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श्री कृष्ण जन्माष्टमी : सृष्टि के पालनहारी हृदयरूपी पालने में विराजें



सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्‍णु जी के 8वें अवतार श्रीकृष्‍ण जी जिन्होंने कारागृह में अवतार लिया और उसी पल से उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव जी समेत समस्त संसार के सारे भवबंधन कट गये, कारागृह के सभी सैनिक सो गये और एक के बाद सातों दरबाजें खुलते चले गये...







सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्‍णु जी के 8वें अवतार श्रीकृष्‍ण जी जिन्होंने कारागृह में अवतार लिया और उसी पल से उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव जी समेत समस्त संसार के सारे भवबंधन कट गये, कारागृह के सभी सैनिक सो गये और एक के बाद सातों दरबाजें खुलते चले गये... और वसुदेव जी जब कान्हा को सूप में लिटाकर नंदबाबा के घर नंदभवन, गोकुल चले तो शेषनाग जी ने अपना विराट रूप लेकर पीछे से नन्ने से कान्हा पर अपने फन की छाया कर दी, फिर मार्ग में यमुना माँ में बाढ़ की स्थिति बन गयी और उसकी लहर नंदबाबा के सिर पार करके कृष्ण चरण रज लेकर शांत हो गयीं, फिर जब यशोदा जी ने अपनी गोद में दिव्य लल्ला देखा तो वह उनका दिव्य मुख देखते ही रह गयीं और उन्होंने अपने लल्ला को सीने से लगा लिया फिर पंचामृत से स्नान कराकर उनका भव्य जन्मोत्सव मनाया गया। बाद में प्रभु कान्हा जी ने विशाल गोवर्द्धन पर्वत अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की, उन्होंने संसार को प्रेम का संदेश दिया, उन्होंने संसार को कंस जैसे अधर्मी पापी से मुक्ति दिलाई और पापी कंस ने जिन सौलह हजार सुकुमारियों को कैद कर रखा था उन्हें भी मुक्ति दी तो वह सुकुमीरियां बोलीं प्रभु समाज में हमें कौन अपनायेगा? तो प्रभु ने कहा जिसका कोई नहीं उसका मैं हूँ, मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ, अब से कोई बुरा बोले तो कहना मेरे स्वामी कृष्ण हैं और कृष्ण जी ने सबकी जिम्मेदारी उठायी और भगवान श्री कृष्ण ने गाय की सेवा, गाय का दूध पिया, माखन खाया,छाछ पी, खीर पूड़ी खायी.. उन्होंन शाकाहार का सुन्दर संदेश दिया,जब उन्होंने अपने गुरू के पुत्र को जिंदा करने के लिए वह मृत्युलोक तक गये और उसे जिन्दा करके, गुरू का अनन्य सम्मान का संदेश दिया। जब उन्होंने द्वारकाधीश होने पर पूरी द्वारिका के सामने अपने दरिद्र मित्र सुदामा को सीने से लगाया, उन्होंने महान विनम्रता और मित्र की पीछे से बहुत बड़ी सहायता करने का बहुत बड़ा संदेश दिया। अब पूरी दुनिया की नारी जाति भगवान श्री कृष्ण को इतना क्यों मानतीं हैं जो सात समंदर पार से माथे पर चंदन लगा तुलसी माला पहन भारत चलीं आती हैं उसका एक बड़ा कारण इस महान घटना से है जब पांडव द्रुतकीड़ा में कौरवों से षड्यंत्र के तहत हार के बाद जब द्रोपदी की लाज दांव पर लगी तो भगवान श्री कृष्ण जी ने द्रोपदी की साड़ी का पल्लू अनंत कर दिया जिसके सामने पापी हार गये और यह वह चमत्कारी रहस्यमयी लीला थी जिसे दुनिया कभी नहीं भूल सकती। बाद में उन्होंने बहरूपिया नकली कृष्ण का भी संहार किया और उन्होंने महाभारत में समस्त पापियों का समूल विनाश करके यह संदेश दिया कि जो सत्य,धर्म, महिलाओं और गर्भस्थ शिशु (से मतलब अश्वस्थामा जिन्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकी) , प्रकृति को अपमानित करेगा, हत्या करेगा तो उसका महाविनाश तय है। उनकी अनेकों कृष्ण लीलाओं ने साबित कर दिया कि दुनिया बनाने वाले स्वंय परमात्मा ने कान्हारूप में धरती की भारतभूमि ब्रजभूमि में अवतार लिया था और इसी भगवद्गीता पर पूरी दुनिया में आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रिसर्च, शोध की सीमा पार हो चुकी है जब अमेरिका के परग्रही विषय के विशेषज्ञों की टीम भी कृष्णमय हो गई उन्होंने ब्रज की गलियों में हर पौराणिक चिन्ह पर शोध की और आश्वस्त होकर बोले कि अंतरिक्ष में कहीं ना कहीं गौलोक  देवलोक जरूर हैं जहां से देवता धरती पर आते थे और धरती पर भी कई देवद्वार आज भी हैं जिनसे इस लोक और उस लोक की कड़ी जुड़ती है। उन्होंने निधिवन जाकर स्पष्ट कहा कि पूरी दुनिया में ऐसा रहस्यमयी वन दूसरा नहीं जहां भगवान श्रीकृष्ण जी के समय के पेड़ कृष्ण गोपी भक्ति में गुम तुलसी रूप में विदमान हैं। इसीलिए पूरी दुनिया के कोने - कोने से शोधार्थी, भक्त, प्रेमी, कान्हा की एक झलक पाने के लिए ब्रजभूमि में आते रहते हैं। और आयें भी क्यों ना क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण जी का आकर्षण ही इतना रहस्यमयी और अद्भुद है जिसकी एक झलक उन्होंने बचपन में ही अपनी मां यशोदा जी को अपने मुंह में सम्पूर्ण सृष्टि, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड यानि अपने परमात्मा स्वरूप के साक्षात् दर्शन करा दिए थे। उन्होंने स्वंय कहा, ''हे! पार्थ मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही सर्वत्र हूँ, तुम जिस मार्ग से भी आओगे, मेरे ही पास आओगे।'' ऐसे भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने महाग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता देकर सम्पूर्ण जगत के हर सवाल का जवाब समाहित कर दिया। उन जगतगुरू भगवान श्री कृष्ण जी के जन्‍मोत्सव को जन्‍माष्‍टमी के रूप में मनाया जाता है।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि जब रोहिणी नक्षत्र से युक्त होती है तो उसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार मध्य रात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों ही प्राप्त होने पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जायेगी। इस बार जन्माष्टमी  में काफी असमंजस हैं। 23 अगस्‍त को जन्‍माष्‍टमी होनी चाहिए, लेकिन अगर रोहिणी नक्षत्र को मानें तो फिर 24 अगस्‍त को कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी होनी चाहिए।


 रोहिणी से युक्त अष्टमी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी कहा जाता है । इस बार हम योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी की 5245 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं।


     भगवान श्री कृष्ण जी की स्तुति





श्री कृष्ण चन्द्र कृपालु भजमन, नन्द नन्दन सुन्दरम्।
अशरण शरण भव भय हरण, आनन्द घन राधा वरम्॥
सिर मोर मुकुट विचित्र मणिमय, मकर कुण्डल धारिणम्।
मुख चन्द्र द्विति नख चन्द्र द्विति, पुष्पित निकुंजविहारिणम्॥
मुस्कान मुनि मन मोहिनी, चितवन चपल वपु नटवरम्।
वन माल ललित कपोल मृदु, अधरन मधुर मुरली धरम्॥
वृषुभान नंदिनी वामदिशि, शोभित सुभग सिहासनम्।
ललितादि सखी जिन सेवहि, करि चवर छत्र उपासनम्॥

भगवान श्री कृष्ण जी ने महाभारत में बताया कि वह अपनी रची हुई इस धरती पर आतें हैं, अवतरित होते हैं -






यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

शब्दार्थ -


श्लोक 7 :

यदा= जब
यदा =जब
हि = वास्तव में
धर्मस्य = धर्म की
ग्लानि: = हानि
भवति = होती है
भारत = हे भारत
अभ्युत्थानम् = वृद्धि
अधर्मस्य  = अधर्म की
तदा  = तब तब
आत्मानं = अपने रूप को रचता हूं
सृजामि = लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
अहम् = मैं

श्लोक 8


परित्राणाय= साधु पुरुषों का

साधूनां =  उद्धार करने के लिए
विनाशाय = विनाश करने के लिए
च = और
दुष्कृताम् = पापकर्म करने वालों का
धर्मसंस्थापन अर्थाय = धर्मकी अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए
सम्भवामि = प्रकट हुआ करता हूं
युगे युगे = युग-युग में

शब्दार्थ-

मैं प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब - तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।

हे! परमात्मा हे! आराध्य मेरी विनम्र प्रार्थना स्वीकार करें।हे! सृष्टि के पालनहार आप सभी भक्तों के हृदयरूपी पालने में सदा विराजे रहें और  सभी का मंगल करें।





आप सभी सम्मानीय शुभचिंतकों को ब्लॉग समाज और हम  सच की दस्तक राष्ट्रीय मासिक पत्रिका वाराणसी परिवार की तरफ से जन्माष्टमी महापर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


🌹जय श्री कृष्ण 🌹🙏💐

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