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औरंगजेब : इतिहास का सबसे बदनाम शासक


ससुरे! औरंगजेब को मरे हुए 300 वर्ष बीत गये। विडंबना यह है कि आज भी मौजूद हैं, उसकी क्रूरता की निशानियां। बता दें कि इस हरामखोर औरंगजेब नामक बर्बादी के कीड़े का जन्म 3 नवंबर 1618 को गुजरात के दाहोद में हुआ था। वह शाहजहां और मुमताज महल की छठी संतान और तीसरी औलाद था। उसका पूरा नाम मुहिउद्दीन मोहम्मद है, लेकिन उसे औरंगजेब या आलमगीर के नाम से जाना जाता था। वह भारत पर राज करनेवाला छठा दुस्ट मुगल शासक था। जिसने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी से भी अधिक समय तक राज किया।इस क्रू र शासक ने अपनी क्रूरता के बल पर अफगानिस्तान से दक्षिण भारत तक मुगल साम्राज्य का विस्तार किया था । यह अपने वंश का सबसे बदनाम शासक था। इसके शासनकाल में बेहिसाब हिन्दुओं के मारने के साथ मंदिरों को तोड़ा गया। औरंगजेब मजहबी तौर पर बेहद क्रूर और कट्टर शासक था जिसके राज में हिंदुओं और सिखों का बेहद क्रू रतापूर्ण तरीके से जबरन धर्म परिवर्तन करवाया और जजिया कर लगाया गया। 


तमाम षड्यंत्रों के बाद शिवाजी के पुत्र सांभाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य पर विजय पायी । एक दिन संभाजी से नाराज उनका साले, गनोजी शिर्के धोखे से अपने जीजा को मुगलों के हवाले कर दिया। उन्हें बंधक बनाकर औरंगजेब के सामने पेश किया गया। उन्हें कई दिन तक अमानवीय यातनाएं दी जाती रहीं। सबसे पहले तो संभाजी महाराज की जीभ काट कर उन्हें रात भर तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। फिर लोहे की गर्म सलाखें घोपकर उनकी आंखें तक निकाल ली गयीं, लेकिन उन्होंने मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके। अपनी जान और राजपाट बचाने के लिए उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया और धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहूति दे दी। औरंगज़ेब ने अपना डर कायम रखने के लिए और हिन्दुओं की रूह कँपाने के लिए संभाजी के सिर को कई शहरों में घुमाया। और अपनी हैवानियत का परिचय दिया। 


कुछ लोग जो औरंगजेब के हिमायती बन रहे हैं वो पढ़ें कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी 1946 में प्रकाशित अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में औरंगजेब को एक धर्मांध और पुरातनपंथी शख्स के रूप में पेश किया।औरंगजेब ने 15 करोड़ हिन्दुस्तानियों पर करीब 48 वर्षों तक क्रूर शासन किया।


2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को खबर दी गई कि काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर को गिरा दिया गया है। औरंगजेब द्वारा काशी विश्वनाथ के विध्वंस को लेकर इतिहासकारों में मतभेद नहीं है। औरंगजेब की सबसे प्रमाणिक जीवनी मासिर ए आलमगीरी में भी इस घटना का जिक्र है।जिसे साकी मुस्ताद खान ने लिखा है। जो मुगलों के दरबारी इतिहासकार थे। साथ में वो मुगल शासक के वक्त फतवे-फरमान और दस्तावेजों के भी गवाह थे। इस किताब में औरंगजेब के द्वरा काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने की घटना का पूरा  कच्चा चिट्ठा मौजूद है।


औरंगजेब मंदिरों का जानी दुश्मन था उसने हिन्दूओं के तीर्थ मथुरा मंदिर तोड़ कर बना दी गई ईदगाह और औरंगजेब ने अपने शासनकाल में गुजरात के सोमनाथ मंदिर को भी दो बार तोड़ने के आदेश जारी किए। मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। मुराक़त ए अबुल हसन के मुताबिक अपने शासनकाल के 10-12 सालों में ही औरंगजेब ने हर उस मंदिर को तुड़वा दिया जिसे ईट या मिट्टी से बनाया गया था।


उत्तर भारत का सुंदर और विशाल गोविंद देव मंदिर में आज भी कट्टरपंथी विचारधारा के निशान मौजूद हैं। मंदिर की सातवीं मंजिल पर जलता हुआ विशालकाय घी का दीपक औरंगजेब को इतना खटका कि उसने चार मंजिल ही तुड़वा दी थीं।औरंगज़ेब ने ब्रज संस्कृति को खत्म करने के लिए ब्रज के नाम तक बदल डाले थे। उसने मथुरा को इस्लामाबाद, वृन्दावन को मेमिनाबाद और गोवर्धन को मुहम्मदपुर का बना दिया था।


क्रूर औरंगजेब, अपने सगे भाई का ह*त्यारा-


औरंगजेब ने  मुराद बख्श के साथ मिलकर अपने भाई दारा शिकोह को मौत की सजा देकर जबरन बादशाह बन गया। औरंगजेब ने 1659 में एक सिपाही के जरिए दारा शिकोह का सिर कलम करवा दिया था जिसका सिर आगरा में दफ्नाया गया और धड़ को दिल्ली में। प्रूफ शाहजहांनामा के मुताबिक औरंगजेब से हारने के बाद दारा शिकोह को जंजीरों से जकड़कर दिल्ली लाया गया और उसके सिर को काटकर आगरा फोर्ट भेजा गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूं के मकबरे के परिसर में दफनाया गया था। 


औरंगजेब की क्रूरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1659 में उसका बड़ा भाई दारा शिकोह जब पकड़ा गया तो औरंगजेब ने उसे और उसके 14 साल के बेटे शिफिर शिकोह को तपती गड़पी में खुजली की बीमारी से ग्रसित हाथियों पर बैठाकर दिल्ली की सड़कों पर घुमाया। अपनी महत्वकांक्षा पूर्ति के लिए अपने अब्बा जान को साढ़े सात साल तक कैद में रखा।


औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा का दिल शायर अकील खां रजी पर आ गया और दोनों की  इस मोहब्बत को औरंगजेब बर्दाश्त नहीं कर सका। औरंगजेब ने अपनी बेटी को 1691 में दिल्ली के सलीमगढ़ किले में कैद करवा दिया। और अकील रजी को हाथियों से कुचलवा कर बेहरहमी से मरवा दिया पिता से नाराज राजकुमारी कैद में श्रीकृष्ण भक्त हो गईं और काफी सारी रचनाएं कृष्ण भक्ति में डूबकर लिखीं। वे किले में कैद होकर भी गजलें, शेर और रुबाइयां लिखती रहीं। 20 सालों की कैद के दौरान उन्होंने लगभग 5000 रचनाएं कीं, जिसका संकलन उनकी मौत के बाद दीवान-ए-मख्फी के नाम से छपा।


औरंगजेब ने जब कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया, तो उन्होंने  सिक्खों के नौवें गुरु तेगबहादुर से मदद मांगी। तेगबहादुर ने इसका विरोध किया तो औरंगजेब ने उन पर भी इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला। पर गुरु तेगबहादुर जी नहीं झुके। उन्होंने कहा हम शीश कटा सकते हैं, केश नहीं। यह सुनकर वह गुस्से से लाल हो गया और फिर उसने नानक जी का सबके सामने सिर कटवा दिया।[1674-75 के दौरान ही सिखों के गुरु तेग बहादुर के पास कश्मीरी पंडित अपनी रक्षा के लिए पहुंचे थे। उन्हे संरक्षण देने के लिए और उनके साथ धर्म परिवर्तन नहीं करने के लिए 24 नवंबर 1675 को चंदनी चौक पर शीश काटने का हुक्म दे डाला था। 24 नवंबर को उनकी शहादत के रूप में लोग याद रखते हैं।] 


सबसे बड़ी बात यह है कि अपने देश में जितने भी बाहरी आये डच, यूनानी, मुगल, अंग्रेज इन सबके मंसूबों को पूरा करने का श्रेय यहीं के जयचंदों गद्दारों को जाता है। कभी भय से तो कभी लालच से लोगों ने अपना ज़मीर बेच दिया और देश इतनी बड़ी मुसीबतों से जूझता रहा पर फिर भी बहुत से अच्छे सच्चे ईमानदार लोगों के कारण सत्य और धर्म की सदैव रक्षा होती रही।ज़रा सोचिए! कि इतना बेहरहम क्रूर बदनाम शासक के लिए आज के कुछ तथाकथित राजनैतिक और अनेकों लोग भगवान महादेव पर सवाल उठा रहे, मानो नास्तिक हुए जा रहे हैं। वोट के लिए इतना भी मत गिरो, ओ! भले मानुष? थोड़ा तो ज़मीर, ईमान और मनुष्यता रखो वरना इतिहास आपको भी नहीं बख्शेगा...! सब यहीं रह जायेगा। ईमानदार रहो। 


_ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

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