कैसे रोकें मानव तस्करी






कैसें रोकें मानव तस्करी  :

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भारतीय जनजीवन की आखिर वह कौन सी कमजोरी एंव मजबूरी है जिसके तहत भारतीय जनजीवन डचों , पुर्तगालियों, यूनानियों , मुगलों एंव ब्रिटिश के अंग्रेजों का  अपराधयुक्त एंव रोजगारमुक्त गुलाम बनकर हजारों वर्षों तक पीड़ित रहा है | देश की स्वतंत्रता , आजादी व मुक्तता के बाद भारतीय जनजीवन की आखिर वह कौन सी कमजोरी व मजबूरी है जिसके तहत भारतीय जनजीवन वर्तमान में भी स्वदेशी सत्तासीनों , पूँजीपतियों एंव कानूनविदों का अपराधयुक्त एंव रोजगारमुक्त गुलाम है | भारतीय जनजीवन की आखिर ! वह कौन सी कमजोरी एंव मजबूरी है जिसके तहत भारतीय जनजीवन की बहुत बड़े पैमाने पर मानव तस्करी होती है | देश के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार देश से प्रतिवर्ष लगभग 42,000 लोगों की मानव तस्करी होती है | जो लोग इस गोरखधंधे को अंजाम देते हैं | उन्हें यह पता है कि वे जिन विवाहित, अविवाहित व मृतक लोगों की मानव तस्करी कर रहे हैं उनके पास अपने विवाह जन्म व मृत्यु का पंजीकरण बीमाकरण व लाईसैंसीकरण का ना तो प्रमाण पत्र व पहिचानपत्र प्राप्त है और ना ही उनकी विवाह तिथि जन्मतिथि व मृत्यु तिथि की पंजीकृत , बीमाकृत व लाईसैंसीकृत संख्या सबंधित कार्यालय के नाम पता सहित भारतीय नागरिकों के पहिचान के सभी प्रकार के दस्ताबेजों में दर्ज है | ये लोग इन अभिलेखों एंव दस्तावेजों के अनुसार वैधानिक , संवैधानिक एंव कानूनी रूप से ना तो विवाहित है और ना ही जन्में हैं | ये तो पूर्व से ही मृतक हैं और इनको तो अपनी मृत्यु का भी प्रमाणपत्र एंव पहिचानपत्र प्राप्त नहीं है | लिहाजा इन अपराधयुक्त एंव रोजगारमुक्त दस्तावेजी लाबारिसों की मानव तस्करी करना, इनका शोषण करना व इनके महत्वपूर्ण शारीरिक मानव अंगों को जबरन निकालकर एंव बेच कर धनार्जन करना तथा इस वास्ते इनका वध एंव विनाश करना ना तो कोई वैधानिक संवैधानिक कानूनी अपराध है और ना ही कोई धार्मिक एंव कार्मिक पाप है | मानव तस्कर भारतीय जनजीवन की इसी मजबूरी व कमजोरी का भरपूर लाभ उठातें हैं | देश के माननीय भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय यदि चाह लें तो क्या भारतीय जनजीवन अपराधयुक्त व रोजगारमुक्त रह सकता है ? खेद इस बात का है कि जब से यह देश स्वतंत्र आजाद व मुक्त हुआ है तब से लेकर अब तक के किसी भी भारतीय सर्वोच्च मुख्य न्या़याधीश महोदय ने देश की केन्द्र सरकार व सभी राज्य सरकारों को यह आदेशित नहीं किया है कि भारतीय जनजीवन को अनिवार्य एंव परमावश्यकरूप से अपराधमुक्त एंव रोजगारयुक्त बनायें | अत: यदि ऐसा आदेश किया गया होता तो भारतीय जनजीवन पूरी तरह से अपराधमुक्त व रोजगारयुक्त होता | अत: देश के प्रत्येक परिवार के मुखिया को चाहिये कि वह स्वय ही अपने परिवार के प्रत्येक विवाहित जन्में व मृतक सदस्य के विवाह तिथि , जन्मतिथि व मृत्यु तिथि का अनिवार्य एंव परमावश्यकरूप से पंजीकरण, बीमाकरण व लाईसैंसीकरण करवायें एंव प्रमाणपत्र प्राप्त करके देश के नागरिकों के पहिचान के सभी प्रकार के दस्तावेजों में दर्ज करायें और अपना तीनों प्रकार का भारतीय जनजीवन वैधानिक, संवैधानिक व कानूनी रूप से दस्तावेजी लावारिस होने से बचायें | इस प्रकार देश का प्रत्येक नागरिक अपनी इच्क्षा व योग्यतानुसार बिना किसी बाधा के समान सरकारी व मतकारी, अर्धसरकारी व कर्मचारी एंव निजीकारी व श्रमकारी आजीविका एंव पैंसन तथा बुनियादी सेवायें एंव सुविधायें प्राप्त कर अपना तीनों प्रकार का भारतीय जनजीवन अपराधमुक्त व रोजगारयुक्त सुखी बनायें | अपने जीवन को  मानव तस्करों से बचायें |


आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'

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