भगवान श्री चित्रगुप्त जी का अवतरण परिचय - - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Tuesday, February 6, 2018

भगवान श्री चित्रगुप्त जी का अवतरण परिचय -


















उस परमात्माँ परमपिता का निराकार एवं साकार
आत्मक व मनुज परिचय :
............................. 


'' उस परमात्माँ का निराकार ''श्री'' चित्र जो सभी की काया में स्थित चित्त में गुप्त नुमा है एवं उस परमपिता भगवान का साकार ''ॐ'' नुमा चित्र जो सभी की काया में स्थित गुप्त है। उस निराकार कायस्थ परमात्मा को एवं उस साकार कायस्थ भगवान को '' श्री चित्रगुप्ताय: नम: '' एवं ''ॐ नम: चित्रगुप्ताय'' कहते हैं।''  

दक्षादि मुनियों ने ब्रह्माजी से, विशाला नदी तट पर मौजूद श्री दत्तात्रेयजी ने ऋषि पुलस्त्यजी से एवं द्वापर काल में नैमिषारण्य तीर्थ में 88000 ऋषियों व श्रीशोनिकजी ने सूत जी से तथा भीष्म पितामह ने अगस्तजी से उस परमात्माँ परमपिता चित्रगुप्तजी का आत्मक एवं मनुज परिचय पूछा। तब इन सभी लोगों  ने उस परमात्माँ परमपिता चित्रगुप्त जी के बारे में बताया कि चित्रगुप्त जी का वर्णन ऋग्वेद में अध्याय - 4,5,6, अध्याय - 1सूत्र 7-1-24-1,अध्याय - 17 सूत्र-107/10-7-24 में,अर्थवेद - 1-2-32 आखलायन स्त्रोत-4-123 में,ब्रह्मपुराण, शिवपुराण उमासंहिता अध्याय-7ज्ञान संहिता में, ब्रह्मवर्त पुराण, अग्निपुराण अध्याय-203,370 में, कूर्मिपुराण पूर्व भाग अध्याय - 40 में, भविष्यपुराण उत्तराखंड अध्याय - 89में, पद्मपुराण षष्ट खण्ड़-पाताल खण्ड अध्याय - 31-भूखण्ड 16,67,68 स्वर्ग खण्ड में, गरूड़ पुराण, स्कंदपुराण, मत्स्य पुराण, वशिष्ठ पुराण, यमसंहिता, लिंग पुराण, कठोपनिषद, बाल्मीकि रामायण एवं महाभारत श्रीमद्भागवत् गीता में है। 
        इस अनुशासित व स्वाधीन चक्रवर्ती अखण्ड  ब्रह्मांड  का उत्तपत्तिकर्ता एवं विकासकर्ता वह निराकार एवं साकार है। जिसके पास इस ब्रह्मांड का 
लेखा-जोखा है। जिसका बाह्य सम्पूर्ण आकार, साकार '' ॐ'' आकार का है। इसलिये वह साकार ''ॐकार'' है। जिसके बाह्य मुख से ''ऊ'' की आवाज का '' ॐ'' आकार का स्वर निकलता है। इसलिए वह '' ॐकारेश्वर'' है। जिसकी अन्तर्काया का सम्पूर्ण आकार '' श्री'' आकार का है। इसलिए वह निराकार '' श्रीकार'' है। जिसके अंतर्मुख से '' ई'' की आवाज का '' श्री'' स्वर निकलता है। इसलिए वह ''ईश्वर''  है। जिसके अंतर्मुख से '' ई'' की आवाज का परम '' श्री'' स्वर निकलता है। इसलिए वह ''परमेश्वर'' है। जिसके अंतर्मुख से ''ई'' की आवाज का '' श्री'' आकार का स्वर निकलता है। इसलिए वह '' श्रीकारेश्वर'' है। जिसकी, प्रत्येक की व सम्पूर्ण ब्रह्मांड की कंण-कंण  की काया में स्थित जो '' श्री'' चित्र, गुप्त है वह कायस्थ श्री चित्रगुप्त अजर, अमर व अटल परम मातृ आत्मा तत्वी परमातृात्मा परमात्माँ है। जिसे किसी ने नही देखा। जिसे सिर्फ उसके द्वारा प्रदत्त अपनी मति से ही जाना, पहिचाना, माना व स्वीकारा जा सकता है। जिसका क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर, शरीढ़, शरीर तत्व व कोई भी हथियार कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। जो इस ब्रह्मांड का प्रभुसत्तावान प्रभु है। जो मन तांत्रिक है। जिसके मन के बिना इस ब्रह्मांड का कोई पत्ता भी नही हिल सकता। जो सबके अंगसंग है। जिससे इस ब्रह्मांड का जिसके अंदर ही सबकुछ है किसी का भी कोई भी रहस्य छिपा नहीं है। जिसके पास इस ब्रह्मांड का व सभी के शुभ व अशुभ कर्मों का लेखा-जोखा है। जो कालों का काल महाकाल है। जिसके कलम रख देते ही कालचक्र रूक जाता है। जो सभी का निराकार आधारित स्वंयसहायताकारी, प्रतिभाशाली व परोपकारी कर्मराज यानि अधिनियमराज  यानि यमराज यानि सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायाधीश है
एवं जो सभी का साकार आधारित स्वंय सेवाकारी, मर्यादाशाली व सत्यवादी धर्मराज यानि नियमराज यानि  सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश है। जो सौरमंडल के चक्रवर्ती सर्वोच्च ध्रुव तारा चँद्र ग्रही ताराचँद्रवंशी है। जिस ऊपर वाले के यहाँ न तो देर है और न ही अंधेर है। जो अजन्मा है अर्थात् जो अपनी माँ के गर्भ से सिर के बल उल्टा जन्म नही लेता है। जो अवतारी है अर्थात् जो प्रत्येक युग के अंत में मनुज शरीर धारण कर अपनी माँ के गर्भ से पैरों को बल  सीधा अवतरित होता है। जो सर्वोच्च  पारदर्शी न्याय का पुनर्स्थापनाकर्ता  है। जो हिन्दुस्तान के सर्वोच्च न्यायिक नैतिक हिन्दु मानव देश कर्म एवं हिन्दु नागरिक राष्ट्रधर्म की पुनर्स्थापनाकर्ता  है। जो हिन्दुस्तान का सर्वोच्च न्यायिक पुनर्निर्माणकर्ता है। इस कार्य को उसके व उसके वंशज के अतिरिक्त कोई अन्य न तो कर सकता है और न ही कोई अन्य करवा सकता है। क्योंकि जाको काम वाही को साजे। उसका अवतरण प्रत्येक युग के अंत में तभी होता है कि जब-जब होय धर्म की हानि, बाढ़े़ं अधम असुर अभिमानी,  तब-तब धर वह मनुज शरीरा, हरे सभी संतन की पीड़ा।
        जब उस परमात्माँ का इस धरा पर अवतरण होता है तो उसे अपने पिता एवं माता की जरूरत होती है। चित्रगुप्तजी के पिता तारा, हिन्दुस्तान के देवयुग के हिन्दुस्तान की उपन्यायपालिका के आधारित स्वंय सहायताकारी,  प्रतिभाशाली व परोपकारी, लघु संख्यक, हिन्दुस्तानी स्वंय सहायक संघ परिवार के मुखिया सर्वाधिक परमात्मातत्वी चक्रवर्ती सर्वोच्च तारा ग्रही व तारावंशी,  मन तांत्रिक,  क्षत्रिय कायस्थ जाति के हिन्दु कर्मराज यानि योगीराज यानि अधिनियमराज यानि यमराज यानि सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायाधीश है। जो चित्रगुप्तजी के पिता हैं। जिनके उत्तराधिकारी चित्रगुप्तजी हैं।
       चित्रगुप्तजी के नाना ब्रह्माजी हिन्दुस्तान के देवयुग के हिन्दुस्तान की विधायिका के सरकारी राजनैतिक समाज के मुखिया सर्वाधिक क्षितितत्वी, सोमग्रही व सोम वंशी, प्रजामांत्रिक ब्राह्मण वर्ण के हिन्दु प्रधानमंत्री हैं जिनकी पुत्री चन्द्रावती उर्फ सरस्वती जी हैं जो चित्रगुप्त जी की माताजी हैं। इसलिये श्री चित्रगुप्त जी अपने पिता तारा व अपनी माता चँद्रावती उर्फ सरस्वती के नाम से ताराचन्द्र ग्रही व ताराचन्द्रवंशी हैं। जो अपने पिता व माता के संसर्ग से कार्तिक शुक्ल दौज यानि भाई दौज यानि यमद्वितिया के दिन अवतरित हुये थे। इस हेतु ब्रह्माजी ने 11हजार एक सौ वर्ष तप किया था। तब 
श्री चित्रगुप्तजी ने अपना दीप्तमान,  तेजमय, 
श्यामवर्ण मषि - लेखनी - तलवार स्वरूप का ईश्वरीय दर्शन ब्रह्माजी को दिया था। तदोपरांत ब्रह्माजी की इच्छानुसार श्री चित्रगुप्तजी ने मनुज शरीररूप में क्षिप्रा नदी तट पर, कोटि क्षेत्र,  कोटि नगर, महाकाल मंदिर के निकट,  अंकपात नामक स्थान पर अवंतिकापुरी- उज्जैन में 12000 वर्ष परमेश्वरी की तपस्या की थी। चित्रा नक्षत्र में श्रीचित्रगुप्तजी का राज्याभिषेक हुआ। इस अवसर पर समस्त देवताओं ने पुष्पवर्षा कर उनका अभिनंदन किया। चित्रगुप्तजी का कार्यस्थल पुष्पभद्रा नदी तट पर स्थित बटबृक्ष के पास यमराजपुर यानि सूर्यपुर यानि धर्मपुर रहा। 
      श्री चित्रगुप्त जी का विवाह हिन्दुस्तान की देवयुग की न्यायपालिका के आधारित स्वंयसेवाकारी, मर्यादाशाली व सत्यवादी,  अल्पसंख्यक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के मुखिया चक्रवर्ती सूर्यग्रही व सूर्यवंशी,  सर्वाधिक शरीर तत्वी,गणतांत्रिक,  क्षत्रिय कायस्थ वर्ण के हिन्दु धर्मराज यानि नियमराज यानि सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश सूर्य देव यानि विवश्वान के पुत्र धर्मशर्मा की पुत्री इरावती यानि शोभावती के साथ एवं धर्मशर्मा के भाई श्राद्धदेव की पुत्री नंदनी यानि दक्षिणा के साथ, भगवान सूर्य, शंकरजी एवं मनु जी की इच्छानुसार हुआ था।  
    श्री चित्रगुप्त जी के पुत्र न. 1 भानु उर्फ धर्मध्वज श्रीवास्तव न.2- विभानु उर्फ श्यामसुंदर सूरजध्वज न. 3- विश्वभानु उर्फ सुमंत निगम न. 4- वीर्यभानु उर्फ सदानंद कुलश्रेष्ठ न. 5- चारू उर्फ युगंधर माथुर न. 6- चित्रचारू उर्फ दामोदर करण न. 7- मतिमान उर्फ रामदयाल सक्सेना न. 8- सुचारू उर्फ धर्मदत्त गौड़ न. 9- चारूढ़ उर्फ दीनदयाल अष्ठाना न.10-हिमवान उर्फ सारंगधर अमबिष्ट न. 11-चित्र उर्फ भानुप्रकाश भटनागर न. 12- अतिन्द्रिय उर्फ राघौराम वाल्मीकि हैं। 
  इन 12 पुत्रों के गोत्र, अवर, शाखा व आराध्य निम्न लिखित हैं - 
न. 1- श्रीहर्ष, गोधादालभ्य, तैतरी, लक्ष्मी ।
न. 2- सम्भर, अंगऋषि (बृहस्पति), कर्षी, दुर्गा। 
न. 3- माण्डप, भार्गव-चवन-अमयन्त, सकतानी,जयंती। 
न. 4- हरति, मानधाता, अम्बरीष, लक्ष्मी। 
न. 5- कश्यप, यमदाग्नि, माधुरी, दुर्गा। 
न. 6- दालभ्य, भारद्वाज, सूरी, शाकम्बरी। 
न. 7- हंस, भार्गव-यादष, साकली, शाकम्बरी। 
न. 8- गौतम, अंगऋषि - अयासे-सुनाली, जयंती। 
न. 9- सम्भर, बृहस्पति-भार्गव, कायसचनी, शाकम्बरी। न. 10-वशिष्ठ,इन्द्रप्रव-भरदोष,मूर्षी,दुर्गा।
न.11-भट,अंगऋषि - गौतम, अत्री, जयंती। 
न. 12-वाल्मीकि,श्रंगी समिष, बृक्षवती, लक्ष्मी ।
   इन बारह पुत्रों की पत्नियां, हिन्दुस्तान के देवयुग की उपविधायिका के सहकारी उपराजनैतिक समाज के मुखिया सर्वाधिक गगनतत्वी,  बृहस्पतिग्रही,  बृहस्पतिवंशी,  जनमांत्रिक,  ब्रह्मांण जाति के हिन्दु 
उपप्रधानमंत्री शेषनाग जी की वंशज निम्नलिखित नागकन्याओं के साथ हुआ था - 
न. 1- नर्वदा व मुनमति न. 2-भद्रकालिनी न. 3-गंडकी.4- कामकला न. 5- पद्मिनी न. 6- कोकिलश्वाना न. 7-रम्भा न. 8- पंकजाक्षी न. 9-तजभाषिनी उर्फ असगंधबेनी न. 10- भुजंगाक्षी न. 11- मालनी न. 12-मंजुभाषिनी।
इन बारह पुत्रों व पुत्रबधुओं के निवास स्थान - 
न. 1- श्रीवासनगर  यानि श्रीनगर-जम्मू कश्मीर। 
न. 2- मगध। 
न. 3- मैग देश यानि सरयूपार। 
न. 4- किलाप देश यानि कल्पनाग्राम यानि अलकापुरी के पास कलापिक ग्राम। 
न. 5- मथुरा। 
न. 6- कर्णाटक। 
न. 7- काबुल कंधार। 
न. 8-गौड़देश। 
न. 9-अहिस्थान यानि नेपाल। 
न. 10- ब्रह्मवर्त प्रदेश यानि बिठूर। 
न. 11-सहस्त्रवाहु नगरी यानि भटानगर यानि भटनगर। 
न. 12-वाल्मीकिप्रदेश यानि चित्रकूट। 
        चित्रगुप्तजी के पुत्रों के पुत्र -
न. (1) -श्रीवास्तव व 1. नर्वदा के पुत्र देवदत्त व घनश्याम  2-मुनमति के पुत्र 1.सर्वज्ञ व रजनी (ऋषि पुलस्त्य के नाती कुबेर के भाई रावण की पत्नी मंदोदरी की बहन व मयदानव की पुत्री) 2- धन्वंतरि व अमरावती(नरण्यविंद की पुत्री) के पुत्र सुषैन। 
न. (2) - सूरजध्वज व भद्रकालिनी के पुत्र- न. 1 सूर्यमेन  न. 2- यज्ञमेन 3- महासेन 4- देवसेन। 
न. (3) - निगम व गंडकी के पुत्र आरूणि।
न.( 4) - कुलश्रेष्ठ व कामकला के पुत्र - न. 1-ओजस्वी न. 2- यशस्वी 3- तेजस्वी 4- बहुविक्रम।
न.( 5) - माथुर व पद्मिनी के पुत्र - 1-विनय 2- दान्त 3- शान्त 4- ज्ञानवन  5- बाहुवीर्य 6-बाहुबाल।
न. (6) - कर्ण व कोकिलश्वाना के पुत्र - 1-सरल 2- उदार। 
न. (7) - सक्सेना व रम्भा के पुत्र - क्षेमकर 2- शंकर 3- बृष 4- बृषगति 5- गुरू।
न. (8) - गौड़ व पंकजाक्षी के पुत्र - 1-उत्कृति 2- प्रकृति 3- ज्ञाति 4- शांति 5- शांतपुरम 6-धर्म 7-धृति।
न. (9) - अष्ठाना व तजभाषिनी उर्फ असगंधबेनी के पुत्र - 1-स्वाभानु 2-महाभानु।
न. (10)- अम्बिष्ट  व भुजंगाक्षी के पुत्र - 1-अम्बादत्त 2-जयादत्त 3- विजयदत्त 4-विडौजा 5- तमौजा 6-महौजा।
न.(11) -भटनागर व मालनी के पुत्र-1- चित्ररथ 2-विचित्र 3-चित्रकर्मी 4-सकर्मा 5-सुश्लिष्ट 6-श्लिष्ट।
न. (12) - वाल्मीकि व मंजुभाषिनी के पुत्र - 1-सूर 2-धीर 3-गम्भीर। 
   नोट :  1- हिन्दुक्षत्रिय कायस्थ जाति के लोग ब्रह्मकार्य तो कर सकते हैं परन्तु क्षत्रिय होने के कारण दक्षिणा नही लेते हैं। 
            2- प्रत्येक व्यक्ति को उसके नाम के पूर्व ''श्री'', सम्मानित शब्द श्रीवास्तव ने दिया है और प्रत्येक विवाहित महिला एवं प्रत्येक विवाहित पुरूष को ''श्रीमति'' व ''श्रीमान्'' सम्मानित शब्द श्रीवास्तव व सक्सेना उर्फ 'मतिमान'  ने दिया है। 
उपरोक्त धर्मग्रंथों व महापुरुषों के 
अनुसार देवयुग के,  हिन्दुस्तान की विधायिका के,  सरकारी राजनैतिक समाज के,  मुखिया सर्वाधिक क्षितितत्वी,  सोमग्रही, सोमवंशी,  प्रजामांत्रिक, ब्राह्मण  वर्ण के हिन्दु प्रधानमंत्री ब्रह्मजी ने तत्कालीन हिन्दुस्तान की जनता को अपनी विभाजनकारी व विनाशकारी बदनियति व बदनीति के तहत उनके जन्मिक, वैवाहिक व मृतक जीवन व जीविका की टैक्सचोरी व इस कालेधन की जमाखोरी का लालच देकर परमात्मा द्वारा प्रदत्त उनकी मति दान में लेकर उन्हें मतिहीन, अशिक्षित,  बेरोजगार,  अपराधी व अन्यायपीड़ित बना दिया जिससे पर्यावरण प्रदूषित व जनसंख्याबृद्धि होने लगी। सभी लोग अपना,  अपने परिवार का,  अपने  समाज का,  अपने देश व राष्ट्र का एवं अपने हिन्दु कर्म व हिन्दु धर्म का विभाजन एवं
विनाश करने में जुट गये। अपने प्रधानमंत्री ब्रह्मा जी की इस अलोकतांत्रिक राजव्यवस्था संचालन की विधायिका की संसदीय कार्यप्रणाली के दुष्परिणामों से आहत समस्त अन्यायपीड़ित जनता अपने प्रधानमंत्री ब्रह्मा जी की ओर विमुख हो गयी और उसने अपने मताधिकार के तहत अपने प्रधानमंत्री ब्रह्माजी को अपनी मतिदान न करके अपने संविधान से प्राप्त अपने मताधिकार के तहत निडर होकर मतिदान का बहिष्कार कर दिया। अपने  प्रधानमंत्री ब्रह्माजी की पूजा अर्चना का भी बहिष्कार कर दिया आज भी कोई हिन्दु,  ब्रह्मा जी की पूजा नही करता है। समस्त अन्यायपीड़ित जनता अपने परमात्मा की ओर उन्मुख हो गयी। इससे तत्कालीन हिन्दुस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका पर क्षमता से अधिक अनावश्यक मामलों का बोझ बढ़ गया जिससे घबरा कर इस बोझ को समाप्त करने के लिये तत्कालीन हिन्दुस्तान की सर्वोच्च न्यायालय पालिका की आधारित स्वंय सेवाकारी,  मर्यादाशाली व सत्यवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के सर्वाधिक शरीर तत्वी,  चक्रवर्ती सूर्य ग्रही सूर्यवंशी,  अल्पसंख्यक,  गणतांत्रिक,  क्षत्रिय कायस्थ वर्ण के हिन्दु धर्मराज यानि नियमराज यानि सर्वोच्च  मुख्य न्यायाधीश 
श्री गणेशजी ने अपने ईश्वरीय सहायताकारी हिन्दुस्तान की सर्वोच्च उपन्यायपालिका के आधारित स्वंय सहायताकारी,  प्रतिभाशाली व परोपकारी हिन्दुस्तानी स्वंयसहायक संघ परिवार के सर्वाधिक परमात्मातत्वी चक्रवर्ती ताराचँद्रग्रही व ताराचँद्रवंशी,  लघुसंख्यक, मनतांत्रिक,   क्षत्रिय कायस्थजाति के हिन्दु कर्मराज यानि योगीराज यानि अधिनियमराज यानि यमराज यानि सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायाधीश यानि उस परमात्माँ की मांग तत्कालीन प्रधानमंत्री ब्रह्माजी से की और इस मांग को ब्रह्माजी ने तपस्या कर पूरा किया।
      अपना राज्याभिषेक होने के बाद तत्कालीन  हिन्दुस्तान के सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायाधीश 
  श्री चित्रगुप्त जी  ने,  हिन्दुस्तान के सर्वोच्च मुख्य  न्यायाधीश के द्वारा हिन्दुस्तान के पूर्व निर्धारित व पूर्व प्रचलित पारदर्शी न्याय की पुनर्स्थापना करवाने के लिये, हिन्दुस्तान का सर्वोच्च न्यायिक पारदर्शी पुनर्निर्माण करवाने के लिये एवं हिन्दुस्तान के सर्वोच्च न्यायिक हिन्दु मानव देशकर्म व हिन्दु नागरिक राष्ट्रधर्म की पुनर्स्थापना करवाने के लिये,  सबका साथ व सबका विकास की नेक नियति व नेकनीति की उत्तराधिकारित,  पूर्व निर्धारित व पूर्वप्रचलित पारदर्शी न्याय की,  लोकतांत्रिक राजव्यवस्था संचालन की,  उपन्यायपालिका की,  उपसंघात्मक ईश्वरीय कार्य प्रणाली प्रचलित करवायी।  जिससे तत्कालीन 
हिन्दुस्तान की जनता का जीवन व जीविका टैक्सपैड होने लगी।  सभी लोग शिक्षित,  रोजगारयुक्त,  अपराधमुक्त व न्याययुक्त होने लगे।  पर्यावरण शुद्ध व जनसंख्यानियंत्रित होने लगी। सभी लोग अपना, अपने परिवार का,  अपने समाज का व अपने नैतिक हिन्दु  कर्म व अपने   नैतिक हिन्दु धर्म का संगठन एवं विकास करने में जुटने लगे। हिन्दुस्तान में श्री चित्रगुप्त जी की व उनकी व्यवस्था की पूजा - अर्चना एवं उनकी जय-जयकार होने लगी। सभी लोग अपना अनुशासित व स्वाधीन सुखी जीवन बिताने लगे।
      श्री चित्रगुप्त जी के 12पुत्रों व उनके वंशजों की उपलब्धियां - 
1-श्रीवास्तव :  इनके वंशज का एक छत्र राज्य शक संवत् 787, सन 855 तथा विक्रम संवत 912तक जम्मू कश्मीर में रहा। इस वंश के 16 लोगों ने 260 वर्ष 5माह 20दिन अनुशासन किया। मगध के अनुशासक चंद्रगुप्त ने इन्हें राजाधिराज कहा। 
2- सूरजध्वज : इनके ध्वज में ''सूर्य''  चिन्ह रहा है। 
3- निगम : निगम नगर 500ई. के लगभग मौजूद था। बसाद्र की खुदाई में प्राप्त मुद्राओं से यह सिद्ध है। इनकी कदीम व उनमाय दो शाखाएं हैं। 
4- कुलश्रेष्ठ : यह कलापिकग्राम के अनुशासक रहे। इनके 6 खेड़ा 12 गोत्र है। 
5- माथुर : यह मथुरा के अनुशासक रहे। इनकी देहलवी, कच्छी, पंचौली, पचौली, गोत्र शाखाएं हैं। 
6- कर्ण : ये सूर्य उपासक रहे और उड़ीसा के पटनायक कहलाये। 
7- सक्सेना : उन्होंने सकन देश में शिवपुर नगर बसाया और शंकर जी के उपासक रहे तथा इनके वंशज इक्ष्वाकु वंशजों के मंत्री रहे।  सूर्यसेना : कुश  के खजांची थे। कुछ लोग आर्यान यानि ईरान चले गये थे। इनकी तीसरी शाखा खरौआ है। 
8- गौड़ : उड़ीसा व बंगाल में रहे महाभारत युद्ध में इनके वंशज भगदत्त ने दुर्योधन की सहायता की थी। इसी वंश में प्रतापी लालसेन हुये।  इनकी शाखायें सुमाली, खरे, गौड़, बंगाली, जौनपुरी, बँदायूनी हैं। 
9- अष्ठाना : इन्हें बनारस के राजा ने आठ रत्न प्रधान किये थे। शरकी व मगरवी शाखाएं हैं। 
10- अम्बिष्ट : इनका वर्णन महाभारत के द्रौढ़ पर्व में अध्याय 16 में है। इनकी संख्या लखनऊ के कोठार में अधिक है। 
11- भटनागर : इनका भटेनरदुर्ग एतिहासिक। इनके दुर्ग पर  गजनवी, तैमूर, कामरान व हुमायूं ने आक्रमण किया था। इनकी शाखाएं वश्या, पंजाबी, गौड़, भनागरी हैं। 
12- वाल्मीकि : ये तपस्वी रहे हैं तथा इनकी तीन शाखायें बम्बई सूरती व कच्छी कहीं जातीं हैं। 
प्रान्तीय  स्थति :
  
     देश के किसी भी क्षेत्र में इनकी कोई भी शाखा निवास करती है फिर भी प्रान्तीय कुछ पहिचाने निम्नलिखित हैं - 
1-बंगाल में : बोस, घोष, दत्ता, मित्रा, दास डे, सेन, सिन्हा, राठी पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त बंगाल चालू - कार, पालित, चँद्रशाह, भद्रधर, नंदी, देव, मित्र, मलिक, मुंशी, गोहा, राय, पालनाग, फर्नादि, कुंद, सो सिन्हा, रक्षित, अंकुर, अहम, नंदन, नाथज, विश्वास, सरकार रे, चौधरी, शरमन, वर्मन, भावा, नद, गुप्त, मृत्युंजय है। 
2- पंजाब में : गोविल, लहरी, रायजादा, हजैला, विद्यार्थी, चौधरी, जौहरी, विशरिया, सिन्हा हैं। 
3- राजस्थान में : पंचौली, भैया है। 
4- गुजरात में : चँद्रसेनी, प्रभु, मेहता, बल्लभजी, वाल्मीकि, सूरजध्वज, राजे, प्रधान, कोठारी, बोलकर, धुरधुर, देसाई, ब्रह्मड़का, नामक, मानकर, बेलकर, व्यवहारकर हैं।
5- महाराष्ट्र में : दवणों, कोक, पठारे(दमणप्रदेशी), चित्रे, गुप्ते, मथुरे, ठाकरे, देशपांडे, कोर , दोदे, ताहम्वे, दिघे, सुले, लिखित, बेन्दे, राजे, भीसेशागले, मोहिते, मोहिले, तुंगारे, दुर्वे, फणसे, रणदिवे, गड़करी, चौकल, श्रोत्रीय, प्रधान, वैद्य, जयवते, समर्थ, दलवी, देशमुख, चौकल, मौकाशी, चिटणवीश, चिटनीस, कोटिनीस, कारखानीस, फडणीस, पोतनीस, सविनीज, हाजरिनीस, कारविक,त्रिंगबक, तासकर, पाटणकर, खोपकर, खेडुलकर, भेड़कर, विडज्वालकर, कुलाकर, वामनराजे, त्रम्बकराजे, सोवालकर, देवलेकर, नाडकर, पालकर, कीभेकट, धैर्यवान, सजित, विजयकर, त्रिलोकी, प्रभाकर, वचलकर, आनंदकर हैं। स्कंदपुराण के अनुसार इनकी 79शाखायें हैं। 
6- दक्षिण भारत में : मुदालियर, नायडू, पिल्लई, नायर, राजू, मेनन, राव, रेड्डी, करना, लाल, कार्णिक हैं।  
7- उड़ीसा में - पटनायक, कानूनगो, मोहंती, बोहिरार हैं। 
8- आसाम में - बरूआ, चक्रवर्ती, पुरूषों हैं। 
9- सिने प्रांत में - आफिम फाजिल हैं। 
अंतरराष्ट्रीय स्थिति :
....................... 
क्षत्रिय कायस्थ जाति के हिन्दु अपनी सुविधानुसार विदेशों में भी निवास करते हैं। 
गर्व से कहो व गर्व से करो - 
...................... 
हम सभी क्षत्रिय कायस्थ जाति के हिन्दू  उस परमात्मा के वंशज हैं जिस परमात्मा का ध्यान सभी देव करते हैं।     
निवेदित आग्रह :
................... 
जिस प्रकार हम सभी क्षत्रिय कायस्थजाति के हिन्दु उस अवतारी परमात्मा का अवतरण दिवस यानि यमद्वितिया यानि भाईद्विज का पर्वहर्ष उल्लास से मनाते हैं। उसी प्रकार हमें उनका राज्याभिषेक प्रगटोत्सव दिवस चैत्र पूर्णिमा को भी उसी हर्षोल्लास के साथ मनाकर उस नेक व एक मालिक का 
आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। अत:, इस वास्ते हमें उस निराकार चित्रगुप्त नम: को अपने चित्त में एवं उस साकार '' ऊँ नम: श्री चित्रगुप्ताय'' परमात्मा को अपने घर के देवालय में पुनर्स्थापित करना चाहिए और उनसे उनके प्रगट होने की प्रार्थना करनी चाहिए एवं उनके ध्यान में मग्न रहना चाहिए। अवसर मिलने पर उनका दर्शन ''अंकपात मंदिर'' जो उज्जैन में स्थित है, वहाँ जाकर ''कलम-स्याही'' उन्हें अर्पित कर उनकी पूजा अर्चना कर अपनी मनोकामना पूरी करनी चाहिये तथा उनकी लुफ्त होती प्राचीन न्यायालयी कैथी यानि कैथ
 यानि कायस्थी भाषा का भी अध्यन करना चाहिये। 
अहम प्रश्न - 
हम सभी लोगों को आखिर उस परमात्माँ ने मानव को ही अपने समान निराकार मतिमान नेक इंसान व सबसे समान साकार मतिवान एक भगवान क्यों बनाया? वह चाहता तो प्रत्येक मानव को भी अन्य कई तरह कुछ और भी तो बना सकता था? उसे सिर्फ अपनी पूजा-अर्चना ही करवानी होती तो इस बाबत भी उसके पास कोई कमी नही। वह जानता है कि उसका काम सिर्फ मानव ही कर सकता है। अन्य कोई नही। इसलिए उस परमात्माँ ने प्रत्येक मानव को अपने समान निराकार मतिमान नेक इंसान व साकार एक भगवान बनाकर अपने सम्बंधित काम को वहां प्रत्येक मानव को अपने सृजनशील व प्रगतिशील मानव जीवन के उद्देश्य को निर्धारित समय के अंदर पूरा करने को इस धरती पर भेजा। इसीलिये वह प्रत्येक मानव को भूखा जगाता है वहीं खिलाकर सुलाता है जो उसकी ओर उन्मुख है। क्या हम सभी मानव उस परमात्माँ का काम कर सकते हैं? यदि हम सभी मानव उसका काम कर पाते तो फिर उस चक्रवर्ती परमात्माँ को भला '' श्री चित्रगुप्ताय नम:'' एवं '' ॐनम:श्री चित्रगुप्ताय'', अर्थात् उस ''स्वास्तिक'' को '' श्री ओम'' कौन कहता। उसे अपना काम करने के लिये इस धरा पर स्वंय भला क्यों अवतरित होना होता। 
      इस प्रकार श्री चित्रगुप्त जी का कार्यकाल मनुस्मृति अध्याय-1श्लोक64 से 79के अनुसार 1960853088वर्ष विक्रम संवत 2044 तक रहा।  
नोट- भगवान श्री चित्रगुप्त जी के बारें में जो भी जानकारी अभी तक प्राप्त है वह उपरोक्त है। यह सब जानकारी कुछ धर्म ग्रन्थों-पुराणों, धार्मिक पत्र - पत्रिकाओं के गहन अध्यन-चिंतन द्वारा प्राप्त है। हो सकता है कुछ तथ्यों को लेकर आपके मन मन-मस्तिष्क में संशय हो। कृपयाअन्यथा न लेकर अाप अपने विचारों से हमें अवगत करायें। 
   धन्यवाद। 
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐


No comments:

Post a Comment