जीतने की हवस




                                                   
              

जीतने की हवस
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जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

की,तुम खुद से खुद को हार जाओ

खुद को खुद से जुदा पाओ



   जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

    की,तुम खुद ही मैं मिटते चले जाओ 

    और,खुद को ही भूल जाओ 



जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

की,तुम खुद की राहों मैं डगमगाओ 

खुद ही को ढूँढो और खुद ही को बुलाओ



    जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी
    खुद का खुद पर विश्वास भूल जाओ 
  
    सामाजिक अंधकार को अँधा आईना दिखाओ


जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 
घर की चोखट का पता भूल जाओ 
माँ का दुलार और पिता की डांट भूल जाओ 

      जीतने की हवस इतनी न हो तुम्हारी 

      दया,अहिंसा मानवधर्म भी भूल जाओ 

      दौलत कि हवस मैं खुद ही बलि चढ़ाओ


जीतने कि हवस इतनी न हो तुम्हारी 

परिवार भूल जाओ चमक मैं फिसल जाओ 

दुनिया मैं आने और जाने का सत्य भूल जाओ 


     || कभी भी जीतने कि हवस इतनी न तुम्हारी || 
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आकांक्षा सक्सेना 
बाबरपुर,औरैया 
उत्तर प्रदेश 

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