ओ ! ज़ालिम 
...............


करवट मैं तेरी ओ ! ज़ालिम 

पैमाने लाख छलक जाएँ 

तुझे पाने की हसरत में 

दीवाने रोज़ पिघल जाएँ 


             
       तू आती जब इस महफ़िल में 

       हर दिल के ताले खुल जाएँ 

       जीत भी तू और हार भी तू 

        सब कहते-कहते मर जाएँ 



ज़ालिम इतना तडपती क्यूँ 

दो बोल मोहब्बत के तू बोल 

मेरी कस्ती मझदार पड़ी 

तू माँझी बन के आ जाए 
     


        तुम मेरे लिए तरसते हो 

        तुम सब मुझ पर मरते हो 

        मेरे एक इशारे पर 

        आपस में लड़ते मरते हो 



इससे आधा ही प्रेम सही 

जो तुम प्रभु जी से कर लो 

मांझी संसार का है कान्हा 

बन जाओ दीवाने तुम उसके 



      समय- समय की बात है ये 

      आज हूँ जवान कल बूढ़ी होंगीं 

      संसार का सुख है पल भर का 

      नाता उस परमसुन्दरता से तू जोड़ 
.
 






आकांक्षा सक्सेना               

बाबरपुर,जिला-औरैया 

उत्तर प्रदेश 

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