Monday, March 5, 2018

कहानी- '' यकीन'' - चर्चित लेखक माइटी इकबाल

   

Mighty Equbal 

 A great writer, bold journalist, satirist writer, critic, selfless social activist.
Journalist(Gold medalist) 

Times of India Group

Suport with Sach ki dastak National magazine. 




 कहानी -




                  '' यकीन ''

               .................................


'' यह कहानी समाज के कोढ़ बन चुकी महिलाओं के प्रति देहपिशाची बीमार मानसिकता के लोगों तहत महिलाओं पर होने वाले यौन शोषण पर आधारित है। गौरतलब है कि आज 71% महिलाएं इनडोर /आउटडोर शोषण की शिकार हैं। जहाँ हर दस मिनट पर छोटी-छोटी बच्चियों के उनके अपनों के द्वारा बलात्कार होता है और हर दस मिनट पर बच्चियों को बहला-फुसला कर ले जाकर उनको देहव्यापार की काली- अंधेरी दुनिया में जाकर गुमनाम कर दिया जाता है।आप सोच रहे होगें कि इसमे आखिर!  दोषी कौन है? तो अगर आप सच सुन सकें तो वह दोषी हम और आप का किसी अजनबी पर आंख मूँदकर ''यकीन''करना है। 

       बन्ने मियाँ अपनी दहलीज़ पर बैठे कोई कहानी खंगालने में मशगूल थे कि उनके प्रिय मित्र दलबीर सिंह जो सिटी एसपी. पी ओहदे पर कार्यरत थे। जिन्हें आशा के विपरीत शेरो-अदब से काफी दिलचस्पी थी। आज पहुंचे फिर दुआ न सलाम पूछ बैठे, क्या पढ़ रहे हो बन्ने मियाँ? बन्ने मियाँ ने एक मुख्तार सा उत्तर दिया, मंटू की कहानी '' बाबू गोपी नाथ''! दलबीर सिंह को जैसे एक झटका सा लगा। नतीजा, बुरा सा मुँह बनाए और कहा, '' छी छी लाहौल वला कुवत''।

बन्ने मियाँ ने पूछा, क्या हुआ दलबीर सिंह, ऐसा मैने क्या कह दिया जो तुम मुझ पर लाहौल भेजने लगे? में दलवीर सिंह ने कहा कि अमां यार अव्वल तो,  तू ऐसा कुछ मत पढ़ लिख कि आज के प्रोफेशनल मुल्ला मौलवी तुझ पर भी दोबारा कल्मा पढ़ने का फतवा सादिर कर दें, दूसरी यह कि क्यों पढ़ते हो तुम किसी ऐसे कहानीकार जिस पर तमाम उम्र अश्लील कहानीकार होने का इल्जाम आयद रहा, या फिर क्यों पढ़ते हो कोई ऐसी कहानी जिसे अश्लीलता का प्रतीक, मानसिक अय्याशी की सनद दी जा चुकी हो।

      दलबीर सिंह का कमेन्ट्स सुन कर बन्ने मियाँ ने एक जोरदार कहकहा लगाया और कहा आज मुझे ये बात समझ में आ चुकी कि आखिर! अपने यार दोस्त तुम पंजाबियों को पालने की चीज क्यों समझते हैं और फिर पूछा कि अच्छा ये बताओ तुम मंटू और उसकी कहानियों के संदर्भ में जानते क्या हो? दलबीर ने बेबाकी से कहा अमां यार वही मंटू ना जिसकी आधी उम्र जेल में आधी पागल खाने में गुजरी, वही मंटू ना जो तमाम उम्र अश्लील कहानियाँ लिखता और लिखकर नौजवानों को फ्रॉड की थ्योरी पढ़ाता और समाज को गुमराह करता रहा, मंटू की वहीं कहानी '' बाबू गोपी नाथ'' ना जिसमें एक जगह उसका एक पात्र ये संवाद कहते मिलता है कि, '' मुझे दो जगहों पर काफी सुकून मिलता है एक मजारों पर दूसरा रंडियों के कोठों पर''।
      बन्ने मियाँ एक बार फिर जोरदार कहकहा लगाए और कहा, दलबीर सिंह तुम्हें समझाए भी कौन कि, एक तो तुम ठहरे पंजाबी, दूसरा पुलिस वाला, फिर भी ये कि, 

जिसे तुम अश्लील कहानीकार, या जिन कहानियों को तुम अश्लीलता का प्रतीक मानते हो न तो मुझे लगता है मंटू और उनकी कहानियों को संबंधी में तुम्हारी स्टडी काफी कमजोर है वरना तुम उनके बारे में ऐसी गलत राय नहीं रखते। सच तो ये है कि दलबीर कि मंटू वह हकीकत निगार था जिसे आज का बीमार समाज तो कम से कम उसे हजम नही कर सकता!


            दलबीर सिंह ने  कहा, हालात जो भी हों पर ऐसी भी कोई हकीकत निगारी क्या मायने जो समाज को गुमराह करनेे का जरिया बने! मुझे तो एक बात समझ में नही आती कि आज का कहानीकार या फिल्म मेकर ऐसे किसी विषयोंं को क्यों टच करतेे हैं जिस से इंसानी जज्बात मजरूह हो या समाज गुमराह!

     दलबीर सिंह इस डिस्कशन के हवाले से बन्ने मियाँ के सामने यह प्रश्न भी रख गया कि बन्ने मियाँ क्या तुम्हें नही लगता कि ऐसी कहानियां या फिल्में समाज पर बहुत ही बुरा असर डाल रही हैं या आज की कहानियों का पूरा-पूरा असर समाज पर है?

      बन्ने मियाँ एक बार फिर मजाक पर उतर आये और पहले तो कहा कि '' ये बात अब भी मेरे लिये एक मुअम्मार है कि तू तमाम उम्र पंजाबी बन कर ही सोचता रहेगा या कभी इंसान बन कर भी सोच सकता है। और फिर अपनी राय का इजहार करते हुये कहा कि मैं नही मानता कि आज कहानियों, फिल्मों का अच्छा या बुरा असर समाज पर है बल्कि मेरा तो मानना है कि आज समाज का पूरा-पूरा असर आज का कहानियों और फिल्मों पर है। दरअसल आज का कोई कहानीकार हो या फिल्म मेकर उसी विषय को टच कर रहे हैं जो समाज के अंदर और बाहर उत्पन्न हैं।

   दलबीर बन्ने मियाँ की बातें  सुनकर कुछ संजीदा तो हुआ लेकिन फिर अपनी ये राय भी रख गया कि, ऐसी भी कोई हकीकत निगारी क्या मायने कि, कोई किसी पवित्र स्थल को रंडी के कोठे से तुलना कर दे या कोई यों कह दे कि '' पुलिस की निगाह और तवायफ की निगाह का क्या भरोसा''।

    बन्ने मियाँ अपनी आदत को मुताबिक फिर से कहते हुए कर डाला कि पता नहीं बेदी क्यों अक्सर कहा करता था कि '' बचपन में गधे और गुस्से में पंजाबी दोनों एक से दिखते हैं''।

    इस बार दलबीर आपे से बाहर हो गया और कहा, अव्वल तो बन्ने मियाँ तुम मुझे हमेशा एक मजाक मत बनाया करो दूसरी ये कि अपनी कठदलाली के सहारे मेरी सच्चाइयों को  झुठलाने की कोशिशें मत किया करो।

   बन्ने इस बार कुछ संजीदा हुए और कहा, दलबीर अगर तुझे फुर्सत है तो बैठ मेरे पास, आज मैं तुझे एक ऐसी सच्ची कहानी से रूबरू कराऊँ जिसे मैं जल्द ही कलमबंद करने जा रहा हूँ। लेकिन हाँ कहानी सुनकर तुम मुझे यह जरूर बताना कि आज अश्लीलता क्या है?

     दलबीर सिंह ने कहा, मैं वह कहानी तो तुम से सुन ही लूंगा जो मंटू जैसे जेहन में रेंग रहा है लेकिन तू भी मुझसे वादा कर कि जल्द ही किसी पीर फकीर के मजार पर जाएगा और दुआ करेगा कि, '' बाबा तू मुझे मंटू जैसे अश्लील कहानीकार होने से बचाये रखना। ''

   बन्ने मियाँ ने कहानी कहना शुरू की, ये कहानी उस हाजी बशीर अंसारी का है जो बनारस का रहने वाला, बनारसी साड़ियों का एक मशहूर व्यापारी था। हाजी बशीर को मजारों से काफी अकीदत थी। उनके हांथों से अगर कोई शीशा भी टूट जाता तो वह पहली फुर्सत में किसी न किसी मजार  पर पहुंच कर अपनी अकीदत के फूल चढ़ा आते।

     हाजी बशीर कहने को तो हाजी थे पर नमाज सिर्फ जुमे की अदा करते थे। लोगों की राय है कि मजार वाले नमाज के मुकाबले मजारों को ज्यादा तरजीह देते हैं।

     हाजी बशीर ख्वाजा अजमेरी के सच्चे आशिक थे। ख्वाजा अजमेरी के मजार की ज्यारत को वह एक मिनी हज के मजार की तसव्वुर करते थे। ख्वाजा अजमेरी को सालाना उर्स पर तो घर से इस एहतमाम को साथ निकलते है। हाजी बशीर अजमेर पहुंच कर खर्च भी दिल खोल कर करते। दरअसल उनका मानना था कि आज जो भी धन दौलत उनके पास है वो सभी ख्वाजा बाबा की मेहरबानियों से है।

      हर वर्ष की तरह एक वर्ष जब वह ख्वाजा अजमेरी के सालाना उर्स के मौके पर अजमेर पहुंचे तो वहां उनकी मुलाकात ख्वाजा बाबा के एक ऐसे सच्चे दीवाने से हुई जिसने अपना नाम करामत बताया।साथ यह भी कि मैं हर वर्ष ख्वाजा अजमेरी के सालाना उर्स को अवसर पर बिहार से चलकर अजमेर शरीफ आता हूँ और अपनी अकीदत के फूल चढ़ाकर साईकिल से ही लौट जाता हूँ।

       हाजी बशीर करामत शाह की बातों से काफी प्रभावित हुए चुनांचे उन्होंने कहा कि जब तक तुम यहाँ हो मेरे खर्च पर मेरे साथ रहो और जब लौटने लगना तो मेरे ही खर्च पर मेरे साथ ही ट्रैन द्वारा निकल चलना कि इतनी दूर का सफ़र साईकिल से ठीक नही।

      करामत शाह ने कहा, हाजी साहब जहां तक बात आपको साथ रहने की है तो मैं रह लूंगा पर वापसी मेरी साईकिल से होगी। कारण जहां मेरी ये एक मन्नत में शामिल है वही ख्वाजा साहब से मेरी सच्ची अकीदत का एक हिस्सा भी है।

    करामत शाह हाजी बशीर के साथ, उनके खर्च पर उनके साथ रहने लगा। उर्स खत्म हो चुका था। करामत शाह जब साईकिल द्वारा ही लौटने लगा तो हाजी बशीर ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की कि और मेरे खर्च पर मेरे साथ ट्रेन द्वारा निकल चलो। कारण इतनी दूर का सफ़र साईकिल से बहरहाल ठीक नही लेकिन करामत शाह नही माना। हाजी बशीर ने कहा कि जाओ पर ये कुछ पैसे जेब खर्च के लिये अपने पास रख लो। लेकिन करामत शाह ये पैसे भी ये कहकर लेने से इंकार कर दिया कि मैं कुछ भी आप से क्यों लूँ? मुझे देना होगा तो ख्वाजा शरीफ देकर मालामाल कर देगें। हाजी बशीर ने उसे रास्ते का खर्च देने की बहुत कोशिश की पर वह किसी सूरत में एक पाई भी लेने को तैयार नही हुआ जो हाजी बशीर ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और कहा कि जब भी तुम्हें मौका मिले मेरे पते पर बनारस जरूर आना। कुछ नही तो जियारत को गर्ज ही दरअसल बनारस पीर फकीरों का शहर है जहाँ दूर-दूर से जायरीन आते-जाते रहते हैं।

     करामत शाह हाजी बशीर से उनका विजिटिंग कार्ड ले लिया और इस वायदे के साथ रूखसत हो गया कि मौका मिलते ही बनारस जरूर आऊँगा।

     अभी चंद महीने ही गुजरे थे कि करामत शाह अचानक उनके घर पहुंच गया। हाजी बशीर ने उसे पलकों पर बिठाया दिल में जगह दी। उनके परिवार वाले भी उसकी मेहमानवाजी का खास ख्याल रखते।

दिनों-महीने रहकर जब करामत शाह अपने शहर को लौटने को हुआ तो हाजी बशीर ने करामत शाह से कहा कि जैसा कि तुम मुझे बता रहे थे कि मैं एक बेरोजगार युवक हूं, कोई अच्छी सी सरकारी नौकरी की तलाश में हूं तो ऐसा करते हैं कि, जब तक तुम्हें कोई सरकारी नौकरी नहीं मिल जाती तुम मेरे ही फर्म में काम करो ताकि तुम्हें दो पैसे की आमदनी हो सके। करामत शाह ने पहले तो इंकार किया पर न जाने क्या सोच कर हाजी साहब के फर्म में काम करने के लिये तैयार हो गया।

        एक दिन बातों - बातों में हाजी बशीर से करामत शाह को संजीदगी से समझाते हुये कहा कि ''तुम यहाँ किसी को भी यह मत बताना कि तुम बिहार के रहने  वाले हो या तुम बिहारी हो, कारण बनारस के लोग बिहारियों को बड़ी हकीकत निगाहों से देखते हैं।उन्हों चोर-उचक्के, मक्कार-फरेबी और जालसाज के नाम से याद रखते हैं। खासकर कोठीदार, गद्दीदार तो बिहारियों के नाम से ही खौफ खाते हैं। दरअसल बिहारियों ने,  यहाँ के  लोगों के साथ छल-कपट बल की बुनियाद पर न केवल उनकी धन-दौलत बल्कि इज्जत पर भी डाका डाल चुके हैं।

     करामत शाह को हाजी साहब की बातें अच्छी लगीं और वह उनके सुझाव पर पर अमल  करके खुद को अजमेरवासी अजमेरी बताने लगा।

    हाजी बशीर करामत शाह की मेहनत, ईमानदारी के कायल हो चुके थे। चुनांचे उसे घर के एक सदस्य की हैसियत देने लगे और करामत शाह अब घर की महिलाओं में भी उठने-बैठने लगा था।

   करामत शाह की मौजूदगी ने हाजी बशीर को अब और इतनी मौहलत अता कर दी थी कि अब वह जब चाहते घर बाहर की कुछ जिम्मेदारियां करामत शाह के हवाले करके कहीं भी मजार की जियारत के लिये निकल जाते और कभी - कभी तो करामत शाह को भी साथ ले जाते।

     हाजी बशीर करामत शाह से कुछ इसलिए भी ज्यादा खुश रहते थे कि, उनकी बीवी, बच्चे जो कभी मजारों में यकीन नही करते थे। उन्हें भी करामत शाह ने मजारों से जोड़ दिया था। नतीजा अवश्य वह भी मजारों की जियारत करने आने जाने लगे थे। 

दिन बीतते गये, वक्त गुजरता गया और करामत शाह पर हाजी बशीर का यकीन पुख्ता हो गया। करामत शाह तो अपने करामाती स्वभाव के सहारे सभी का दिल जीतता चला गया। इसी बीच हाजी बशीर घर-बाहर की तमाम जिम्मेदारियों को करामत शाह को सौंपते हुये कई मजारों के जियारत के गर्ज लम्बे दिनों के लिये तन्हा ही सफर पर निकल पड़े लेकिन जब तक उनकी वापसी होती उससे पहले उनके यकीन को अज़दहा उनकी सच्ची अकीदत को रौंद कर आगें बढ़ चुका था। सफर के दौरान उन्हें खबर मिली कि करामत शाह उनकी बेटी को लेकर फरार हो चुका है। जिसकी सूचना स्थानीय थाने को दी जा चुकी है।


     हाजी बशीर ने अपने सफर को ब्रेक दिया और लुटे-पिटे,  थके-हारे जुआरी की तरह घर लौटे  तो उनकी सच्ची अकीदत का झूठा अज़दहा सीना ताने खड़ा मिला। घर की हर शै खामोश, हर सदस्य मायूसियों में डूबा मिला। हाजी साहब को लगा जैसे अब उनका वजूद बेमानी है लिहाजा.....? लेकिन दूसरे ही क्षण उनके अंदर के इंसान ने उन्हें हौंसला दिया और फिर वह अपने परिवारियों और दोस्तों की मदद से करामत शाह और सलमा की तलाश में निकल पड़े लेकिन हर कोशिश के बावजूद उन दोनों का कहीं कोई सुराग नही मिला तो थक हार के बैठ गये और खुद को एक अँधेरी कोठरी में कैद करके दोस्त अहबाब, रिश्तेदारों से खुद को अलग कर बैठे नतीजा उनका कारोबार भी प्रभावित होने लगा।

      लगभग सालभर बाद एक दिन अचानक बाराबंकी से किसी अजनबी शख्स ने फोन पर सूचना दी कि ''आपकी बेटी सलमा मेरे पास सुरक्षित है लिहाजा आप आकर उसे ले जाएं।''

       उस अजनबी शख्स द्वारा मिली सूचना के आधार पर हाजी बशीर उसी रात अपन साले भाऊ हाजी के हमराह अपनी मारूति से बाराबंकी के लिये निकल पड़े। अजनबी शख्स के बताये पते पर जब हाजी बशीर वहाँ पहुँचे तो सलमा वहाँ मौजूद मिली। हाजी बशीर ने उस शख्स से पूछा कि आपको मेरी बेटी सलमा मिली कहाँ?

         अजनबी शख्स ने बताया कि इसकी डिटेल तो मेरी आया फातिमा बी  ही दे सकती हैं। वही सलमा को यहाँ ले लायी थीं। फातिमा बी ने बताया कि पिछले जुमेरात को मैं एक स्थानीय मजार पर फातेहा पढने गई थी कि वहीं सलमा मुझे मजार  के पिछवाड़े बेहोशी की हालत में दिखी, जिसे मैं उठाकर सबसे पहले स्थानीय डाक्टर के पास ले गई। उसने अपनी दवाओं के सहारे सलमा को होश में तो ला दिया लेकिन उसने बेहोशी का कारण सामूहिक बलात्कार बताया तो मेरी रूह कांप उठी, चुनांचे मैं सलमा को हमदर्दी की बुनियाद पर अपने मालिक डा. आनंद जी को यहाँ उठा ले आई जिन्होंने सलमा को सुरक्षित रखने और आपसे मिलवाने का वायदा किया। खुदा आनंद जी का भला करे।

    फातिमा बी के बाद सलमा से पूछे जाने पर, सलमा ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि, ''चूँकि करामत शाह पर घर को हर सदस्य का मुकम्मल यकीन बन चुका था लिहाजा जहां वह घर की औरतों में उठने-बैठने लगा था। वहीं खास करके वह मेरे बहुत करीब आ चुका था। नतीजा कभी शापिंग कभी मजारों की जियारत को गर्ज उसके साथ तन्हा आने जाने लगी थीं। कुछ दिनों तक तो ये सिलसिला केवल शॉपिंग मॉल, मजारों तक सीमित रहा लेकिन जब ये सिलसिला आगें बढ़ा तो वह मुझे शॉपिंग एवं मजारों को बहाने होटलों में ले जाकर मुझसे शारीरिक सम्बंध बनाने लगा। इसी खेल-खेल में जब एक दिन मुझे पता चला कि मैं करामत शाह की माँ बनने वाली हूँ तो मैं सख्त असमंजस में पड़ गयी। मैने करामत शाह से इस समस्या का समाधान तलाश करने को कही तो वह साफ शब्दों में कहता मिला कि इस समस्या का समाधान तलाश करने को कही तो वह साफ शब्दों में कहता मिला कि इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान यह है कि हम कुछ दिनों लिये यह शहर छोड़ दें। चुनांचे मैं उसके बहकावे में आकर एक रात घर की अलमारी सो कुछ नगदी-जेवर और रूपये निकाल कर उसके साथ घर से निकल पड़ी।


   करामत शाह मुझे सबसे पहले एक्जीविसन रोड पटना को एक होटल में ले जाकर टिका दिया और दूसरे ही दिन एक प्राईवेट नर्सिंग होम में लेकर मेरा गर्भपात करवा दिया। अभी उस होटल में दो ही दिन गुजरे थे कि करामत शाह ने कहा यहां से बिहार यानि मेरा घर काफी करीब है। लिहाजा तुम यहीं ठहरो, मैं घर वालों से मिल कर आता हूँ तो आज ही रात मैं तुम्हें अपने घर ले चलूँगा। लेकिन वह उस रात क्या बल्कि एक हफ्ते बाद लौटा और तब तक हौटल वाले मुझे डरा-धमकाकर अपनी हवस का शिकार बनाते रहे और मैं भयभीत उनके सारे जुल्म सहती रही। करामत शाह के लौटने पर जब मैने उसे अपनी आपबीती सुनाई तो कहने लगा। क्या करोगी जमाना बहुत खराब है, किसी पर एतबार करना मुश्किल है।

बहरहाल चलो आज ही हम लोग दिल्ली निजामुद्दीन औलिया की मजार पर फातेह पढ़ने चले जाते हैं और फिर वापसी पर घर चलेगें। हम दोनों उसी रात दिल्ली के लिये निकल पड़े और दूसरे दिन दिल्ली पहुंचकर एक लॉज में ठहरे । शाम को जियारत के गर्ज मजार पर जाकर फातेह पढे़ और फिर लॉज में लौट आये। तो करामत शाह कहने लगा कि सलमा सोच रहा हूँ कि इसी शहर में कहीं नौकरी पकड़ लूँ और यहीं किराये का मकान लेकर रहा जाये। मैने टोका कि तुम तो कह रहे थे कि जियारत के बाद लौट जायेगें तो यहां रहने की बात कहाँ से आ गयी? करामत शाह मुझे गोलमोल जवाब देकर मेरी सारी बातें टाल गया। दूसरे सुबह अपने किसी दोस्त से मिलने के बहाने यह कहकर निकल गया कि एक दोस्त से मिलने जा रहा हूं शाम तक लौटूंगा। पर वह दस दिन बाद लौटा और तब तक वह लॉज वाले भी मुझे डरा धमकाकर न केवल खुद मेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाते रहे बल्कि वो मुझे अपने दूसरे कस्टमर के हवाले भी करते रहे और मैं मजबूरन उन नरपिशाचों के हुक्म का गुलाम बनी, सब सहती रही। वहाँ मुझे यह भी पता चला कि यह लॉज मजार के ही किसी खादिम का है जो मेरी तरह कि मजबूर लडकियों को अपने ग्राहकों के हवाले करके रोजाना सैकड़ों की आमदनी करता है। 


     करामत शाह के लौटने के बाद मेंने उसे फिर आपबीती सुनाई तो यह कह कर टाल गया कि सलमा मुझे समझ मे नही आ रहा है कि ये सब तुम्हारी बदकिस्मती का नतीजा है या मेरी बदनसीबी का कारण। बहरहाल चलो आज ही हम लोग इस लॉज को छोडकर ख्वाजा अजमेरी के दरबार में चलकर पहले फातेहा पढ़ेगें और फिर हमेशा - हमेशा के लिये अपने घर लौट चलेगें।

      दूसरे दिन हम लोग अजमेर के लिये रवाना हो गये। अजमेर पहुंच कर हम लोगों ने पहले ख्वाजा अजमेरी के दरबार में हाजरी दी और फिर तारागढ़ पहाड़ पर करामत शाह के एक खादिम दोस्त सैयद जफर अब्बास के मेहमान बन गये। जिसने कुछ दिनों तो हमारी बहुत आवभगत की पर एक दिन जब उसन बबताया कि करामत शाह एक जरूरी काम से हाजी अली मुम्बई आ चुका है और अब वह एक हफ्ते बाद ही लौटेगा। यह सुनकर मैं कांप गयी कि करामत शाह की गैरमौजूदगी में यहां भी दरिंदगी का शिकार न होना पड़े और मेरा यह खौफ उस समय सच्चाई में बदल गया जब रात होते ही जफर अब्बास मेरे साथ दरिंदगी पर उतर आया और साफ शब्दों में कहने लगा कि अगर तुमने इंकार करने कि ज़रा भी कोशिश की तो मैं तुम्हें एक कॉल गर्ल का नाम देकर पुलिस को हवाले कर दूंगा फिर तुम शायद नहीं जानती कि पुलिस तुम जैसी लडकियों के साथ किस दरिंदगी के साथ पेश आती है। चुनांचे मारे खौफ के मैं खुद कोउसको हवाले कर दी और फिर वह मुझे आजादाना तौर पर मेरे जिस्म की तिजारत करने लगा।

            मुझे याद है उस खादिम की दरिंदगी, चुपके चुपके आसूँ बहाना और खुदा से दुआ करना कि मालिक मुझे तू इस दरिंदे से बचा। मैं वहाँ से भागने के लाख जतन की पर भाग न सकी। इसी बीच एक दिन जफर अब्बास के हाथ एक चिट्ठी मिली कि तुम उसी को साथ हाजी अली मुम्बई चली आओ। मैं न चाहते हुये जफर अब्बास के साथ निकल पड़ी और वह मुझे होटल दर होटल घुमाता रहा और मेरे जिस्म का सौदा करके कमाता रहा और आखिर! मैं मुझे हाजी अली करामत शाह के पास पहुंचा दिया। मैंने वहां जफर अब्बास की दरिंदगी के बारे में करामत शाह को बताई और फिर साफ शब्दों में कहती मिली कि, करामत शाह तुमने मुझसे मेरा घर छीन लिया, परिवार छीन लिया, मेरी दौलत मेरी इज्ज़त नीलाम कर दी। अब एक और काम करो कि अपने हाथों मेरी जॉन भी ले लो कि व तो मैं अब जिल्लत भरी जिन्दगी गुजार सकती हूँ और न ही तुम्हारी उम्मीद में जी सकती हूँ।


            मेरा यह फैसला सुनकर करामत शाह शायद जज्बाती हो गया और एक सच्चाई उगल गया कि सलमा आज मेरी हकीकत भी जान लो कि मेरा अपना न कोई घर है और न ही ठिकाना, किसी मजार की चौखट पर पलने वाला ये हरामजादा करामत शाह न जाने किसकी नाजायज औलाद हैै जिसका अब कोई घर है तो यही मजार,  दर  है तो यही मजार, मजार ही मेरी ज़िंदगी, मजार ही मेरी तिजारत लेकिन एक सच यह भी है कि तुम्हेें एक घर देना चाहता हूँ ताकि तुम्हें जिल्लत  की जिन्दगी से निकाल कर इज्ज़त की जिन्दगी दे सकूँ। और यह कहकर वह मुझे अपने खादिम दोस्त केे यहां छोड़कर निकल गया।

            उसके जाने के बाद काजिम वारसी जो शैतानी सूरत का मालिक था कहने लगा सलमा अब करामत शाह कभी नही लौटेगा कारण तुम शायद जानती नही करामत शाह कितना बड़ा ढ़ोंगी और अय्याश शख्स है, या फिर कहूँ कि लडकियों का दलाल है। वह अक्सर तुम्हारी जैसी मासूम लड़कियों को पहले अपने जाल में फंसाता हैऔर पहले कुछ दिन खुद उनसे धंधा करवाता है और आखिर! में उसे बेंच कर हमेशा हमेशा के लिये शहर बदल देता है। जैसे कि आज वह तुम्हें मुझे बेच कर शहर छोड़ चुका है। गोया अब आज से तुम मेरी अमानत हो चुनांचे अब जो मैं कहूँगा, तुम्हें वही करना होगा।

         काजिम वारसी की बातें, करामत शाह का असली रूप जानकर मेरा कलेजा मुंह को आने लगा। उस दिन मैं अपनी किस्मत पर खूब रोयी और मंसूबा बना ली कि मौका मिलते ही मैं यहाँ से फरार हो जाऊंगी। पर मैं उस शैतान के चंगुल से आजाद तो न हो सकी विपरीत इसके इशारे पर नाचने और रोज बिकने लगी।

      मेरी एक छोटी सी भूल मेरे लिये एक स्याह इतिहास बन चुका था। कि इसी बीच मेरी मुलाकात मजार पर ही जीवन बसर करने वाली एक औरत से हुई। जो समय से पहले बूढी हो चुकी थी। एक दिन मैने उसे अपनी आपबीती सुना डाली। तो उसने बताया कि सलमा मैं भी तुम्हारी तरह दरिंदा सिफत इंसान की हवस की शिकार मजबूर औरत हूँ जिसने मुझे एक अच्छे घराने से निकाल कर एक ऐसे जहन्नुम में ढकेल दिया जहाँ पहुंच कर न दुनिया मिली न आख्बत और आज इस मुकाम पर हूं कि मैं न जीभर अपनी मर्जी से रो सकती हूँ और न अपनी मर्जी से सकती हूँ। इसलिए मेरी मानो तो पुलिस प्रोटेक्शन में चली जाओ ताकि वे लोग या तो तुम्हें तुम्हारे माँ-बाप के हवाले कर देंगे और तुम इस जिल्लत की जिन्दगी से बच जाओ वरना इन पवित्र स्थलों पर बसमे वाले जिस्मों के व्यापारी कभी तुम्हें इस जिल्लत की जिन्दगी से आजाद नहीं होने देगें।


          मुझे उस औरत का सुझाव अच्छा लगा चुनांचे मैं उसकी मदद से दूसरे ही दिन पुलिस प्रोटेक्शन में चली गई जहां मुझसे वादा किया गया कि तुमको जल्द ही तुम्हारे माता-पिता के घर भेज दिया जायेगा अथवा किसी वीमेन प्रोटेक्शन होम में रखवा दिया जायेगा। पर वो मुझे प्रोटेक्शन क्या देते उल्टा वो खुद ही मुझे हर सुबह शाम अपनी हवस का शिकार बनाने लगे और एक दिन शायद जब मैं उनकी सामूहिक बलात्कार को सह न सकी तो बेहोश हो गयी। वो मुझे मुर्दा समझ कर मजार के पीछे फैंक गये। और मैं इत्तेफाक सो फातिमा भी की नजर में आ गयी जो मुझे यहां उठा कर ले आई।

          सलमा की दर्दनाक आपबीती सुन कर हाजी बशीर पागलों की तरह चीख पड़े और फिर पहले तो अपने अकादेमी को बलाए-ताक रखकर मजार और मजार वालों को भद्दी गालियाँ दी और फिर सच्चे दिलों दिमाग से महसूस किया कि जो सच है वह यही है कि '' मजारों को गुलजार करने से बेहतर मस्जिदों को आबाद किया जाए।''


          हाजी बशीर ने पहले तो डा. आनंद का फातिमा भी का शुक्रिया अदा किया और फिर सलमा से कहा कि बेटी जो हुआ उसे एक हादसा समझ कर भूल जाओ और अब चलो अपने घर जहां तुम्हारे छोटे भाई बहन और तुम्हारी माँ तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रही हैं।

         दूसरे दिन हाजी बशीर अपनी मारूती  से सलमा को लेकर बनारस के लिये चल पड़े। मारूत

 हाजी बशीर के साले भाऊ हाजी ड्राईव कर रहे थे और पिछली सीट पर बैठे हाजी बशीर और सलमा न जाने किन ख्यालों में खोये हुए थे और मारूती ओवरब्रिज से गुजर रही थी कि सलमा चीखी कि मामा गाड़ी रोको ! भाऊ हाजी ने गाड़ी को ब्रेक दिया, मारूती वहीं रूक गयी। हाजी बशीर ने पूछा कि क्या हुआ बेटा? सलमा ने कहा कि पापा पहले आप ये सोचिए! आप मुझे जिस समाज में वापस ले जा रहे क्या वह समाज मुझे इज्जत की जिन्दगी जीने देगा या आपको चैन की जिन्दगी? पापा अच्छा होगा कि आप मुझे इस ओवरब्रिज से उस बहते दरिया में फैंक दें ताकि मेरी गुनाहों और आपकी बेइज्जती का यही अंत हो जाये। वरना मेरे साथ - साथ आप भी समाज की  निगाहों में एक प्रश्न बन कर रह जाएगें।

              हाजी बशीर को पहले तो लगा कि शायद सलमा ठीक कह रही है पर दूसरे ही क्षण उन्होंने ईरादा बदल दिया और कहा बेटी मैं समाज के हर थाने बर्दाश्त कर लूंगा पर अपनी लख्ती जिगर का खून अपने हाथों नहीं कर सकता इसलिए तुम घर चलो। वहां समाज मुझे जो भी सजा देगा हम उसे हँस कर कबूल कर लेगें।

             मारूती दोबारा तेज रफ्तार से सड़क का सीना चीरती हुई आगें बढ़ रही थी कि अचानक सामने से आती एक सरकारी बस से टकरा गई। सरकारी बस के सेहत पर तो इस टकराव का कोई असर नहीं पड़ा जहां मारूती अपना वजूद खो चुकी थी वहीं हाजी बशीर और भाऊ हाजी अल्लाह को प्यारे हो चुके थे।


          न जाने सलमा कैसे बच गई और न जाने किसकी मदद से एक सरकारी अस्पताल में पहुंच गई थी, जिसे वहां जब होश आया तो उसने अपनी मां को अपनी नजरों के सामने पाया  लेकिन इससे पहले कि सलमा अपनी मां को अपनी आपबीती सुनाती कि माँ बोल पड़ी! अब तुम्हारे पास सुनाने को बचा ही क्या है जब तुम मेरे भाई और मेरे सुहाग को ही निगल गई। 


               सलमा माँ कि जुबानी इस बेहद दर्दनाक खबर को सुनकर पागलों की तरह कहकहा लगाने लगी और यह बताने लगी कि माँ एक समय मेरी जिन्दगी में ऐसा  भी आया था  कि मैं  खुद करामत शाह से उसके प्यार में पड़ कर बोली थी कि तुम मुझे हासिल करना चाहते हो तो तुम्हें  मेरे पापा और मामा को रास्ते से हटाना होगा वरना तुम इनके जीते जी मुझे हासिल नही कर सकते और आज करामत शाह ने तो उनकी जान नही ली बल्कि मैंने खुद उनकी जान लेकर तुमको विधवा बना दिया और फिर एक और चीख लगाती दूसरे जानिब लुढ़क गयी।

         सलमा की चीख  सुन कर उपस्थित डाक्टर दौड़ पड़ेे,  सलमा को इमर्जेंसी वार्ड में ले जाया गया और फिर डाक्टरों ने सलमा की माँ को अपना सुझाव देते हुए कहा कि अब आप इसे किसी मैंटल हास्पिटल ले जाइये कारण उनकी बेटी सलमा अपना दिमागी संतुलन खो चुकी है।


          बन्ने मियाँ कहानी सुनाकर खामोश हो चुके थे और दलबीर सिंह चुपके - चुपके आसूँ बहाता ये कहते हुये आगें बढ़ गया कि लानत है ऐसे झूठे अकादेमी, बीमार समाज पर जो अपने चेहरे पर शराफत की सर्जरी करवाकर जीने का कायल हो चुका है।

- लेखक माइटी इकबाल 

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