कहानी - ''जरूरत'' - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Tuesday, May 22, 2018

कहानी - ''जरूरत''


चित्र-साभार गूगल


चित्र-साभार गूगल


ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 


कहानी - ''जरूरत'' 

     लेखक - ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना


चित्र-साभार गूगल

मुहब्बत की सभी को जरूरत है बहुत......
 मलखे चाचा जिन्हें पूरा गांव "चचा" कहकर  सम्बोधित करता था और "चाय गरम टन्न" कह कर चिढ़ाता भी था क्योंकि मलखे चचा को चाय से बहुत चिढ़ थी। इसी कारण जो कोई भी चचा के घर के सामने से गुजरता  "चाय गरम टन्न गिलास" कहकर गुजरता तो मलखे चचा  उस व्यक्ति पर गालियों की बोछार कर देते और सब हंसते हुये भाग जाते। कुछ भले लोग अपने बच्चों को डांटते भी कि मलखे चचा बूढ़े और कमज़ोर हो गये है। उन्हें चाय गरम टन्न गिलास कहकर चिढ़ाया मत करो। दस मिनट तक लगातार गालियाँ बुलवाकर तुम सब क्यों रोज उनका खून जलाते हो? यह सुन चचा चिल्लाते भाग जाओ सब।एक दिन चचा अचानक कहने लगे अब हम लोग मजदूरी के लिये दिल्ली जा रहे हैं फिर सताते रहना इन दीवारों को। यह बात सुन पड़ोस की चाची बोली, काहे दिल्ली काहे चचा? चचा बिना कुछ बोले अपने कच्चे कमरे के कच्चे फर्श पर पानी छिड़क कर वहीं चुपचाप लेट गये और पंखा डुलाने लगे।
    कुछ देर बाद खुसुर-फुसर की आवाज़ ने मलखे चचा का ध्यान भंग कर दिया और वह घर के पीछे लगे आम के पेड़ों के तरफ बढ़ चले तो देखकर दंग रह गये कि एक घूँघट में बृद्ध औरत और रूमाल बांधे अधेड़ आदमी दोनों अश्लील हरकते कर रहे हैं। मलखे चचा ने मन ही मन कहा घोर कलयुग है, जून की तपती दोपेहरी में भी चैन नही! फिर इधर - उधर देखा कि कोई देख तो नही रहा तो फिर चचा चुपचाप छिप कर सब देखते रहे। जब वे लोग चले गये तो चचा वहीं कच्चे जमीन पर आकर लेट गये पर उनके मन - मस्तिष्क पर वही अश्लीलता हावी हो रही थी और अब बार-बार देखने को उनका जी करने लगा। पर वह करें भी तो क्या? तभी उन्होनें मन ही मन वही सब देखना शुरू कर दिया जो वह देखना चाहते थे और  बहुत आनंद की अनुभूति में गुम थे कि उनकी पत्नी गाय के सामने घास रखते हुये बोलीं खाना नही खाया आपने क्यों? मलखे चचा आँख बंद किये किसी दूसरी दुनिया में मगन थे। चाची ने हिलाकर कहा, '' सो रहे क्या? '' मलखे चचा
  ने आँख खोली और चाची को घूरने लगे और हाथ पकड़ के कुछ बोलते कि चाची ने  हाथ झटक कर कहा कोई लाज शरम है कि नही, उम्र का कुछ तो लिहाज करो। चौके में रोटी सब्जी रखी है खा लेना। मैं गाय को पानी पिला आऊँ। यह देख मलखे चचा  की फैलती महत्वाकांक्षा फिर से मानो सिकुड़ कर वहीं दफ्न हो गयीं। 



        बाहर चबूतरे पर बैठे मलखे चचा स्वप्नलोक में इस कदर खोये हुये थे कि गली के बच्चे चाय गर्म टन्न गिलास कहकर चिढ़ाकर वहीं खड़े थे पर मलखे चचा लैटे - लैटे मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। मोहल्ले के सभी लोग हैरान थे कि आखिर! मलखे चचा जो हमेशा चिड़चिड़े रहते और सभी को खूब गालियाँ देते पर आज इतने शांत क्यों? 
      रात सभी ने सामान बांधा और अपनी गाय सामने वाली चाची को सौंप कर दिल्ली ट्रैन से रवाना हो गये। पहली बार दिल्ली शहर की चकाचौंध देख मलखे चचा हैरान रह गये। फिर गली कूचों से होते हुये बताये गये पते पर पहुंचे जो बहुत बड़ा बंगला था। बाहर खड़े गार्ड ने अंदर से बनवारी को बुलाया जो वहां बागवानी का काम देखता था।  बनवारी,  चचा - चाची को देख कर बहुत खुश हुआ और कहा गेट के अंदर आ जाओ चचा । हाँ यहीं,यही काम करना है हम सबको। दोनों कांपते कदमों से अंदर पहुंचे जहां बनवारी ने पौध कटिंग से लेकर सब काम समझा दिया और एक कमरा भी दिखा दिया कि इसमें मैं मेरी पत्नी और लड़के की विधवा बधू साथ रहते हैं। पास वाले कमरे में आप दोनों रहो। रात को मालकिन आएंगी तो मिलवा देगें। मलखे और उनकी  पत्नी दोनों चुपचाप अलग-अलग कोना पकड़ कर लैट गये। रात बनवारी ने कहा कि मालिक - मालकिन आये हुये हैं उस हॉल में हैं तुम दस मिनट बाद जाकर मिल लेना अकेले। मैं सब्जी लेने जा रहा हूँ। मलखू दद्दा वहीं टहलने लगे और टहलते हुये मालिक से मिलने हॉल में जा पहुंचे। वह अंदर बढ़ते कि मलखू के कदम अचानक रूक गये और वह वहीं खिड़की पर खड़े हुये अंदर का नजारा देखने लगा कि खूबसूरत भारी बदन की अधेड़ मालकिन अधेड़ मालिक के साथ रोमांस कर रहीं और लिपटे हुये उन्हें शराब पिला रहीं हैं। चचा सब देख ही रहे थे कि पीछे से बनवारी ने आकर कहा बाहर से क्या देख रहे हो चचा । यहां ये सब आम बात है। चलो अंदर। मलखे अंदर पहुंचे फिर भी मालिक मालकिन गले में हाथ डाले रहे, काम समझाते हुये बोले कर तो लोगे न, बाकि बनवारी ने बता ही दिया होगा। तभी मालकिन उठ कर आयीं और चचा के कंधे पर हाथ रख बोलीं यहां आपको कोई तकलीफ़ नही होगी। हम लोग औरों जैसे कठोर नही। कहते हुये मालिक के हाथ को पकड़ कर हँसते हुये अंदर कमरे की ओर चली गयीं। मलखे चचा ने कहा बनवारी ये लोग अच्छे लोग हैं। तो बनवारी बोला हाँ चचा। दोनों कमरे में लौट आये बनवारी कि विधवा पुत्र बधू ने सभी के लिये खाना परोसा और सब खा पीकर अपने रूम में जाकर सो गये। आधी रात मलखे चचा की नींद खुलीं तो उन्होंने अपनी पत्नि को हिलाया तो वह चिल्ला कर बोलीं सो जाओ चुपचाप यह गांव नही हैं समझे। मलखे दद्दा मन मसोस कर प्यासी इच्छाओं को सिर पर लादे बाहर निकल टहलने लगे और उनके कदम मालकिन के रूम तक कब बढ़ गये ये उन्हें भी पता न चला। बस दद्दा चुपचाप रूम की खिड़की से झांकने लगे और अंदर का नजारा देख उनके पांव तले जमीन खिसक गयी कि मालकिन बनवारी के साथ हमबिस्तर हैं और दोनों इतने निश्चिंत कि मानो किसी का डर नहीं। चचा काफी देर खड़े देखकर आंखों को सुकून देते रहे पर उनका मन बैचेन हो उठा और वह अपने कमरे की तरफ लौटने लगे कि पेड़ो के पीछे वही खुसुर-फुसुर सी आवाजें सुन मलखे चचा ने पेड़ों की ओट से देखा कि बनवारी की जवान पुत्रबधू और मालिक दोनों प्रेम में डूबे हुये हैं। यह सब देख मलखे चचा की जिस्मानी हसरतें पूरी तरह जाग उठीं और वह अपने कमरे में आकर दूर लेटी अपनी पत्नी लाजवंती से जैसे ही लिपटना चाहा कि वह चिल्ला उठीं,  यह क्या कर रहे हो आप? शर्म नहीं आती। कुछ तो उम्र का लिहाज़ करो। यह सब सुन मलखे चचा चुपचाप  बड़ी मुश्किल से सोने का प्रयास किया।   
    दूसरे दिन सब लोग अपने-अपने काम में लग गये। दोपहर में बनवारी ने कहा आप सब लोग काम करो। मैं बहू को दवा दे आऊँ। कल मंगवाई थी उसने। मैं देना भूल गया। यह कहकर बनवारी तेज कदमों से अपने रूम की तरफ बढ़ चला। यह देख मलखे चचा भी चुपचाप बनवारी के पीछे लग गये । मलखे चचा का शक उस समय  हकीकत में बदल गया जब उन्होंने देखा कि ससुर बहू दोनों जिस्मानी सम्बंध बनाने में रत् हैं। काफी कुछ देख मलखे चचा वापस लौट आये और पौधों को पानी देने लगे। पीछे से बनवारी हँसता हुआ आया और बोला कैसे हो चचा ? यहां का माहौल तो अच्छा लग रहा न?  मलखे ने पूछा बनवारी तेरी उम्र क्या होगी तो वह बोला क्यूँ चचा? , वैसे 49 पार हो गयी चचा, 50 में लगने वाला हूँ। फिर मलखे ने कहा और मालिक की कितनी उमर होगी? तो बनवारी ने कहा कि मालिक की उम्र 65 साल और मालकिन की 55-60 के करीब होगी। यह सुन मलखे चचा चुप हो गये तो बनवारी ने पूछा, चचा चुप क्यों हो गये? तो मलखे ने कहा कि तुम सब पर उम्र का असर क्यों नही दिखता और तुम सब इतना खुश कैसे हो? बनवारी ने कहा कि हम सब खुद को जवान समझ कर जीते हैं और जो मन करता वो करते हैं बस। मलखू ने कहा जो मन करता है से का क्या मतलब? तो बनवारी कान में बोला कि अपनी पत्नी को हर तरह से खुश रखता हूं और खुद भी खुश रहता हूँ। मलखे चचा ने कहा मैं नही मानता? इस उम्र पर बीवी को छुओ तो वह कहतीं कि उम्र का लिहाज़ करो। बनवारी ने कहा नही चचा प्यार मोहब्बत में उम्र बीच में कहां से आ गयी। चचा जरूरत तो हर उम्र में होती है। सच कहूँ तो इस उम्र में ज्यादा।फिर बनवारी ने मलखे चचा को अपने रूम में ले जाकर पर्दे के पीछे खड़ा कर दिया और कहा बोलना मत केवल देखना। पीछे से बनवारी की अधेड़ औरत कमरे में आयी और बनवारी उसे चूँमने लगा तो उसकी औरत उसे दुगनी तेजी से चूँमते हुये बोली कि दिन में भी तुमको चैन नहीं यार। तो बनवारी ने अपनी पत्नी को बाहों में भरकर शायराना अंदाज में कहा  कि दिन में भी होते हैं सितारे जानेमन तुम्हें क्या पता, दिन में भी होती है जरूरत जानेमन तुम्हें क्या पता और यह कहते हुये दोनों एक दूसरे से लिपट गये जिसे देख कर मलखे चचा चुपचाप दबे कदमों से कमरे से बाहर निकल गये। 
         कुछ देर बाद बनवारी ने आकर कहा देखा चचा?  पता चला न कि हम लोग बुढ़ापे में भी जवान कैसे हैं,शायद इस लिए कि हम मानसिक रूप से संतुष्ट हैं और अाप लोग हैं कि वही पुरानी बातें, दूर - दूर रहना  और चिढ़चिड़े होकर घुट-घुट कर मर जाते हो। मलखे चचा को बनवारी की बातें अच्छी लगीं क्योंकि यही बातें वह सुनना भी चाहते थे।              
       मलखे चचा दिन-रात स्वप्नों में देखते कि वह मालकिन के साथ रोमांस कर रहे हैं। ध्यान भंग होता तो काम में लग जाते। हर दिन मालिक मालकिन बनवारी और उसकी बहू और पत्नी सबको जिंदगी के मजे लेत देख चचा खुद को बहुत असहाय और अकेला महसूस करने लगे। एक दिन मलखे चचा ने सोचा कि बहू और मालिक के नाजायज सम्बन्ध के बारे में आज बनवारी को बता ही दें। बहुत हिम्मत कर मलखे चचा ने बनवारी से कहा कि आजकल शहर में ससुर बहू के नाजायज रिश्ते बहुत बढ़ चले हैं। यह सुनकर बनवारी ने कहा कि मॉडर्न युग है चचा सबको जीने का हक मिलना ही चाहिए और चचा अगर तुम्हारा इशारा मेरी तरफ है तो साफ सुनो मेरी बहू को हेपटाइटिस बी की गम्भीर बीमारी हैै और वह कुछ महीनों की मेहमान है। यह बात वह भी जानती है। अगर वह मालिक के साथ वक्त बिता रही तो बुरा क्या है? गांव में लोग बिधवा बधु को जीने नहीं देते। उसे बोलते कि आदमी को खा गयी कमबख्त, अपशगुनी, डायन और उसे किसी पूजा-पाठ और शुभ कामों में बैठने नही देते। अनेकों  शब्द वाणों से उसे दिन रात जख्मी करके पल-पल मरने को मजबूर कर रखा था और मैंने सोचा दूसरा ब्याह कर दूँ पर लोग पूछते तुम्हारी बहू की सरकारी नौकरी है क्या? मैं मना कर देता कि वह पढ़ी-लिखी है कोई ट्रैनिंग करवा दो तो लग भी सकती है पर इस लालची और ढ़ोंगी समाज को तो पकी पकायी खीर जो चाहिए थी। बाद में सब बहाना बनाकर पल्ला झाड़ कर चल निकलते। फिर रोज - रोज के तानों से और अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने से वह  बीमार हो गयी। तब उसे उसके मायके वालों ने भी रखने से  मना कर दिया। जब मैं यहां लाया तो मालिक ने इसका बहुत इलाज कराया। अब दोनों दोस्त की तरह हंस खेल कर खुश हैं तो मैं क्यूँ उसकी खुशियों का गला घोट दूं। हाँ मैं मॉर्डन हूं। क्यूं कि मुझे पता है कि जिस्मानी जरूरत एक मर्द होने के नाते जितनी मुझे है ठीक उतनी मेरी पुत्रबहू को भी है। यह बात इस समाज को जिस दिन समझ आयेगी तब औरत को सम्मान मिलेगा वरना संस्कारों की दुहाई देकर वह हरपल घुटन से मरती रहेगी और यह समाज उसे देवी थान बनाकर पूजता रहेगा। मैं उसका छिप कर शोषण नही करता बल्कि मैं उसकी मर्जी से उसे जिंदा रखने की कोशिश जरूर करता हूँ। इसीलिए मैं शहर आकर खुश हूँ क्योंकि यहाँ कोई किसी की निजि जिंदगी में ज्यादा दखल नहीं देता। 



        मलखे चचा बनवारी का हाथ पकड़कर बोले तू सचमुच जी रहा है और जीने भी दे रहा है। हम जैसे दकियानूसी सोच के लोग अपनी सिकुड़ी जिंदगी ढ़ो रहे हैं बस। जिसमें कोई रस नही। हम 60 के हो गये तो परिवार क्या पत्नि भी यही समझने लगती है कि हम तो कल ही मर जायेगें मानो। बनवारी ने हँसते हुये कहा कि सही कह रहे हो पर इसमे भी हम पुरूषों की ही गल्ती हैं कारण हमने ही उन्हें ऐसा दमघोटूं माहौल दिया। कोई महिला अपनी इच्छाओं को दफ्न करके मर जाये तो संस्कारी और कोई महिला अपनी दिल की सुन कर जी ले तो वह मॉर्डन और कुलक्षणी हो गयी।ये कहाँ का न्याय? मलखे चचा ने कहा सही कह रहे हो बनवारी। छोटी सी जिंदगी जी भर जियो । तो बनवारी ने कहा नही दद्दा, जिंदगी छोटी नहीं होती हैं..  लोग जीना ही देर से शुरू करते हैं और जब तक  रास्ते समझ मे आते हैं तब तक लौटने का वक़्त हो जाता हैं...। मलखे चचा ने कहा सही कहते हो बनवारी चलो थोड़ी पी लेंं चलकर । बनवारी ने कहा बिल्कुल चचा  शाम को चलते हैं। तभी मलखे की पत्नी नेे बनवारी की पत्नी से कहा मुझे इशारे से लग रहा यह दोनों दारू पीने जायेगें। चलो रोक दें। चलो झगड़ा करें। बनवारी की औरत ने कहा अरे! रूको चाची। आदमी है दिनभर धूप में काम करते थोड़ी पी लेगें तो क्या जायेगा। कौन सा दिन-रात पियेगें। ज्यादा टोका टाकी रिश्ते बिगाड़ देती है चाची। मलखे की पत्नी बोलीं दिनभर धूप में हम तुम बहू भी थक गयी तो क्या हम सब भी दारू पियें बोलो? वह हँसी और बोली पी भी लेगें तो क्या? चलो रूम पर। तीनों रूम पर पहुंची तो मलखे की पत्नी हैरान रह गयी देखकर जब बनवारी की पत्नी ने तीन गिलास में थोड़ी - थोड़ी दारू डाली और कहा छिपाकर रखी थी। लगा जाओ चाची सारी थकान खत्म। फिर क्या था जबरदस्ती चाची को दारू पिला दी गयी और तीनों ने जीभर के अपनी दिल में छिपे दर्द को बाहर निकाल डाला और कब आँख लग गयी पता ही न चला। दूसरे दिन जब बनवारी की पत्नी ने कहा चची कैसा लग रहा तो चची ने घूरते हुये कहा कि मुझे मॉर्डन नही होना। मुझे गंवार ही रहने दो, तुम दोनों ने मिलकर मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया। यह सुन बनवारी की पत्नी जोर से हँस पड़ी। वह दोनों बात कर ही रही थी कि बड़ी सी गाड़ी से मालकिन अपने किसी पुरूष दोस्त की बाहों में लड़खड़ाते हुये रूम के अंदर चली गयीं। यह सब कुछ देखना तो बनवारी और मलके की पत्नी के लिये आम बात हो गयी थी । एक दिन यह सब देख बनवारी की पत्नी ने कहा देखा चाची यह है जिंदगी का असली आनंद! तो मलखे की पत्नी लाजवंती चाची ने तपाक से जवाब दिया कि नहीं! यह बदन कोई सराय तो नही है कि कोई भी ठहर जाये। यह आनंद नहीं बल्कि गलत आचरण है। यह सुन बनवारी कि पत्नी कुछ कह पाती कि चाची वहां से उठ कर चली गयीं। फिर काफी दिनों तक यह सब देख कर भी चाची पूरी तरह खुल न सकी।
क्योंकि वह उन जैसा नही बनना चाहतीं थीं। इधर चचा मन ही मन मालकिन के सपने देखते पर सोचते कि नहीं यह गलत है और मुझे बनवारी जैसा तो नहीं बनना। मुझे मेरी लाजवंती ही चाहिए पर लाजवंती से प्रेम की उम्मीद बिल्कुल असम्भव थी क्योंकि वह पूजा-पाठ  वाली धार्मिक और संस्कारी महिला थी। यह सब सोच मलखे चचा जुगनू की तरह कभी जलने कभी बुझने लगे और अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति न हो पाने के कारण मलखे चचा  स्वप्नदोष नामक बीमारी  से ग्रसित होकर मनोरोगी भी हो गये और मन ही मन टूट कर बिखरते चले गये। 

चित्र-साभार गूगल

       उन्हें तो बस प्यार चाहिए था जो वह किसी से कभी न कह सके। बनवारी सभी को लाफ्टर क्लबों में ले जाता। सब हँसते पर मलखे की पत्नी अपने पति की खराब तबियत के कारण न हँस पाती न खुश रहती और इधर मलखे चचा  बिल्कुल खामोश.. मानो पत्थर की कोई मूरत। वह पता नही किस दुनिया में गुम रहते किसी को कुछ समझ नही आ रहा था। फिर बनवारी ने उनका काफी इलाज कराया पर डाक्टर उनका दिन- प्रतिदिन गिरते स्वास्थ्य और अचानक रात में उठकर बड़बडाने लगते तो  कभी किसी अजीब चीज को देखकर चिल्लाना शुरू कर देते तो कभी बिल्कुल खामोश हो जाते, की वजह समझ में असमर्थ रहे । परिणामस्वरूप मलखे चचा और चाची गांव  लौट आये। गांव में भी सरकारी अस्पताल व तमाम झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज व पाखंडियों द्वारा जादू टोना सबसे हारने के बाद  मलखे चचा बिस्तर से न उठ सके। वह इतने बीमार थे कि लोग कहने लगे कि यह मुश्किल से एक महीना जी जायें तो बहुत है। 
     तभी एक दिन बनवारी शहर से एक लड़के को लेकर आये और बोले कि यह पास के गांव नगला सुमार का रहने वाला है और आज यह बहुत बड़ा मनोचिकित्सक बन गया है इसका नाम है डा. उसमान। मलखे चचा उसे देखते रहे पर कुछ नही बोले। एक दिन उसमान ने अपने मोबाइल में एक रोमांटिक फिल्म दिखायी तो मलखे चचा ने पूरी फिल्म देखी। उसके बाद उसमान ने एक ब्लू फिल्म लगाकर वहीं रख दी और वह बाहर आकर बैठ गया। मलखे चचा ने जैसे ही अजीब आवाजें सुनी तो मोबाईल उठाकर पूरी फिल्म देख डाली। उसमान अंदर आया तो मलखे चचा हड़बड़ा गये। तो उसमान ने अपनी डायरी निकाल कर कुछ प्रश्न किये जिनका मलखे चचा 
 हाँ और ना में जवाब देते चले गये। 
          डॉ. उसमान पूरा केस समझते हुए मन ही मन बोले मिल गया इलाज। और अब वह बिल्कुल सही नतीजे पर पहुंच चुके थे कि इनके साथ करना क्या है? उसमान ने कहा चाची जी मेरे साथ आओ। फिर उसमान ने उन्हें सब समझाया और एक सशक्त प्रश्न किया कि सुहाग चाहिए या संस्कार, आज तय कर लो। वह तुरंत बोली मुझे सुहाग चाहिए बस। जो बोलोगे करने को तैयार हूं बेटा। वह बोला आज शाम मेरी बीवी आयेगी जैसा वो कहे बिल्कुल वैसा करना। वरना हम लोग चाचा जी को हमेशा के लिए खो देगें। चाची आँसू भर के बोलीं क्या बीमारी है उनको? तो उसमान ने कहा कि इस बीमारी को हिस्टीरिया कहते हैं। यह  मनोरोग है। अक्सर यह बीमारी महिलाओं में होती है पर पुरूषों में भी देखी गयी। इस बीमारी की कोई दवा नही और कोई इलाज नहीं। हां बस हिप्नोसिस, साइकोएनेलेसिस द्वारा कोशिश कर सकते हैं।यह सुनकर चाची ने कहा बेटा यह सब मेरे समझ के बाहर है। हां तेरी दुल्हन जो  बोलेगी वह मैं करूंगी बेटा। तुम बस उन्हें बचा लो। उसमान ने कहा बिल्कुल पूरी कोशिश करूंगा। 

चित्र-साभार गूगल

     इधर मलखे चचा खाट पर लैटे दिमागी फैंटसी की कैद से खुद को आजाद करना चाहते थे पर.. वह हकीकत और स्वप्न मे फर्क नही कर पा रहे थे कि यह सच है या सपना। वह लेटे - लेटे कब सो गये पता ही न चला कि अचानक आँख खुली तो सामने शहर की मालकिन को अपने खाट पर अपने करीब बैठा देख वह चौंक गये। तभी वह मलखे चचा  पर किसी कॉलगर्ल की तरह टूट पड़ीं और अतिभद्दे शब्द बोलने लगीं और मालकिन की छुअन से मलखे चचा  मानो महीनों से आज जाग उठे और मालकिन के हांथ से दारू का गिलास लेकर पीने लगे फिर  चचा भी हर गाली हर बुरा शब्द बोलते चले गये। आज दिल की वर्षों पुरानी  गाँठें खुल चुकी थी और मन आजाद पंक्षी की तरह आज सुकून के आकाश में उड़ रहा था। मानो वर्षों पुरानी कोई मांग आज भरपूर तरीके से पूरी हुई थी। फिर आज जो सुकून भरी नींद आयी उससे रात के मायने ही बदल गये। क्योंकि यह रात दद्दा के लिये उनकी नयी जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था। 
     सुबह हुई सूर्य भगवान चचा के सिर पर आ चुके थे और वह उठ बैठे। अब वह ठीक हो चुके थे। सामने खड़े उसमान ने चचा के पास आकर कहा कि कैसें हैं चचा? तो दद्दा ने कहा, ''आज की रात मुझे बहुत सुकून की नींद आई और आज मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं...। डाक्टर बेटे तुमने मुझे ठीक कर दिया, भगवान तुम्हें सदा खुश रखें। 
     मनोवैज्ञानिक उसमान ने कहा, '' शुक्रिया चचा, पर आपकी डॉक्टर तो आपकी बीवी है यानि मेरी चाचीजी।'' 
... मलखे चचा चौंक उठे कि यह सपना है या हकीकत। तभी सामने मलखे की पत्नी पानी देते हुये बोलीं क्या बातें हो रही बेटा। मलखे चचा  ने कहा उसमान बेटा मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा। तो उसमान ने मलखे चाचा के कान में कहा कल रात आपके साथ कोई मालकिन नही थीं बल्कि वह हमारी यहीं चाची थीं। चाची हमारी उस मालकिन से ज्यादा प्यारी हैं। मलखे ने सामने खड़ी अपनी पत्नी की तरफ देखते हुये कहा पर तुम तो गांव की चुप - चुप रहने वाली लाज की वंती फिर कल रात इतनी अंग्रेजी हिन्दी में अश्वील गाली शब्द कहां सीखे तुमने? वह मुस्कुरायीं और मलखे के कान में रात वाले कुछ रफ शब्द दोहराये जिसे सुन मलखे चचा अवाक् रह गये फिर
 जब तक वह कुछ और सोच पाते  कि वह बोलीं कि आपके साथ शहर  मैं भी तो गयी थी यार ... और वहां बहुत कुछ मैंने भी तो देखा था...डार्लिंग। 
      मलखू , लाजवंती के मुँह से डार्लिंग शब्द सुनकर सन्नाटे में आ गये और फिर एकाएक जोर से हँस पड़े। फिर वह अपनी पत्नी और उस मनोवैज्ञानिक लड़के डॉ.उसमान से बोले... यह स्वप्न है या हकीकत  ?तो चाची और उसमान चचा के दोनों कान में एकसाथ बोले  यह स्वपन नही  हक़ीक़त है और यही तो इस बीमारी का  इलाज़ था चाचा... .पर स्वप्न समझ कर यह सब भूल जाओ...!! तभी पास के कुछ बच्चे निकले और बोले चचा आप तो ठीक हो गये, चाय पियोगे चचा? तभी दूसरा बोला चाय गर्म टन्न गिलास। यह सुनकर मलखे चचा ने मुँह भर-भर कर गालियाँ देना शुरू कर दिया। अजानक चचा कि गालियाँ की आवाज़ सुन पड़ोस के सब लोग दौड़ के आ गये कि अरे! वाह चचा ठीक हो गये। उसमान ने कहा तुम लोग सुधर जाओ जाओ समझे, मेरे प्यारे चचा को चिढ़ाया न करो। चलो अब जाओ चचा के लिये चाय ले आओ। तो चचा ने उसमान का गला पकड़ कर कहा,डॉक्टर तुम भी न...!! वहीं पास खड़ीं पड़ोस की चाची बोली चचा की गाली में भी अपनापन होता है। महीनों से सन्नाटा पड़ा था मोहल्ले में.... आज रौनक लौट आयी। दूर खड़ी लाजवंती चाची मन ही मन बोलीं आज वर्षों बाद जरूरत लौट आयी और फिर लाजवंती चाची चारों तरफ सबको देखते हुयें अंदर जातीं हैं और एक छोटे गिलास में चाय लाकर मलखे को देखते हुये कहती हैं कि बहुत दिनों बाद आप सबके चचा ठीक हुये तो आज गर्मागर्म चाय हो ही जाये... तो मलखे चचा यह सुन लाजवंती की तरफ गुस्से से देखते हैं और फिर हँसकर बोलते हैं कि.. और टन्न से कुछ हो भी जाये... तो लाजवंती शर्म से इधर-उधर देखने लगती है। और मलखे उसके हाथ से चाय का गिलास लेकर चाय की चुस्की लेने लगते हैं... यह देख पड़ोस की चाची मन ही मन सोचती हैं कि कल तक जिस चाय से मलखे चचा इतना चिढ़ते थे आज वही चाय, चाह में कैसे बदल गयी? आस- पास खड़े सभी लोग यही प्रश्न लिये चचा के चबूतरे से उतरते चले जाते हैं.... कि पीछे से मलखे चचा के हाथ से गिलास गिरने की आवाज़ आती है और सभी एकाएक पलट कर देखते हैं कि शायद झगड़ा हो गया पर यह देख  सब हैरान रह गये कि चचा, लाजवंती चाची के पांव पर गिरी चाय को अपने अंगोछें से पोछते हुये मजाकिया अंदाजा में कह रहे होते हैं कि कुछ तो शर्म करो लाजो...!!


- ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना
कानपुर उत्तर प्रदेश        

(यह कहानी बदन सराय व जरूरत दोनों टाईटल से प्रकाशित हुई । आप सभी न्यूजपेपर के संपादक जी व पूरी टीम तथा सभी पाठकों का बहुत-बहुत आभार। ) 

                 Summary - 

The summary of this story is that 60 years old people have the right to love and fulfill their physical needs and should not have trouble in other people. True love and true need are not an obligation of any age. The world always says That you have grown old, you should be ashamed to love you. I say that the similarity to the age of love. Every age should be loved even if it is childhood or old age. Worried about his old and sick wife in the old age, keeping her happy, it is humanity that is not a crime.This story strikes on that nefarious thinking and conservative view of the society. This story respects the love of the elderly. Some self-respecting people leave their old age parents, they are the biggest culprits of God. Those who say that the elderly should worship God but not physical and spiritual love. They are stupid. First of all, love must understand that love is the reason behind coming into your world. Love is the first need of everyone.
    To pay our honour and respect to their guardians and elders who has done and has been doing their the novel judicial deed  in the non judicial critical circumstances and situations for the welfare of their United family, social and economical societies of their country and nation and whole the world, must not be neglected anywhere because without them we are nothing at all. They are Hero with us zero. 

'कहानी टाईटल कॉपीराइट @36
            

Published in newspaper - 











क्रमशः - 

क्रमशः










Published in national magazine sach ki dastak. 

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जरूरत - https://hindustanpratigya.com/need/







6 comments:

  1. वाह लेखनी से सम्पूर्ण परिदृश्य आखों के सामने चलचित्र की तरह लाकर आपने अपने कौशल का पुनः परिचय दिया है बधाई हो आपको मॉ शारदा की कृपा आप पर निरंतर बनी रहे

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    1. ससम्मान आभार आदरणीय 🙏💐

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  2. वाह लेखनी से सम्पूर्ण परिदृश्य आखों के सामने चलचित्र की तरह लाकर आपने अपने कौशल का पुनः परिचय दिया है बधाई हो आपको मॉ शारदा की कृपा आप पर निरंतर बनी रहे

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    1. ससम्मान आभार आदरणीय 🙏💐

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    1. बहुत-बहुत आभार आदरणीय 🙏💐

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