गीत - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Saturday, August 8, 2015

गीत






दिल का हर साज हो तुम......


दिल का हर साज हो तुम 
मन की आवाज हो तुम
मेरी अँखियों में बसे 
मेरे हमराज हो तुम

       दिल का हर साज हो तुम,मन की आवाज हो तुम

रातों में जब भी जाँगू 
तुझे ही सामने पाऊँ
मेरी धड़कन में बसे
मेरे सरताज हो तुम

         दिल का हर साज हो तुम,मन की आवाज हो तुम

जिधर भी मैं देखूँ
तू ही तू नज़र आये
मेरी श्वासों में बसे
मेरे भगवान हो तुम

         दिल का हर साज हो तुम,मन की आवाज हो तुम

आईना जो मैं देखूँ
तेरा ही अक्स पाऊँ
मेरी पलकों में बसे
हसीन ख्वाब हो तुम

         दिल का हर साज हो तुम,मन की आवाज हो तुम





                                     आकांक्षा सक्सेना
                                      25/09/2011
                                       Monday 8:35 am
                                                









1 comment:

  1. सुन्दर प्रस्तुति !
    आज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !

    ReplyDelete