पित्रस्नेह : "पिता" साक्षात् परमात्मा - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Wednesday, August 23, 2017

पित्रस्नेह : "पिता" साक्षात् परमात्मा









 अद्धितीय है पिता का स्नेह

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आँखों में आँसू दिखते ना
माथे पर ना सिकन दिखे
होठों पर मुस्कॉन सजे ना
नाक पर गुस्सा घूमा करता
चेहरे पर सख्ती दिखती
पर दिल में प्यार बसा करता
बनावट से नही जिनका रिश्ता
हाँ रिश्तों में गहरा वो रिश्ता
वो हस्ती नही मामूली कोई
दुनिया ने नही समझा जिसको
वो आमंत्रण के आगाज़ हैं
परिश्रम के वो आधार हैं 
परिवार के पालनहार हैं
भगवान का दूसरा नाम हैं 
कोई और नही वो
हमारे संरक्षक 
 "पिता" महान हैं 
जिनसे हमारी "नाम"
और "पहिचान" है |
आदरणीय "पिताजी" 
आपको ससम्मान 
प्रणाम है |


दोस्तों ! आपने देखा भी होगा सुना भी होगा कि "माँ" पर बहुत लिखा गया है और लिखा भी क्यों ना जाये वो होती ही है इतनी प्यारी कि
जिसकी किसी से भी तुलना असम्भव है | माँ हमारी शक्ति होती है कि जिसके पास बैठने से हर दर्द हल्का हो जाता है | उनका स्पर्श कोई संजीवनी बूटी से कम नही है पर माँ की  भी संजीवनी बूटी है जिसे "पिता जी" कहते हैं | पिता जी का स्नेह पूरे परिवार पर होता है पर दिखता नही क्योंकि उन्हें दर्शाना ही नही 
आता | वह अपने बच्चों के लिये दिनभर मेहनत करते और रात-दिन सोचते कि उनकी मेहनत और कमाई में कहीं कोई कमीं ना रह जाये और परिवार के अनुशासन में कहीं कोई ढ़िलाई ना रह जाये जिससे उनके बच्चों के चरित्र और भविष्य पर किसी भी तरह की कोई आंच न आ जाये | बस इसी अनमोल गुप्त ख्वाब का दीपक मन में जलाये हर - पल उसी दिये की लौ की रक्षा हेतु विपरीत परिस्थितियों के आँधी- तूफानों से जूझता रहता है और ताज्जुब यह है कि परिवार के किसी सदस्य को इसकी भनक तक नही लगती क्योंकि वह भनक लगने ही नही देते | बस, उस आत्म गुप्त दीपक की लौ कभी - कभी इतनी तेज हो जाती है कि पिता के स्वभाव में सुरक्षा के भाव के रूप में प्रकट हो जाती है और हमें लगता है कि हमारे पिता सख्त हैं, गुस्से वाले हैं, टोका-टांकी करने वाले हैं और पुराने टाईप के हैं | सच कहूँ तो वो पुराने टाईप के नहीं एक महान रक्षक टाईप हैं जो आपसे बेहद प्यार करते है और इसी लिये आपकी इतनी केयर करते हैं | वो चाहे ऊँचे पदों पर कार्यरत् हों या फिर रिक्शा चालक या फिर जूते गांठ कर अपने परिवार की चिंता करने वाला सभी का दिल बिल्कुल एक समान होता है सभी की सोच एक समान होती कि मेेरे बच्चे समाज और देश का नाम ऊँचा करें | वह अच्चे इंसान बने | हर पिता ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि उनके बच्चें संस्कारी हों क्योंकि अगर उनके बच्चे जब अराजकतत्वी आतंकी और बलात्कारी जैसे शब्दों से पुकारें जाते हैं तो पिता की परवरिश पर सवाल उठायें जाते हैं कि कहीं इसका पिता भी ऐसा तो नही रहा, बस उसी पल एक पिता इस कदर हारता है कि वह अपनी जिन्दगी से हार जाता है और वह अपने बच्चों के कुकर्त्यों से शर्मिंदगी  से भर उठ है और दोषी से कहता है कि तुम इंसान नही बल्कि राक्षस हो और शायद उनसे भी बदतर कि तुमने मुझ पिता को ही नही बल्कि पिता शब्द को ही कलंकित कर दिया है | दोस्तों ! पिता वो शक्ति है जिनसे हमें सकारात्मक जीवन जीने की ऊर्जा व घर चलाने व हुनर को निखारने-फैलाने व धन कमाने की प्रेरणा मिलती है और समाज में सम्मान सहित पहिचान मिलती है पर आपने कभी सोचा है कि जिस बच्चे के ऊपर से बचपन में ही उसके पिता सहारा उठ जाये तो उस पर क्या बीतती है | दोस्तों ! यह वही समाज है जिसने देवताओं पर भी कीचड़ उछाला और उनको भी चैन से जीने नही दिया | यह समाज किसी को नही बक्शता यह उस बिन बाप के बच्चे को हर जगह हर वक्त घूरती सवालिया नजरों से देखता है और उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नही छोड़ता | उस पर व्यंग और तानों से भरे अपशब्द वाण चलाता वो भी गोली की रफ्तार से कि तुम छोटा -मोटा काम धंधा ही कर लो अरे! बन भी गये मंत्री तो किसे दिखाओगे अब बाप होता तो पीठ थपथपाता, तुम तो अपनी माँ की सेवा करो कहीं वो भी ऊपर ना निकल ले | वैसे सुना है कि विधवा विवाह होने लगे हैं अगर तुम कहो तो एक विधुर सज्जन है मेरी नजर में जिंदगी बन जायेगी बस थोड़ा सनकी है उम्र 65 साल है जब वह बच्चा उसे भरी आँसू से देखता हुआ वहाँ से जाने लगता तो वह चिल्लाता अरे! कहाँ दौड़ा जा रहा मैं तो तेरी भले की कह रहा शराबी ही सही बाप तो मिल जायेगा | बच्चा संस्कारी था छोटा था आकर अपनी माँ की गोद से लिपट गया और रो पड़ा | माँ सब समझती थी क्योंकि यही सब सुनना उसकी भी दिनचर्या में सामिल था | माँ ने बेटे के आँसू पोछ दिये और कहा तुम यह सब सुनकर भी मेहनत से पढ़ो और देश- दुनिया में पहिचान बनाओ बस उसी दिन इन सबका मुंह बन्द हो जायेगा और यही सब तुम्हें प्यार करेगें | 
बच्चा बड़ा हुआ नाम और पहिचान मिली तो परिवारी- रिश्तेदार यहां तक के पूरे समाज के लोग उसे बेटा कह कर पुकारने लगे उस दिन वह रो पड़ा और माँ से बोला आज सभी बेटा कहते हैं काश ! बचपन में गले से लगाकर बेटा कह दिया होता यही कसक रही माँ तभी तो आज मेरा बेटा और बेटी कहते हैं कि पिताजी आप गुस्से वाले हो पर फिर भी बहुत अच्छे हो  पर माँ उनको कैसे समझाऊँ कि यह गुस्सा नही बस जीवन संघर्ष के अनुभव है समाज के प्रति एक टीस है जो कभी-कभी चेहरे पर झलक जाया करती है और बच्चों को लगता कि मैं गुस्से वाला पिता हूँ पर सचकहूँ तो मैं अपने बच्चों और परिवार से अनन्य प्रेम करने वाला एक पिता हूँ बस मुझे जताने का हुनर नही आता | वह यह कह कर माँ की गोद में सिर रख के लेट गया कि उसके दोनों बच्चे उससे आकर लिपट गये कि पिताजी आप हमारे मम्मी और दादी माँ के लिये कितने सुन्दर गिफ्ट लाये और बताया भी नही कहकर बच्चे पिता से लिपट गये और एक पिता की अपने बच्चों को गले से लगाने की उस खुशी का अंदाजा लगाना तो हमारे क्या किसी के बस की बात नही | 
   दोस्तों ! पिता इस दुनिया कि हमें मिली साक्षात् शक्ति हैं उनकी छत्रछाया में भाग्य, यश, कीर्ती और लक्ष्मी जी का वाश होता है और माँ का साथ और बच्चों का हित निहित होता है इसलिये कभी भी इस साक्षात् भगवान का अनादर मत करना और जीवन में कभी कोई ऐसा काम न करना जिससे पिता का स्वाभिमान खंण्डित हो और उसकी आँख में आँसू आये क्योंकि पिता से माँ हैं और माँ से हम और आप हैं और उनकी मुस्कॉन में साक्षात् परमात्मा का वास हैं | 

        






आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'





.................धन्यवाद ....................




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