौर है शोर्ट फिल्मों का या यूँ कहिये कि समय की मांग है शोर्ट फिल्में | 
          शोर्ट फिल्म के कारवां में प्रमुखता से नाम आता है भारतीय मूल के निर्देशक इस्माइल मर्चेन्ट का जिनकी शॉर्ट फिल्म "द क्रिएशन ऑफ वूमेन" को सन् 1961 में 33वें आस्कर पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म नामांकित किया गया | इसी कड़ी में नाम आता है भारतीय निर्माता विधु विनोद चोपड़ा और के.के कपिल की फिल्म "एन इनकॉउन्टर ऑफ फेसस" का जिसे 1979 के 51वें ऑस्कर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट डाक्यूमेन्ट्री फिल्म नामांकित किया गया | 
इसी कड़ी में स्वतंत्र भारतीय फिल्मकार अश्विन कुमार की शॉर्ट फिल्म "लिटिल टेररिस्ट" को सन् 2005 के 77वें ऑस्कर पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म नामांकित किया गया था | तथा, इस साल 70वें वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय शॉर्ट फिल्म और हैपंटन इंटरनेशनल फिल्म में ज्यूरी अवार्ड जीत चुकी भारतीय शॉर्ट फिल्म 'कुश' आस्कर तक पहुंची और अन्तर्राष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म भारतीय प्रतिभा का झण्ड़ा गाड़नें में सफल रही | हमारे भारतीय सिनेमा जगत में अनेकों -अनेक विषयों जैसे कुरीतियों पर चोट करती हुई, रक्तदान पर, खाने की बर्बादी पर, स्वच्छता पर, भ्रूण हत्या रोकने, दहेज रोकने, नशामुक्त भारत, पीस और हैपीनेश, विज्ञान और प्रौद्दोगिकी पर, नित-प्रतिदिन शॉर्ट फिल्में बन रहीं है और समाज के कुशल मार्गदर्शन में मील का पत्थर साबित हो रही | इसी कड़ी में नाम आता है जाने-माने निर्देशक इम्तियाज अली ने 5 मिनट की शॉर्ट फिल्म में दिखाया कि सेक्स वर्कर के पास भी सपने होते हैं उनको पूरा करने का हुनर होता है | फिर निर्देशक सुजोय घोष ने "अहल्या" शॉर्ट फिल्म बनाकर इतिहास से तीखा सवाल किया कि  पराये मर्द से सम्बंध बनाने पर वो मर्द पत्थर बने नारी नही, "अहल्या" फिल्म को यूट्यूब पर 5,707,050 लोग देख चुके हैं जो शॉर्ट फिल्म के मजबूत कारवां का प्रतीक है |
फिर निर्देशक अनुराग कश्यक ने "द डे आफ्टर एवरीडो" बनाई जो न्यूज में भी छाई रही, इसी कड़ी में सेक्स एडिक्ट महिला के जीवन संघर्ष पर बनी फिल्म "सेक्सोहॉलिक" शॉर्ट फिल्म जिसको यूट्यूब पर 2,899,342 लोग देख चुके हैं और यह शॉर्ट फिल्म के भविष्य पर सफलता का स्टॉप है | शॉर्ट फिल्म के इतिहास में आयी फिल्म "मैडली लव" जिसे भारतीय निर्देशक अनुराग कश्यप समेत 6 देशों के दिग्गज फिल्म निर्देशकों ने मिलकर बनाया जिससे भारतीय सिनेमा की हुनर की खुशबू देश - दुनिया तक पहुंचने में सफल रही | इन भारतीय बेहतरीन फिल्मों की कामयाबी को देखते समझते - बूझते हम कह सकते हैं कि आने वाले टाइम में शॉर्ट फिल्म का फ्यूचर इकदम ब्राइट है पर आइयें जानते हैं कि भारतीय सिनेमाजगत के प्रतिभावान ऐक्टर और निर्देशकों की इस बारे में क्या राय है :



 रेमण्ड डिसूजा
 मॉडल,एेक्टर, फोटो डिजायनर, सोसल वर्कर


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :


मुझे लगता है शॉर्ट फिल्म बनाने वाले पर निर्भर करता है कि वह किस लिये बना रहा है और किस सोच में रहकर खुद को शॉर्ट फिल्म के जरिये समाज का जो दर्शन है उसे किस तरह दर्शा रहा 
है | क्योंकि पर्दे पर तो सबकुछ सम्भव है बाकि आपकी सोच पर निर्भर करता है | इस मायने से शॉर्ट फिल्मों का फ्यूचर काफी अच्छा है | 

फिल्म = उठो छलांग मारो बजरंगबली (सॉगं)



अजय आनंद  

फिल्म निर्माता


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :

सोसल मीडिया का प्रभाव आने वाले टाइम में और भी बढ़ेगा | लोग मोबाइल पर सिमटे जा रहे हैं और कम वक्त में संतुष्ट होना चाहते हैं | इसलियेइसलिये
आने वाले टाइम में शॉर्ट फिल्मों का भविष्य और बढ़ेगा | देखें तो महत्व अभी भी बढ गया है | अब बड़े -बड़े निर्माता शॉर्ट फिल्म बना रहे हैं और बड़े -बड़े ऐक्टर शॉर्ट फिल्म कर रहे हैं  | लीडिंग न्यूज पैपर शॉर्ट फिल्म की समीक्षा छाप रहे हैं | आज बड़े पर्दे के ऐक्टर छोटे पर्दे की लोकप्रियता देख छोटे पर्दे का रूख कर रहे हैं जोकि पहले सम्भव नही था | तो, शॉर्ट फिल्मों का भी भविष्य है जो उसी तरह बड़ा होगा | 

फिल्म - "डार्क स्ट्रीट", क्राइम - "द डे आफ्टर"





संदीपन विमलकांत नागर   
फिल्म निर्माता
संगीत नाटक पुरस्कार
विभूषित 


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :


सिनेना का मतलब है कि आप दृश्य प्रभाव
के माध्यम से अपने विचार/ लिखित कार्य/
कहानी से भाव व्यक्त करना चाहते हैं |
थियेटर एक प्रक्रिया थी पर अब ई कैमरा
की वजह से कैमरा उत्पादन बजट में
कमी आयी है |इसलिये एक समूह को
कहानी लाइन बनाने के लिये सक्षमता 
है | मुझे लगता है कि शॉर्ट फिल्म को
फेसबुक जैसे नये मीडिया फ्रंट,यूट्यूब 
ने प्लेटफॉर्म दिया जो दर्शकों के सामने
खुद को अभिव्यक्त करने का एक
अच्छा तरीका है | शॉर्ट फिल्म एक
महान विचार है और इसका
फ्यूचर ब्राईट है |

फिल्में = 'सुबह होने तक"
             "उत्तरार्ध"
             "बहुरानी"

संदीपन वीके नागर
फिल्म निर्माता
2000 में प्राप्त यू.पी.स्टेट
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

      



मनीष कपूर फैशन शो जूरी मैम्बर, बहुभाषी कला रत्न विभूषित ऐक्टर, डाईरेक्टर 


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :

शॉर्ट फिल्मों का आने वाले समय में फ्यूचर बहुत ब्राइट है | उसमें युवाओं को आगें जाने की बहुत अधिक सम्भावनायें हैं और जो कलाकार इस समय संघर्ष कर रहे हैं | उनके लिये बहुत कुछ सीखने के लिये है | 

फिल्म - "द स्ट्रैंजर" , "सेल्समेन", "द ग्रेट हीरो हीरालाल", "कुटुम्भ" 


 


केसंदीप बिडलान
स्क्रिप्ट राईटर,

फिल्म डाईरेक्टर 


शार्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :

शॉर्ट फिल्मों का फ्यूचर बहुत अच्छा है | नये फिल्म मेकर्स के लिये यह एक ऐसा मंच है जो उनकी प्रतिभा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जा सकता है | वेब फिल्मों की शुरूवात भी शॉर्ट फिल्मों के सुनहरे भविष्य का आगाज़ है | मेरा विश्वास है कि शॉर्ट फिल्म, शॉर्ट फिल्म मेकर का भविष्य बदल सकती हैं |

फिल्में = "पढ़े लिखे गंवार", "एक अकेली लड़की", "हिन्दी", "स्वच्छता सबकी जिम्मेदारी",
"घर स्वच्छ तो देश स्वच्छ" |






अमर बेताब     

फिल्म डाइरेक्टर,
एक्टिंग ट्रैनर,
कॉस्टिंग डाइरेक्टर


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :
शॉर्ट फिल्में मेसेज के लिये बनाई जाती हैं और वह हमेशा बनती रहेगीं |

फिल्में =  "लहू की जात", "भाग कहाँ तक भागेगा", "मंगलमूर्ति मोर्या", "दुल्हन बदल गई',
"मैं तो प्यार करूंगा", "भोजपुरी मजदूर" |


 


दीपक नूर 

ऐक्टर, डाईरेक्टर,राइटर, सिंगर


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :

शॉर्ट फिल्में आने वाले कल की सच्ची तश्नीर हैं | आज किसी के पास इतना वक्त नही है कि दो-तीन घण्टे का कीमती समय बर्बाद करे | समाज की बुराइयों को कम समय में दिखाती हैं शॉर्ट फिल्में |इसलिये भविष्य अच्छा है |

फिल्म = "एम्बूलेंस सेव्स लाइफ"




रवि कुमार त्यागी          

ऐक्टर, डाइरेक्टर 


शॉर्ट फिल्मों के फ्यूचर पर आपकी राय :

फ्यूचर में शॉर्ट फिल्में कमर्शियल बिजनेस का रूप वे लेगीं जैसे फुल लैंथ फिल्म और अपना मेसेज कनवे करने का यह सबसे अच्छा, सुन्दर और सस्ता तरीका है | 

फिल्में = "दवाई", "9मिनट"







लेखिका = आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'

🙏🙏🙏











1 comment:

  1. OH My God .................What a creation ......................Excellent Work...........

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