भले कुछ काम


भले काम

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जीवन के दिन चार 
कर लो भले कुछ काम

कश्मीरी पण्ड़ितों की
खामोश जिंदगी की
बेचैन खोयीं आँखें
क्यों हैं आज भी
उलझी,उपेक्षित बातें

काहे दंगा काहे फसाद
कर लो भले कुछ काम

जात-पात देश-धर्म
पर बन्द हो राजनीति
देश का गौरवशाली
इतिहास बन्द हों
इसपर कुठाराघात


जीवन के दिन चार
कर लो भले कुछ काम

हे!कलम तू भी कर
एक भला ये काम
जय हिन्द लिखकर
ही रूकना अब चाहे
स्याही भी ना दे साथ

जीवन के दिन चार
कर लो भले कुछ काम


स्वलिखित रचना
लेखिका
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश




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