देखें! मानवता के चश्में से [अनुसूचित कहना भी है अपमानजनक ] - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Tuesday, April 17, 2018

देखें! मानवता के चश्में से [अनुसूचित कहना भी है अपमानजनक ]



देखें! मानवता के चश्में से
[अनुसूचित कहना भी है अपमानजनक


आज बाहर टहलने निकले तो देखा!कि आज भी गांवों में मैला ढ़ोतीं गरीब महिलाओं को जिनसे नाक - भौं सिकोड़तीं कुछ महिलाएं और लोग उन्हें अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुये। सोचा! कि आखिर! इस स्वंय सहायताकारी समाज का कसूर क्या है? आज हम सभी धोती कुर्ते से जींस और पेंट पर आ गये पर जालिम! नज़र और नज़रिया है कि बदलता ही नही। आखिर! यह बात हम कब समझगें कि सबसे पहले वह और हम इंसान हैं। और सम्मान पर सभी का समान हक है। जरा मानवता के चश्में से देखिये कि... उनका दिल शायद यही कहता होगा कि समस्त सभ्यताओं का निर्माण किया हमने। आपके भवन, सड़कें, नहरें,तालाब, नाले, नालियाँ बनाये हमने।आपको जूते पहनाये हमने, आपके पहने हुये जूतों तक को गंदा होने से बचाया हमने। आपके कदमों को कांटो और गंदगी से बचाया हमने। आपकी गलियाँ, नालियाँ, गटर साफ किये हमने । अस्पतालों की गंदगी साफ की हमने, पोष्टमार्टम किया हमने। युगों - युगों से इतनी बुनियादी सेवा एवं बुनियादी सहायता करने के बाद हमें उपाधियाँ दी गयीं- नीच, अछूत, शूद्र, अनुसूचित एवं दलित? बताइये! हमें नीच कहने वालों शर्म करो कि नीच और ऊँच तो विचार और मानसिकता हुआ करती है, व्यक्ति नही। और जब तक यह दकियानूसी और बीमार मानसिकता स्वस्थ नही होती, हम कभी भी प्रगृति नही कर सकते। खुद से प्रश्न करो कि जब भगवान् सभी का प्रसाद गृहण करते हैं तो आप उनसे भी ऊपर हैं क्या? हद है कि गंदगी फैलायें आप और साफ करें हम। क्या हम सभ्य एवं स्वच्छ मानव नही? क्या हम परमपिता परमात्मा के अंश - वंश नहीं। हर धर्मग्रंथ का सार है कि बुनियादी सहायता से बड़ा कोई मानव देश कर्म नही और बुनियादी सेवा से बढ़कर कोई नागरिक राष्ट्र धर्म नहीं।

ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

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