हमारा दोस्त

 




                                                      


            हमारा दोस्त 

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सारी दुनिया की नज़र मैं पशु -पक्षी, पेड़ -पौधे,मानव से भिन्न हैं ।ये बात सभी जानते है पर एक चीज़ है जो सभी मैं सामान है वह है प्रेम,प्रेम से भरी एक नज़र फूलों मैं चमक पैदा कर सकती है और पौधों को हौले -हौले झुमा सकी है और किसी भी पशु-पक्षी को आपका सच्चा मित्र बना सकती है ।
    इसी बात को समझाने के लिए एक सच्ची और प्यारी घटना आप सभी को सुनाना चाहूँगी ।
दो साल पहले की बात है हम शुक्रवार का माता लक्ष्मी का व्रत -पूजन किया करते थे ।ये पूजन एक तांबे के कलश मैं पानी भर के उसके नीचे लाल रुमाल और उसके ऊपर चावल का एक छोटा ढेर लगाया जाता है उसी ढेर पर तांबे का पानी भरा कलश रखा जाता है उस कलश के ऊपर एक कटोरी रखी जाती है जिसमे एक गुलाब का फूल और कोई एक सोने का गहना या या एक सिक्का रख कर ये पूजा संपन्न की जाती है और पूजा के बाद मैं ये कलश का जल तुलसी पर चढ़ा दिया जाता है और चावल पक्षियों को डाल दिए जाते हैं । 
   शुक्रवार की शाम हम पूजा करके चावल लेकर छत पर पहुंचे और वो चावल हमने वहीँ बिखेर दिए ।हमने देखा चिड़ियाँ,कबूतर कौवा सभी वहाँ पहले से ही उपस्थित थे।ये देख हमें बहुत अच्छा लगा ।हम कुछ दूरी पर टहलने लगे तभी देखा एक छोटा कौवा उन सभी के बीच मैं ठीक से चुग नहीं पा रहा ।सभी चावल चुग के उड़ गए ।वो वहीँ बैठा रहा ।हम तुरंत नीचे उतरे की थोड़े चावल और ले आयें इसके लिए ।नीचे उतरे तो देखा की वो छोटा कौवा  सामने मुंडेर पर बैठा हमारी तरफ देख रहा है ।हमने उसे एक उसे रोटी का एक छोटा टुकड़ा दिया वो उस रोटी के टुकड़े को अपनी चोंच मैं दबा के उड़ गया ।अब तो ये छोटा कौवा रोज़ सवेरे 9 बजे से 10 बजे के बीच मैं आने लगा। उसकी एक प्यारी आदत है मुंडेर पर बैठ कर 

कॉव -कॉव करने लगता और हमें देख कर चुप हो जाता ।कभी -कभी तो हम उसको कुछ मिनट तक देखते रहते,मुस्कुराते फिर उसको कुछ खाने को दे देते।इस तरह हमारी उस प्यारे छोटे कौवे से अच्छी दोस्ती हो गई । वो भी समय का इतना पावंद था की उससे हमने सीखा की देखो इसके पास कोई घडी नही फिर भी समय पर आता है और एक हम हैं जो अपने काम को कभी कभी  ये कह कर टाल दिया करते हैं की समय का पता ही न चला लेट हो गए ।

    एक बार हमें परीक्षा देने कानपूर जाना पड़ा हमने छोटे भाई से कहा की मेरे दोस्त का ध्यान  ठीक है ।जब हम कानपूर से लौटे तो भाई ने बताया कि वह कौवा बहुत देर तक चिल्लाता था बाद मैं कूलर पर बैठ कर कमरे के अन्दर झांकता था । हमने उसको ब्रैड का दुकड़ा दिया पर फिर भी वो बहुत देर तक यूहीं बैठा रहा बाद मैं फिर ब्रैड का दुकड़ा लेकर उड़ गया ।दीदी कल तो वो इतना चिल्लाया की अचानक देर सारे कौवे इकट्ठा हो गए फिर बड़ी मुश्किल से हमने उन सब को उड़ाया ।
    छोटे भाई की ये बात सुनकर हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा भी हो सकता है  क्या ? ये सोच कर हमारी आँखों से आसूँ टपकने लगे ।हम इधर-उधर देखने लगे कूलर की तरफ भी देखा फिर याद आया कि वो तो अब सुबह ही आएगा । उस रात ठीक से नींद भी न आई कि कब सुबह हो और अपने दोस्त को देखूं ।सुबह वो अपने समय पर हाज़िर था जैसे हमने देखा दौड़ के उसके सामने पहुंची वो हमको देख रहा था उस दिन महसूस हुआ कि प्रेम बहुत महान है सचमुच ।
  आज हमारी दोस्ती को पुरे दो साल हो गए ।वो आज भी आता है उसका समय निश्चित है आने का,कभी सोचती हूँ कि हम ऐसे दोस्त,ऐसा संबंध जिसमे बोली-भाषा की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती ।हम दोनों का एक नज़र देखना ही हजारों बातें कर लेने के जैसा अनुभव देता है ।
  ये क्या तीन दिन बीत गए ये आया क्यों नहीं हमने सोचा की अब ये आयगा तो हम इससे बात नहीं करेंगे फिर मन दर जाता की कहीं कोई दुर्घटना तो नही ।नहीं ऐसा नहीं हो सकता सोच ही रही थी की सामने कपड़े डालने वाले तार पर बैठ कर कॉव-कॉव करने लगा ।हमने देखा आज तो दोस्त आयें हैं अच्छा समझीं ।आज हमारा दोस्त पराया हो गया है कैसे अपनी कौवी के साथ बैठा नज़ाकत दिखा रहा है,कुछ बताया भी नहीं मुझको पहले से । आज हमारी तरफ प्यार से भी नहीं देख रहा जा अब तुझे हमारी क्या जरुरत तेरी पत्नी जो आ गई है दोस्त को भूल गया ।अब क्यूँ हमें देखा कर खुश होगे,अब तो हमारे धुले हुए गीले कपड़ों पर बैठ कर उनको गंदा करके हमें सतायेगा भी नहीं है न और हमको अपने पीछे डंडा लेकर दौड़ायेगा भी नहीं हैं न सही बात बोलो अब । शादी क्या तीन दिन की थी कहाँ था तू, जा मुझे तुम दोनों से कोई बात न करनी है । तुम दोनों ने मुझसे ये बात क्यूँ छिपाई बोलो ,जवाब दो । हाँ सच है इंसानों की रोटी खा कर इंसानों जैसे ही दगाबाज़ हो गया है ।जा उड़ जा ।हमारा इतना कहना था कि ये  क्या हुआ हम तो सोच भी नहीं सकते थे।अचानक दोनों मेरे पास बिलकुल पास आकर बैठ गए इतने पास ऐसा लगा मानो कोई सपना हो हम तो खुशी के आँसूं गालों पर नाच उठे।हम दौड़ के गए रसोई मैं और मिठाई ले आये और उन दोनों को खिलाई ।दोनों मिठाई खाकर उड़ गए ।आज भी वो दिन भूल नहीं पाती ये वो अहसास था जिसको शब्दों मैं बयां कर पाना बहुत मुश्किल है ।  
  दूसरे दिन ऊपर रहनेवाली आंटी जी बोलीं बेटा आज एक भी कौवा नहीं आयेगा क्या ?
  हमने पूछा,''क्यों आंटी जी क्या बात है ?
  आंटी ने कहा,'बेटा आज ससुर जी का श्राद्ध हैं मैंने खग्रास यानि कौवे को खिलाया जाने वाला भोजन,छत पर रख दिया है कोई कौवा नहीं आया तो ये पूजा अधूरी मानी जायेगी क्या करूँ ।
  हमने देखा आज मेरे दोनों दोस्त भी नहीं आये।घड़ी देखी तो 10 बजने मैं एक मिनट कम था ।हमने कहा आंटी जी चिंता न करो आपकी पूजा सफल होगी एक मिनट का इंतजार करो।
आंटी जी बोली आ गए,आ गए  भोग लगा रहें हैं ।हमने कहा आंटी जी दोनों है क्या ? आंटी जीने कहा,'"हाँ ।'
हमें कुछ अजीब लगा ये तो सबसे पहले अपनी दोस्त के हाथ से खाता है।आज आंटी का पुड़ी -मिठाई के कारण अपनी दोस्त की रोटी भूल गया ।
सोच ही रही थी कि सामने दोनों बैठे थे ।हमने कहा क्यूँ चख आये पूड़ी-मिठाई अब क्यों बैठे हो जाओ उड़ जाओ ।ये कहते ही आंख भर आयी ।हम आंगन मैं खड़े होकर उनको  लगी ।
तभी आंटी जी बोली क्यूँ चिल्ला रही हो बेचारों पर ये तो बस तेरे ही हैं किसकी हिम्मत जो इनको खिला सकें और हँस पड़ी ।हमने कहा,'' क्या मतलब ।
आंटी जी बोली,'ऊपर आ ।' हम छत पर पहुंचे तो देखा की काफी कौवे थे ।हमरी समझ नहीं आया कि कोण सा कौवा हमारा दोस्त है सभी एक जैसे ही लग रहे थे ।हमने निचे झांक कर देखा तो वो दोनों नीचे तार पर बैठे थे । आंटी जी मुस्कुराई और बोलीं,''नहीं पहिचान सकती न ।''मुझे अपनी गल्ती का अहसास हुआ की इतने सरे कौवों मैं से हम अपने को पहिचान भी नहीं पा रहें ।ये हमारा प्यार है ।वो हमको पहिचान लेता है कितनी बड़ी बात है ये कोई साधारण बात नहीं है ।ये सोचती हुई हारी हुई सी नीचे आयी तो देखा वो हमारी तरफ देख रहें है उनका मासूमियत से देखना ऐसा लगा मानो मेरा कन्हैया मुझको देख रहा हो सचमुच इंसान के प्रेम से जीवों का प्रेम महान है जो कभी बनावटी हो ही नहीं सकता । हम कितने गलत थे जो अपने दोस्त के बारे मैं ऐसा सोच रहें थे और तभी दोनों शरारत करना शुरू कर दिया ।तार पर टँगी हुई पापा जी की सफ़ेद रंग की कमीज़ पर बार- बार बैठ जाते दोनों ।हम दोनों के पीछे भागे ।माँ बोलीं बेटा,"ये ले रोटी खिला दे ।''
हुमने कहा,''क्या बात हैं दोस्तों माँ को भी दोस्त बना लिया ये लो खा लो माँ के हाँथ की सोंधी रोटी । दोनों रोटी लेकर उड़ गए ।आंटी जी बोली,''दोस्त ये तेरे ही है।''
हम मुस्कुरा उठे ।
आज भी सोचती हूँ कि सचमुच प्रेम अगर सच्चा हो तो सामनेवाला वो जीव हो या मानव बिन बोले ही दिल की आवाज़ को सुन और महसूस कर सकता है ।
माँ सच कहतीं हैं की किसी के बारे मैं इतनी जल्दी गलत राय नहीं बनानी चाहिये ।एक गलत सोच अच्छे रिश्ते को भी टूटने के कगार पर ला कड़ी कर सकती है ।
आज जो समाज मैं रिश्तों की होली जल रही है उसके पीछे कहीं न कहीं गलत सोच धारणा ही संभवता ।
         " आइये एक मौका दें ख़ुद को ख़ुद से ताकि हम मुस्कुराएँ रहें और हमारा समाज मुस्कुराये ।"
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   आकांक्षा सक्सेना 
,बाबरपुर जिला-औरैया 
          उत्तर प्रदेश                                                                                     

Comments

  1. AAPKI OR MERI KAHANI BILKUL HU B HU MILTI HE AAKANKSHAJI

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