जीतने की हवस - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Friday, October 26, 2012

जीतने की हवस




                                                   
              

जीतने की हवस
..............................



जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

की,तुम खुद से खुद को हार जाओ

खुद को खुद से जुदा पाओ



   जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

    की,तुम खुद ही मैं मिटते चले जाओ 

    और,खुद को ही भूल जाओ 



जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

की,तुम खुद की राहों मैं डगमगाओ 

खुद ही को ढूँढो और खुद ही को बुलाओ



    जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी
    खुद का खुद पर विश्वास भूल जाओ 
  
    सामाजिक अंधकार को अँधा आईना दिखाओ


जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 
घर की चोखट का पता भूल जाओ 
माँ का दुलार और पिता की डांट भूल जाओ 

      जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

      दया,अहिंसा मानवधर्म भी भूल जाओ 

      दौलत कि हवस मैं खुद ही बलि चढ़ाओ


जीतने कि हवस इतनी न हो तुम्हारी 

परिवार भूल जाओ चमक मैं फिसल जाओ 

दुनिया मैं आने और जाने का सत्य भूल जाओ 


     || कभी भी जीतने कि हवस इतनी न तुम्हारी || 
.............................................
आकांक्षा सक्सेना 
बाबरपुर,औरैया 
उत्तर प्रदेश 

No comments:

Post a Comment