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महिलाओं से ये मत पूछो कि उनपर क्या गुजरी है?

 




 यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।


अर्थात्  जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं और भारत तो शक्ति पूजा के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। यहां हर साल नवरात्रि पर कन्या पूजन का विधान है व हर मांगलिक कार्य की शुरूआत कन्या के सहयोग के बिना सफल नहीं मानी जाती। फिर भी यहां कुछ राक्षस पांच साल की कन्या से लेकर 90 साल की बृद्धा तक को अपनी हवस का शिकार बनाने में जरा भी नहीं सोचते। हर दिन कहीं न कहीं एक बच्ची की बर्बादी की कहानी लिखी जाती है। कुछ दिन न्यूज चलती है, कुछ दिन मौतों पर गंदी राजनीति होती है, कुछ दिन टीवी डिबेट में आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता है और फिर पीड़ित परिवार को सहायता राशि, सरकारी नौकरी, घर - मकान देकर सरकारें अपना पल्ला छाड़ लेतीं हैं पर सवाल तो वहीं ध्रुव अटल है कि आखिर! यह दरिंदगी पर पूरी तरह नकेल कब कसेगी? आखिर! कब बनेगा बलात्कार मुक्त भारत? कब वो दिन आएगा कि महिलाएं दिन-रात कभी भी बिना भय के बाहर आ जा सकेगीं। पता नहीं वो दिन कब आयेगा? कितने युग बीत गये पर महिलाओं के आँसू हैं जो कभी सूखने का नाम ही नहीं लेते? पुराना इतिहास वैसे भी महिलाओं के आंसुओं से भीगा हुआ है जब इसी समाज के ठेकेदारों द्वारा बनायी रूढ़ियों व एक क्रूर पिता के अंहकार के कारण भगवान शिव की पत्नी मातासती को अपने पति व अपने आत्मसम्मान में दहकते हुए विराट हवनकुंड में खुद को भस्म तक करना पड़ा। महिला जिसका अर्थ होता है ममता, हिम्मत और लाज पर समाज के कुछ क्रूर तथाकथित लोगों ने भगवान की सबसे सुन्दर प्रेमपूर्ण कृति को हमेशा ही बेइज्जत किया है। उसे हमेशा ही कम आंका है। उसके संस्कारी मौन पर हमेशा कुठाराघात हुआ है। एक स्त्री एक नारी एक महिला के अस्तित्व की कहानी इतनी लंबी है कि इस विराट आकाश को कागज बना लिया जाये और विश्व के पेड़ों की कलम, और समंदर को स्याही तब भी उसके प्रेम, समर्पण, त्याग और बदहाली को शब्दों में बांधा नहीं जा सकेगा। उस बच्ची के मन से कोई पूछे कि रात के अंधेरे में उसका ही भाई, पिता, मामा, चाचा, उसके साथ बलात्कार कर देता, उन सिसकियों की गिनती शायद ब्रह्मांड के खाते में भी भगवान को दर्ज करना मुश्किल हो जाता होगा। यह एक ऐसी महादर्द की कराह है कि मानो भारी बारिश के बाद कोई जर्जर मकान को कोई छू दे और वह झरझरा कर ढ़ह जाये। अब आप ना, स्वर्ग की अप्सराओं उर्वशी और मेनका से, पत्थर बनीं अहिल्या से, सतयुग में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारावती से, त्रेतायुग में दशरथ की पत्नी कौशल्या, सुमित्रा व कैकयी से, भगवान श्री राम की बड़ी बहन सांता, भगवान श्री राम की पत्नी मातासीता से, लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला से, इंद्रजीत की पत्नी सुलोचना से, रावण की पत्नी मंदोदरी से, द्वापरयुग में वासुदेव की पत्नी देवकी से, राक्षस नरकासुर के कारागृह में कैद सौलह हजार राजाओं की रानियों से, राजा शांतनु की पत्नी गंगा व सत्यवती पर, पांडवों की पत्नी द्रोपदी से, अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा पर, भगवान श्रीकृष्ण की सखी और भक्त राधारानी और मीराबाई पर तथा कलयुग में सती प्रथा, दासी प्रथा व विधवा प्रथा व जौहर में शहीद हुई महिलाओं व झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई व पन्नाधाय से, यीशु की पत्नी मेरी मेग्दलीन पर व लव जिहाद से धर्मांतरित महिलाओं से व सदियों से अपने सिर पर मानव मल यानि मैला ढ़ोती व सीवर में उतरतीं व अस्पृश्यता की शिकार यानि स्वच्छताकर्मी महिलाएं नहा कर भी त्योहार मांगने आये तब भी उन्हें दूर से ही खाना कपड़े और जमीन में दूर से रखकर ही पैसे दिए जाते हैं, बताओ हम कहां मॉर्डन हुए? हम कितना बदले? हम कितने विकसित हुए? हम कितने पढ़-लिख गये पर हमारी महानतम सोच? इसलिए इन कुंठित

महिलाओं से, शारीरिकरूप से अक्षम्य व समाज के हर वर्ग की उत्पीड़ित महिलाओं से कोलकाता, दिल्ली, बनारस अनेकों महानगरों के रेड एलर्ट एरिया में हजारों की संख्या में सेक्स वर्कर महिलाओं से भारत के सभी नगरों में संचालित वैश्यालयों की महिलाओं से, फिल्मजगत में शोषित महिलाओं से, मानव तस्करी के द्वारा देश व विदेशों में प्रत्येक आयु की बेची गयी महिलाओं से, महिला अंगो की देश विदेश में की गई तस्करी से, भरण पोषण से वंचित महिलाओं से दहेज़ उत्पीड़ित महिलाओं से, दहेज़ हत्या व हलाला सेे पीड़ित व मारी गयीं महिलाओं से, सड़़कों पर मानसिक विक्षिप्त घूमती महिलाओं से, महिला का महिला ही द्वारा उत्पीड़न से उत्पीड़ित महिलाओं से, घरेलू हिंसा से उत्पीड़ित व मारी गयी महिलाओं से, तलाक पायी महिलाओं से, कार्यस्थल व अपने ही घरों में यौनउत्पीड़ित महिलाओं से अवयस्क व वयस्क यौन उत्पीड़न से मारी गयीं महिलाओं से, सफर कर रही महिलाओं से, तथाकथित शिक्षकों व सूबेदारों,प्रधानों, ठेकेदारों, डाक्टरों, पुलिसअफसरों, नेताओं, द्वारा छलीं गयीं महिलाओं से भारत में वास या निवास कर रहीं सभी उम्र की महिलाओं से कन्याभ्रूण हत्या से उत्पीड़ित महिलाओं से, बेटियों को जन्म दे रही महिलाओं से, ढ़ोंग व अंधविश्वास की भेंंट चढ़ी महिलाओं से, तथा अपने परिवार, समाज व देश को सम्भाल रहीं महिलाओं से एवं आजाादी के महानायक नेताजी श्री सुभाष चंद्र की पत्नी एमिली शेंकल बोस, पं. चन्द्रशेखर आजाद की माँ, राम प्रसाद विस्मिमल व लाखों क्रांतिकारियों के परिवारों की महिलाओं पर व आज तक की शहीदों की वीरमहिलाओं से व बृद्धाश्रम व अनाथालयोंं, पागलखानों व सोसलमीडिया की शिकार हुईं सिसकतीं महिलाओं से तथा इस कोरोना काल में बेरोजगार हुईं, बेलाल हुईं व विधवा हुईं महिलाओं, निराश्रित हुयीं महिलाओं से ये मत पूछो कि इन महिलाओं पर क्या गुजरी है? अब वर्तमान समस्त भारतीय महिलाओं को भारत में संचालित ब्रिटिश समर्थक विधायिका की आधीनता के शासन व असुरक्षा की संसदीय कार्य प्रणाली की आवश्यकता नहीं बल्कि अब वर्तमान समस्त भारतीय महिलाओं को अपने भारत में अपने भारत समर्थक अपनी भारत समर्थक भारतीय न्याय पालिका की स्वाधीनता के अनुशासन व सुरक्षा की स्वचालित संघात्मक कार्यप्रणाली की पुन:स्थापना, पुन:क्रियान्वयन व पुन:संचालन की आवश्यकता है। अतः, अन्यायपीड़ित व अपराधपीड़ित न्यायप्रिय समस्त भारतीय महिलाओं को एक साथ मिलकर बहुत बड़े पैमाने पर अपने सभी प्रकार के मतदानों का बहिष्कार कर देना चाहिए। जब तक कि भारत में महिला एवं बालकल्याण पर अत्यंत कठोर कानून क्रियान्वयन न हो जायें। क्योंकि अब भारत में सत्ता परिवर्तन की नहीं बल्कि मजबूत व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत है जिससे कि महिलाओं का आत्मसम्मान एवं पुरूषों का मान सम्मान पुन: कायम हो सके जिससे एक सुखी परिवार, उन्नत समाज और विकसित देश का निर्माण हो सके। पूरी दुनिया में हो रहे महिला अपराध पर संयुक्त राष्ट्र ने 25 नवंबर से 10 दिसंबर तक ‘ओरेंज युअर नेबरहुड’ नामक एक प्रोग्राम का आह्वान किया है। यह महिला हिंसा के खिलाफ एक जनजागृति अभियान है। 25 नवंबर का दिन विश्वभर में महिला हिंसा के उन्मूलन दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज महिलाओं पर हो रहे अपराधों पर आंकड़े यह कहते हैं कि दुनियाभर में लगभग 35% महिलाओं को अपने जीवनकाल में एक न एक बार शारीरिक अथवा यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है।तथा इससे भी अधिक भयावह आंकड़ा यह है कि आज भी पूरे विश्व में लगभग सवा करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें बचपन में जननांगों के खतने जैसी दर्दनाक व खतरनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह अमानवीय परंपरा अफ्रीका व मध्य-पूर्व के लगभग 30 देशों में प्रचलित हैं। यूनिसेफ के अनुसार आने वाले दशक में लगभग 3 करोड़ महिलाओं को इस यातनापूर्ण प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। जिसमें अमेरिकन ब्यूरो ऑफ जस्टिस स्टेटिस्टिक्स (बीजेएस) के सन् 2003-12 के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में हो रहे कुल अपराधों का 21% हिस्सा महिला घरेलू हिंसा श्रेणी में अंतरंग साथियों, परिवारजनों व रिश्तेदारों द्वारा की गई साधारण मारपीट से लेकर यौन हिंसा व बलात्कार तक शामिल हैं।और भारत में तो घरेलू हिंसा के सारे रिकार्ड ही ध्वस्त हैं क्योंकि  भारत के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार यहां हर 3 मिनट में किसी न किसी महिला के खिलाफ अपराध(ऑनर किलिंग,ऐसिड अटैक व अन्य तरह के ) होते हैं।तथा इसी क्रम में आती है मानव तस्करी जो भारत के पड़ोसी देश नेपाल व बांग्लादेश से सर्कस में काम करने के लिए हजारों लड़कियां हर साल अवैध रूप से लाई जाती हैं। नेपाल सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस प्रकार की लड़कियों की अनुमानित संख्या 5,000-10,000 प्रतिवर्ष है। एनसीआरबी के भयावह आंकड़े यह बताते हैं कि देश में साल 2018 की तुलना में 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में खासी बढ़त हुई है। साल 2019 में भारत में रोजाना औसतन 87 दुष्कर्म के मामले सामने आए और महिलाओं के खिलाफ अपराध के चार लाख पांच हजार 861 मामले दर्ज किए गए। यह जानकारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी आंकड़ों में सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार साल 2018 की तुलना में साल 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध सात फीसदी से ज्यादा बढ़े। एनसीआरबी की ओर से 29 सितंबर को जारी 'भारत में अपराध-2019' (Crimes in India-2019) नामक यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 7.3 फीसदी की बढ़त हुई है। साल 2019 में  प्रति एक लाख की आबादी पर दर्ज महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर 62.4 फीसदी रही। साल 2018 में यह दर 58.8 फीसदी रही थी।साल 2018 में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के तीन लाख 78 हजार 236 मामले दर्ज किए गए थे। गृह मंत्रालय ने एक बार फिर स्पष्ट रूप से कहा कि पश्चिम बंगाल ने नवीनतम डाटा साझा नहीं किया है। यही वजह है कि साल 2018 के डाटा का उपयोग राष्ट्रीय और शहर-वार आंकड़ों पर पहुंचने के लिए किया गया है।एनसीआरबी के ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के साथ-साथ बच्चों के खिलाफ अपराधों में तेजी आई है। साल 2018 के मुकाबले 2019 में बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले 4.5 फीसदी बढ़े हैं। साल 2019 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1.48 लाख मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से 46.6 फीसदी मामले अपहरण के थे और 35.3 फीसदी मामले यौन अपराधों के थे। एनसीआरबी केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत काम करता है। इसका काम पूरे देश में अपराधों का डाटा एकत्र करना और उसका अध्ययन करना है। एजेंसी ने 36 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों और 53 महानगरों के आंकड़ों को समेटने के बाद तीन खंड की रिपोर्ट तैयार की है। इस निरंतर बढ़ती समस्याओं के निराकरण हेतु बहुत से कानून बनाए गए हैं। इनमें ‘प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक एक्ट 1944 (जन्म से पूर्व लिंग निर्धारण को रोकने के लिए), डोमेस्टिक वायोलेंस एक्ट 2005 (महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा रोकने हेतु) व इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट (मानव तस्करी रोकने हेतु) मुख्य हैं। हालांकि यह कहना न्यायोचित नहीं होगा कि ये सब कानून अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल ही रहे हैं। अब समय ही बतायेगा कि निर्भया, उन्नाव, हाथरस, जैसे रोज ही हो रहे जघन्य पाप कब रूकेगें। यह मेरा अपना विचार है यह मामले तभी रूक सकते हैं जब कुछ तथाकथित लोगों को भय हो। भय भी ऐसा हो कि विदेश से आने वाले सैलानी भी अपने देश में जाकर यह कह सकें कि भारत में महिलाओं पर बुरी नजर डालना मतलब मौत। जब ऐसा कठोर कानून क्रियान्वयन हो कि दरिंदों के फांसी की वीडियो वायरल हों और उससे पहले बलात्कारियों के पुलिस के द्वारा थर्ड डिग्री देने के वीडियो वायरल किये जायें। इस भयावह वीडियो से ऐसी गंदी मानसिकता वाले लोगों को आत्मसम्मान खोने का व मौत का जब तक भय नहीं होगा तब तक यह सब पूरी तरह कब थमेगा, हम आप कुछ नहीं कह सकते। क्योंकि मौत के डर से ही पाप रूक सकते हैं और कोई दूसरा उपाय नहीं।


__ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना, न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक 

































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