एक कदम



एक कदम आपका

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दोस्तों हमेशा सिर्फ अपने लिये जीना बस खुद के लिऐ सोचना क्या ये खुदगर्जी नहीं और क्या आप यही  जीवन चुनना चाहेंगे शायद नहीं |
कुछ लोग बड़े मंच पर खड़े होकर समाजहित, राष्ट्रहित, प्रेम और दया  की बड़ी - बड़ी बातें करते हैं पर देखा गया है कि वही लोग जब बस और ट्रेन का सफर कर रहे होते हैं तब अपने साथी यात्री को पूरी यात्रा में उसे खड़े हुऐ यात्रा करते देख,उनका मन नहीं पसीजता जो थोड़ा सा खिसक जाते और वो भी यात्री बैठ जाता | हम दुनिया को खुद को दिखाते तो बहुत महान है पर हैं कितनी संकीर्ण मानसिकता के | इस मानसिकता को बदलना बहुत जरूरी है | वैसे भी विड्म्ना यह है कि जो मूर्तिकार भूखा प्यासा एकाग्रचित हो पत्थर को तरास कर मूर्ति बनाता है | मूर्ति बनाने में उसकी कला और भक्ति दोनों के दर्शन होते हैं पर वह और उसका परिवार गरीबी में जीते हैं उसकी पूरी मेहनत भी उसे नहीं मिलती| एक मूर्ति खरीदने में भी बड़ा मोलभाव चलता | मूर्तिकार अपने रोटी चलाने के लिये अंतत: मूर्ति लागत से भी कम दाम में दे देता है पर देखो ! जो व्यक्ति मोलभाव करके मूर्ति ले गया उसने वो मूर्ति मंदिर में लगा ली और बोला कि जमीन की खुदाई में निकली है फिर क्या दिनों - दिन वो लाखों की कमाई कर डालता है | मतलब यह कि जिसने सच्ची लगन और भक्ति में डूब कर मूर्ति बनायी वो गरीब का गरीब रहा | जिसने मूर्ति खरीदी वो देश के वी.वी.आई.पी. के साथ भोजन कर रहा और रात मंदिर में चढ़ावा गिन रहा और सुबह गुरू के रूप में पूजा जा रहा| ये तो वही बात हुई कि मूंगफली हमेशा फली ही रही उसको गिरी की पहिचान कभी हासिल न हो सकी |आज देश में भारी बदलाव की जरूरत है और सच्चे व्यक्तित्व के लोगों को राजनीति की मुख्यधारा में आने की जरूरत है तभी ये भेदभाव,अंधविश्वास जैसी कुरीतियों से देश स्वतंत्र हो पायेगा | आइये एक कदम बढ़ायें सही कदम के लिये|

ब्लागिष्ट
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश


Comments

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.02.2016) को "कर्तव्य और दायित्व " (चर्चा अंक-2264)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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