SAVE ALL BIRD - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Monday, September 24, 2012

SAVE ALL BIRD

                
                       ये पंख की पुकार है ..
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 इस तरह जीवों को मारा नहीं करते 
 उनमें भी जान होती है 
 वो भी करते होंगें प्यार किसी से 
 रही  होगी उनकी भी पहिचान किसी से,

      उड़ते रहतें हैं वो किसी  की एक झलक पाने को
      होगी उन्हें भी आरजू किसी  की
      वो भी करते हैं अपनी 'जान' की हिफ़ाजत 
      होता होगा उन्हें भी बेशर्त इश्क किसी  से ।।

ढेरों वादें  किये होंगें अपनी 'जान' से उसने
तुमने मार जो दिया की वो वापस नहीं लौटे 
उनके  शव भी न मिले  उनके परिवारों  को 
बेचारे बिना बात वो बेवफा भी कहलाये होंगें ।।


"क्या मिलता है उन्हें मार के तुमको 
किसी को जिन्दा करने की कोई तरकीब आती है?''

अरे ..उनका भी कोई अपना आँशु बहाता होगा 
दर्द वो अपना किसको सुनायेगें . ..
वो दर्द,तुम महसूस कर नहीं सकते
क्योंकि दिल बन चुका तेरा पत्थर 
और शर्म तुने गवाई है ।।

जा जाकर देख तू अपने दिल की चोखट पर 
हर दीवार पर तेरी करतूत छायी है
सदाएँ गूँजतीं है आँशु इंसाफ मांगते हैं 
तेरी  नज़रें आज तुझको ही कोसतीं है।।

"मत मार  ऐ  इंशा इन निरीह जीवों को 
ये रखते है हौसंला तुझे बर्बाद  करने का"

लगेगी बददुआ इनकी 
जो तू इनका व्यापार करता है

देख ले तू एक बार अपनी सूरत 
आईना तेरा तुझसे कितना  डरता है।।

"बंद कर दे ये ख़ूनी खेल घर लौट जा अपने 
अपनों के दिलों मै तू ख़ोज अपने को"

देख घर मै तुझे कौन चाहता है 
प्यार चाहतें है जीव प्यार तू भी चाहता है 
मान ले तू अपनी दोस्त का कहना 
एक दिन तुझको भी वहीं जाना है।।
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आकांक्षा  सक्सेना 
बाबरपुर,औरैया
 उत्तर प्रदेश




 
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