- समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Tuesday, November 6, 2012








घमंड काहे का सनम 
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घमंड  काहे का सनम 


साथ जाने को कुछ भी नहीं

पड़े यहीं सिंघासन सारे 

कभी बैठा करते थे शहंशाह 

घमंड कहे का सनम 

साथ जाने को कुछ भी नहीं 

खंड्हर बने महल 

वीरां पड़ीं वो हवेलियाँ 

कोई नही अपना कहने को 

झूठी हैं सारी पहेलियाँ


 घमंड काहे का सनम 


साथ जाने को कुछ भी नहीं 

खुद के अन्दर छिपा है बैठा 

जिसको आत्मा कहते हैं 

जन्मों-जन्मों से जिसको 

समझ न पाए हम 

क्या जानेगें इस दुनिया को 

जब खुद का अपना पता नहीं 

घमंड काहे का सनम 

साथ जाने को कुछ भी नहीं 

प्रेम का नाटक बहुत है 

घर मैं दफनाता कोई नहीं 

जब खुद के घर मैं 

खुद के लिए,

एक कोना तक नहीं 

फिर,घमंड काहे का सनम 

साथ जाने को कुछ भी नहीं ...


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आकांक्षा सक्सेना 

बाबरपुर,औरैया

उत्तर प्रदेश 

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