रेपिस्टों को मिले तुरंत फांसी- - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Monday, April 16, 2018

रेपिस्टों को मिले तुरंत फांसी-


शब्द भी थर्रा उठे... 

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मानवता को शर्मसार कर देने वाली कठुआ और उन्नाव गैंग रेप की घटनाओं को लेकर इन दिनों देश में बेहद गुस्से और आक्रोश का माहौल बना हुआ है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अनेकों कैंपेन चलाये जा रहे हैं, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन वहीं कैण्डलमार्च निकल र रहे हैं, और सियासत में कहीं चुप्पी तो कहीं घमासान मचा है। दोषियों को मौत की सजा सुनाने की चहुँओर मांग उठाई जा रही है। ऐसे में, अगर देश में होने वाले रेप की वारदातों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि कड़े कानूनों के बावजूद रेप की वारदातें थमने का नाम ही नहीं ले रहीं।  ये आंकड़े मुँह चिढ़ा रहे मानो प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर,वहीं महिला सुरक्षा के प्रति किये गये तमाम इंतजाम, योजनाओं  व दावों की पोल भी खोलते दिख रहे हैं। 
        आज जम्मू-कश्मीर के कठुआ के बाद गुजरात के नामी शहर सूरत से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है कि वहां 11 वर्षीय एक बच्ची का शव मिला था और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से उसके साथ निर्दयता से बलात्कार किए जाने की पुष्टि हुई है। ऐसी खबरें सुनकर ही कलेजा मुंह को आता है कि कैसे गरीब अपने बच्चों की हिफाजत करे। कल सब्जीवाले को कहते सुना कि मैं अपनी बच्ची को घर से न निकलने दूंगा और उसका बालविवाह करूंगा। यह सुनकर मेरे मन रो उठा कि सजा आखिर! निर्दोष बच्चियों को ही क्यों? इसमें मासूमों का क्या दोष? पता नही हमारा देश कहाँ जा रहा है अगर हम फिर पुरानी रूढ़िवादियों की तरफ लौटे तो विकसित भारत के सपने का पूर्णरूपेण पतन हो जायेगा। हमें समय रहते जागना होगा।


क्या कहतें हैं आकड़ें -

         नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में हर एक घंटे में 4 रेप की वारदात होती हैं। यानी हर 14 मिनट में रेप की एक वारदात सामने आती है।तथा, 
- देश में औसतन हर 4 घंटे में एक गैंग रेप की वारदात होती है।
- हर दो घंटे में रेप की एक नाकाम कोशिश को अंजाम दिया जाता है। 
- हर 13 घंटे में एक महिला अपने किसी करीबी के द्वारा ही रेप की शिकार होती है।
- 6 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ भी हर 17 घंटे में एक रेप की वारदात को अंजाम दिया जाता है 
लचर कानून व्यवस्था के चलते - महिलाओं के यौन उत्पीड़न और बलात्कार के 31 फीसदी मामले अभी भी अदालत में  लंबित हैं। और राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक मध्यप्रदेश रेप के मामले में गत वर्ष भी देश में पहले स्थान पर ही था। एनसीआरबी के आज जारी ताजा आंकडों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज की गयी. इसमें मध्यप्रदेश में 4882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज हुई, जबकि इस मामले में उत्तर प्रदेश 4816 और महाराष्ट्र 4189 की संख्या के साथ देश में दूसरे और तीसरे राज्य के तौर पर दर्ज किये गये हैं।इसके साथ ही नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले में भी मध्यप्रदेश देश में अव्वल स्थान पर है। मध्यप्रदेश में इस तरह के 2479 मामले दर्ज किये गये जबकि इस मामले में महाराष्ट्र 2310 और उत्तरप्रदेश 2115 के आंकड़े के साथ क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर है।पूरे भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हैं। जोकि बेहद शर्मनाक स्थिति है। वहीं बच्चों के यौन शोषण में सरकारी आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं. एक साल में बच्चों के साथ बलात्कार के 8800 मामले. लेकिन टीवी न्यूज, न्यूजपेपर, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हर घंटे पर रेप की खबर देख और सुन हर बच्चा वेदना के सौ फीसदी अनुभव से गुजर रहा है और ये आंकड़ा सिर्फ उन बच्चों का है जिनकी रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। असली संख्या के बारे में सोच कर रूह कांप जाती है। क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े ये भी दिखाते हैं कि करीब 95 प्रतिशत मामलों में अपराधी बच्चों के अपने ही परिचित के लोग थे। यह आंकड़े समाज की आंखें खोल देने वाले हैं ताकि उन पर बहस हो सके और समस्या से निबटने का रास्ता निकाला जा सके।पर टीबी डिबेट में बहस नही झगड़ा होता, यहां तक की सदन में झगड़ा होकर सदन की कार्यवाही ही ठप कर दी जाती है। हम सब ने चुन कर इसीलिए भेजा था कि आप हमारी आवाज़ बने पर ऐसा होता दिख नही रहा। 


कानून बने पर भ्रष्टाचार के भेंट चढ़े-

        निर्भया बलात्कार केस के बाद कानूनों में बदलाव
किये गये, कानूनों को पहले से ज्यादा सख्त बनाया गया इस उम्मीद में कि शायद महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक वारदात कुछ कम होंगी लेकिन आंकड़े ये बताते हैं कि ना तो महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या में कमी आई और ना ही उन्हें न्याय दिलाने की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी--
- यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को जल्द से जल्द न्याय दिलाने के लिए देश में 275 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं लेकिन ये कोर्ट भी महिलाओं को कम वक्त में न्याय दिलाने में नाकामयाब रहे। 
- हालत यह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े 332 से ज्यादा मामले इस वक्त सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। और देश भर की उच्च न्यायालयों में ऐसे लंबित मामलों की संख्या 31 हज़ार 386 है। तथा देश की निचली अदालतों में 95 हज़ार से ज्यादा महिलाओं न्याय को तरसी पथरायीं आँखे इंतज़ार कर रही हैं। 
Criminal law Amendment Act 2013 कहता है कि रेप के मामलों की सुनवाई निश्चित समय में पूरी की जानी चाहिए लेकिन बहुत कम मामलों में ही ऐसा हो पाता है।  
रेप के सबसे चर्चित मामले में बाबा राम रहीम ने दो बेटियों के साथ बलात्कार किया पर दस हजार जुर्माना और दस साल की सजा सुनाई गयी।किसी के जीवन से खेलने के एवज में क्या यह सजा काफी है? 
 आसाराम ने  एक नाबालिग समेत 3 महिलाओं का यौन उत्पीड़न और रेप किया। आसाराम को सितंबर 2013 में पुलिस ने गिरफ्तार किया और वो तब से वह जोधपुर की जेल में बंद हैं लेकिन 2 वर्ष और 2 महीने बीत जाने के बाद भी इस मामले का ट्रायल अभी बाकी है। इससे बलात्कारियों के हौसलें नही बढ़ेगें तो और क्या होगा। 
- दिल्ली में जनवरी 2014 में डेनमार्क की एक महिला के साथ 3 नाबालिगों सहित कुल 9 लोगों ने गैंगरेप किया था। पुलिस ने दोषियों को गिरफ्तार भी कर लिया लेकिन करीब 2 साल बाद भी इस मामले में अभी तक पीड़िता को न्याय नही मिला। 

 सरकारी योजनाओं की जबरदस्त सुस्ती- 

      मीडिया व आमजन के आक्रोशरूपी दवाब के चलते सन् 2013में एक हज़ार करोड़ रुपयों का निर्भया फंड शुरू किया था। वर्ष 2013-14 से लेकर 2015-16 तक इस फंड में तीन हज़ार करोड़ रूपये दिए जा चुके हैं।
- मिनिस्ट्री ऑफ वूमिन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट को इस फंड के सही इस्तेमाल का काम सौंपा गया है। दुखद सच्चाई ये है निर्भया फंड लागू किए जाने के बाद से लेकर अब तक इसमें 2 हज़ार करोड़ रूपये की वृद्धि होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर पीड़िताओं की सुरक्षा से सम्बंधित कठेर कदम दिखाई नहीं दे रहे।
-  गृह मंत्रालय ने GPS यानी Global Positioning System के लिए Computer Aided Dispatch Platform तैयार करने की योजना बनाई थी जिसकी मदद से पुलिस को जल्द से जल्द पीड़ित महिला के पास पहुंचने में मदद मिलती पर ये प्रोजेक्ट 114 अलग-अलग शहरों में लागू करने के आदेश थे और निर्भया फंड से इस प्रोजेक्ट के लिए 321 करोड़ रुपये की रकम भी दे दी गई है पर ढ़ाक के वही तीन पात। 
-मिनिस्ट्री ऑफ वूमिन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट ने पीड़ित महिला की मदद के लिए दो योजनाएं लागू किए जाने की बात कही थी जिनमें से एक थी हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए One Stop Centre बनाने की योजना। ये 18 करोड़ 58 लाख रुपये की लागत से बननी थी जबकि दूसरी योजना थी Women Helpline की जिसकी लागत 69 करोड़ 49 लाख रुपये थी। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2015-16 में रकम जारी करने की अनुमति भी मिल गई थी लेकिन कर्नाटक और केरल को छोड़कर किसी भी दूसरे राज्य ने इस पर अपना प्रोपोजल नहीं भेजा गया। सरकारी योजनाएं बिना सही माार्गदर्शन और क्रियान्वयन के अभाव में फुस्स हेतीं दिखायीं पड़ती हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रूह कपां देने वाली रिपोर्ट - 

'विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, 'भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है।’


क्या कहा न्यायालय ने-

 भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। 

सबसे बड़ा पेंच -

      आप समझते ही होगें कि सबसे बड़ा पेच है कि बलात्कार की रिपोर्ट आसानी से नही लिखी जाती और क्या कहेगें लोग जैसी हीनभावना के चलते पीड़िता  पुलिस तक पहुंचने की हिम्मत जुटाने में इतना वक्त ले लेती है कि फॉरेंसिक साक्ष्य नहीं के बराबर बचते हैं. उसके बाद भी वकीलों के सवाल, समाज की सवालियां नजरें, कानून की पेचीदगियाँ कुछ ऐसी हैं कि ये बलात्कार पीड़िता पूरी तरह बिखर जाती है और कभी - कभी पुख्ता सबूत न होने पर अपराधी बच निकलते हैं और वह अलग - अलग शहरों में जाकर कुकर्त्यों को अंजाम देते रहते हैं, और यह दरिंदगी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। यह तब जबकि खुद को हम प्रगतिशील और लोकतांत्रिक कहने वाले देश बेटियों को बराबरी और सुरक्षा देना सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। आप क्यों नहीं खोल देते हर जिले में फांसीघर जहां हर रेपिस्ट को सार्वजनिक तौर पर फांसी दी जाये जिससे हर व्यक्ति छेड़छाड़ करना तो दूर सोचने से भी डरे। साथ ही साथ  समाज को भी इसमें पूरा सहयोग देना पड़ेगा, यौन अपराधों में स्त्री के चरित्र को दूषित मानने के बजाए दोषी को चरित्रहीन कह कर बहिष्कार करना आवश्यक होना चाहिए। सच तो यह है कि आबरू लूटने वाले की आबरू पहले लुटती है। पीड़िता को शर्मिंदगी क्यों? शर्म तो उन हैवानों को आनी चाहिए जिनके दिल और दिमाग दोनों ही नही होते।साथ ही क़ानून में सख्ती और तुरंत न्याय परमावश्यक है। 

समाज का भद्दा नजरिया - 

         समाज का भद्दा नजरिया यह भी है कि अगर वो मॉडर्न है तो उसे लोग ‘हथियाने के लिये तैयार’ मानते हैं. वो उसके साथ कुछ भी करने के लिए सोचते हैं. हमें सिखाया ही नहीं गया कि लड़कियां भी लड़कों जैसी ही होती हैं, उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ सेक्स नहीं करना चाहिए. इसके अलावा जो मीडिया हैं समाज में मेसेज देने वाले, उनमें अगर सेक्सुअल वॉयलेंस दिखाया जाएगा, हम अभी भी मीडिया के तौर पर उतने सेंसिटिव नहीं हुए.भडंकाऊ असभ्यभाषी शब्द म्यूज़िक, सर्वसुलभ पोर्नवीडियो, गंदे सॉन्ग या कामुक फिल्मी दृश्य और भड़काऊ विज्ञापनों में महिलाओं को ‘ खूबसूरत वस्तु’ की तरह पेश किया जाता है. जब तक यह मानसिकता नही सुधरेगी तब तक अनुकूल परिणाम सम्भव नही। 

रेपिस्टों के खिलाफ़ खड़ा हुआ पूरा देश-




कई फिल्मस्टारों ने सड़कों पर उतर कर अपना गुस्सा जाहिर किया और रेपिस्टों के खिलाफ़ फांसी की मांग की वहीं उद्योगपति महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा भी इन घटनाओं से  इतने आहत हुये कि उन्होंने ट्विटर पर अपने गुस्से को जाहिर करते हुये लिखा- कि जल्लाद की नौकरी ऐसी नहीं है कि हर कोई उसे चाहे. लेकिन अगर रेप करने वालों आरोपियों और छोटी बच्चियों को मारने वालों को सज़ा देने की बात हो तो मैं ये नौकरी खुशी-खुशी करना चाहूंगा। 


टाईम्स ऑफ इंडिया के बेबाक क्राइम रिपोर्टर माइटी इकबाल जी के शब्द रोष.. 
               आज बलात्कारों और गैंगरेप के लिये प्रतिदिन शर्मसार होते वह भारत जो अपनी पावन और मर्यादित सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाले विश्वगुरू का दर्जा हासिल करने वाला विश्वविख्यात विश्वसम्मानीय राष्ट्र बना जो आज विकासरथ पर आरूढ़ बन अंतरिक्ष को नापने की शक्ति रखने वाला सूर्य समान वही तेजोमय भारत जो आज बच्चियों और महिलाओं पर होने वाले बलात् पाप की अपकीर्ति से दिन प्रतिदिन शर्मसार हो रहा है। यह हम सभी भारतीयों के लिये डूब मरने जैसी बेहद अपमानजनक बात है। अब, समय की मांग और अस्तित्व की पुकार है कि अब हमें बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण को रोकने के लिये बेहद सख्त शुरूआत करनी होगी। कि जिससे हैवानियत भरी मानसिकता थर्रा उठे और स्वच्छ मानसिकता वाले मर्यादित भारत की पुनर्स्थापना हो सके।


स्वतंत्र विचार
-ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 


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http://ntvtime.com/archives/11434


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. .🙏आभार🙏. . 









2 comments:

  1. आंकड़ो के साथ एक शानदार व ज़बरदस्त लेख।लेकिन अब भी सवाल यही के राजनीतिक दलों के वोमेन्स विंग अपनी आवाज़ के साथ अपने कमरे में क्यों दुबकी पड़ी है।
    आकांक्षा जी एक उम्दा लेख के लिए बधाई आप को।

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