Monday, July 18, 2016

मृत्युभोज का हो सामूहिक बहिष्कार




             

मृत्युभोज का हो सामाजिक बहिष्कार

...................................................


दिल-ओ-दिमाग से बहिष्कृत हो मृत्युभोज नामक कुरीति, इस
आंसुओं से भीगी दावत का हो
सामूहिक बहिष्कार :

...................................................

दोस्तों एक तरफ तो हम इंसान चांद, मंगल और प्लूटों पर पहुंच कर अपनी असीम मानसिक क्षमता का परिचय दे रहें हैं | अभी हाल ही मैं चीन देश में एक समय मानव ने जिसके हांथों से दिव्य प्रकाशिक किरणें निकल रहीं थी |उस  समय यात्री मानव ने सड़क पर जा रहे एक रिक्शे चालक का भयंकर सड़क दुर्घटना होने से पहले ही एक सेकण्ड से भी कम समय में उसकी रक्षा की | मतलब उस रिक्शेचालक को प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से अचानक प्रकट होकर उस रिक्शेचालक को उसके रिक्शे सहित सड़क के दूसरी तरफ रख दिया | यही नहीं मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन की पहली फिल्म के प्रोमोशन के वीडियो को ध्यान से देखा गया तो उस वीडियों में एक महिला फोन पर बात करते हुऐ दिख रही है | जबकि उस समय मोबाईल फोन का अविस्कार नहीं हुआ था तो सोचो यह विचित्र मानव कौन है | दोस्तों यह समय यात्री है| भविष्य के उन्नत मानव जिन्होने समय को भी जीत लिया है | जरा सोचिये मानव जाति आज अपने उन्नत परग्रही पूर्वजों से मिलने के समीकरण तैयार कर रही है | अपने देश की महामशीन से वैज्ञानिक वह दिव्य सूक्ष्म कंण ढूंढ रहे है जिससे पृथ्वी बनी | आज दुनिया तेजी से आगें बढ़ रही है | हम धोती-कुर्ता को त्याग जींस पेंट पर आ गये | हम पट्टी कलम-दवात से टेबलेट और लेपटॉप पर आ गये| चिट्ठी-पत्री से मेल, फेसबुक और व्हॉट्सअप पर आ गये और यहां तक ही नहीं कल के गुस्से वाले मां-बाप आज फ्रेण्ड बन गये | देखो समय के साथ-साथ समाज में कितना कुछ बदल गया पर दुख इस बात का है कि यह मरणोपरान्त होने वाला यह मृत्युभोज खिलाने की  परम्परा क्यों नहीं बदली | हम तो बदले पर हमारे साथ समाज के रूढि विचार आखिर ! क्यों नही बदले | पूरे गांव को तेरहंवी खिलाकर खुद कर्ज में डूब कर भूखों मरने की नौबत आ जाती है |वह मंजूर है पर इस कुप्रथा को सब मिलकर बन्द नहीं करा सकते | जबकि इस अंधविश्वासी निंदनीय कुप्रथा का समाज से पलायन होना बहुत आवश्यक है |
        आप ही बताइये किस धार्मिक ग्रंथ में लिखा कि मृत्युभोज अनिवार्य है | धरती पर भगवान नारायण के किस अवतार ने बोला कि तेहरवीं अनिवार्य फिर कहां से और क्यों शुरू की गयी यह कुरीति | कुछ धर्म के ढ़ोगीं ठेकेदारों ने निजहित में इस कुप्रथा को जन्म दियी पर अब तो सभी साक्षर हैं, बुद्धिजीवी है तो क्यों नहीं उठती वो आवाज जिसमें सभी का हित है | आपको पता होगा कि अपने हिन्दु धर्म में 16 संस्कार हैं जिसमें पहला गर्भाधान संस्कार अंतिम सौलहवां अंत्येष्टि संस्कार तो फिर बताईये ये सत्रहवां संस्कार कहां से प्रकट हुआ | आप और हम मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम चन्द्र जी में आस्था रखते हो ना तो आपको पता ही होगा कि उनको जब अपने प्राणप्यारे पिता के स्वर्गवाशी होने का पता चला तो वह जंगल में ही शांत बैठ गये और वचन की लाज रखते हुऐ अयोध्या नही लौटे | उन्होने एक ही वक्त कंदमूल फल खाकर पूरे 12-13 दिन शोक मनाया | यही नहीं पूरी अयोध्या में महीनों किसी घर कढाई नहीं चढी | फिर मृत्युभोज का तो सवाल ही पैदा नही होता | अब सोचिये हम राम जी को तो मानते है पर उनके चरित्र का कितना अनुसरण करते हैं बोलो | हम उनके नाम पर राजनिति करते किराम मंदिर बने हल्ला बोल हो | अरे! दिल में तो राम मंदिर बनाओ तो समाज में कुछ उन्नत परिवर्तन हो सकें | हमारे देश में इस मृत्युभोज नामक सामाजिक कैंसर ने ना जाने कितनें ही गरीब परिवारों को कर्ज में डुबोकर काली नींद सुला दिया | समाज के इस तेरहंवी नामक वायरस ने आज देश की वो हालत की है कि गरीब त्राहि माम कर रहा है | आपको पता ही होगा कि मृत्युभोज में कम से कम 25-30 हजार का खर्ज आता है और अगर यही आंकडा लेके चलें तो 33 लाख मृतकों के मृत्युभोज में लगभग 50 अरब 60 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष खर्च होते हैं | यह धनराशि इतनी बडी है जितना कि कुछ छोटे राज्यों का सालाना बजट होता है |बताओ देश का गरीब कैसे अपनी प्रगृति करे जब यह कुप्रथा उसका दामन तो छोड़े| दोस्तों, यह दकियानूसी विकृत मानसिकता और यह अतिरूढिवादी सोच हमेसा से ही हमारे देश की प्रगृति और विकास में बाधक रहे हैं | तब तो राजा राम मोहन राय और स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद जी से जैसे महान समाज सुधारकों ने समाज में बदलाव की एक लम्बी लडाई लड़ी और दृढ विश्वास से आखिर! वो कामयाब भी हुये | आज वो लोग तो हमारे बीच नही पर उनकी प्रेरणा से हम स्वंय बदल कर ही एक नयी शरूवात कर सकते हैं | आपने देखा ही होगा कि तेरहवीं पर रो-रो कर ही गेहूं छाना- फटका जाता और रोते हुये ही खाना बनता है और नम आंखो से ही परोसा भी जाता है | क्या हम लोगों के दिल पाषाड़ हो गये जो हम आप आंसुओं से भीगा भोजन कर आते हैं | जरा पशुओं को देखो कि उनका साथी बिछुड़ जाये तो वो घास पत्ती तक नही छूते और हम इंसान इतने निर्दयी कब से हो गये कि भाई की मौत पर भाई मृत्युभोज के नाम पर पकवान खा रहे |दोस्तों, क्या हम मानवजाति पशुओं से भी ज्यादा नीचे गिर गयी है | भगवान श्री कृष्ण जी ने महाभारत समय कहा है कि जब भोजन कराने वाला प्रसंन्नचित्त हो तभी उस घर भोजन करो अन्यथा अपनी सोच दूषित और मति भ्रष्ट हो जाती है | हम हिन्दु ना तो भगवान राम को ही मानते और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी को हम तो बस अपने फायदे को ही अपना भगवान मानने लगे हैं | एक सच्ची घटना है मेरे घर के पास ही तीन भाई एक पिता रहते थे |पिता ने अपना सब बड़े लड़के को दे दिया और बीच वाला मजदूरी करके पेट भरता बाद में शादी करके दिन काट रहा और सबसे छोटा वाला भाई बेरोजगार दिनभर घूमता ना दोनो भाई मदद करते और न ही पिता | बेचारा थोडा बहुत कमा भी लेता तो सब उसका पैसा छीन लेते कि तेरी कौन सी घर गृहस्थी है |अंतोगत्वा वह बीमार पड़ गया तो उसकी किसी ने कोई देखभाल नही कि और 25 साल का वह जवान भाई गर्मी के बुखार से मर गया | उसकी मौत पर सब दहाड़ें मार के रो रहे थे | आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी पूरी गांव ऊपर भव्य 50,000 रूपये की तेरहंवी की गयी| ईमानदारी से आप ही बताईयेगा कि क्या ये पचास हजार रूपये से उसको कोई दुकान नहीं खुलवायी जा सकती थी क्या उसका उचित ईलाज और अच्छा भोजन कपडे नही मिल सकते थे | बहुत दुख होता है समाज के इस झूठी शान और इन झूठे दिखावों को देखकर |इस मृत्युभोज से बोलो किसका भला हुआ न ही मरने वाले का और न ही उस गरीब कर्ज लिये परिवार का |हाँ भला हुआ सिर्फ उनका जो इस कुप्रथा को बढ़ावा देकर अपनी जेब और पेट दोनों ही भर रहे और गरीब को कर्ज के बोझ से आत्महत्या को विवश कर रहे |आखिर ! कब सुधरेगें हम | आखिर! यह मौन कब तोड़ेगें हम | अब ये अनीति और अन्यायरूपी फायदे लेना बन्द करे समाज और यह आंसुओं से भीगी दावत मृत्युभोज यह तेहरवीं यह वर्षी सभी कुप्रथाओं का इक सिरे बहिष्कार हो | यह किसी को कोई पुण्य देने वाली रीति नही बल्कि दैहिक दैविक और भौतिक कस्टों में उलझाने वाली और पतन के मार्ग पर ले जाने वाली खतरनाक बला है जिसे पहले अपने दिलो-ओ-दिमाग से पलायन कराना होगा | दोस्तों घर हमारा है, परिवार हमारा है, यह प्यारा देश हमारा है, तो इसे सुन्दर बनाने की भी जिम्मेदारी भी तो हमीं आपकी हुई अत: यह पहल भी हम आप और सम्पूर्ण युवा समाज को करनी होगी तभी हम बदलावरूपी सूर्य के दर्शन कर पायेगें और तभी हम हमारी आगें आने वाली पीढ़ियों के सुनहरे उन्नत भविष्य की कल्पना कर पायेगें|



आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर समाज और हम
कार्यकारी संपादक युवा भारत मैग्जीन
स्क्रिप्ट राईटर फिल्म डाईरेक्टर
विशेष संवादाता
आमजा इंडिया न्यूज पोर्टल
ऑल इण्डिंया युवा सचिव
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा


1 comment: