- समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Sunday, March 10, 2013



आज प्रेम को
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आज  जिस्म को ज़िस्म से इतना लपेटा जाता है,इतना लपेटा जाता है
 क़ि लिपट -लिपट कर घुटन से उसका दम उखड जाता है ।





आकांक्षा सक्सेना
जिला औरैया
४ मार्च 2013 

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