कविता : हाहाकार - समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Sunday, November 5, 2017

कविता : हाहाकार




हाहाकार
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पैसा पावर और जुगाड़
हो, ब्यूटी, टैलेन्ट तो क्या हो बात
फिर जो बटरिंग कर जाये बेमिशाल....!
बस उसकी किस्मत उसका राज्य....
आज कलयुग की है यही डिमाण्ड....!
आँसुओं का भी हो रहा व्यापार
पाप की गठरी बस जिन्दाबाद....!
जनता शोषित बदहाल पड़ी
उनको तो बस वोट की पड़ी....!
भैंस भी लाठी बन गयी आज
न्याय-नैतिकता हुई गुमनाम
असत्य के साथ चार बॉडीगार्ड....!
कोई नही सुनता फरियाद
गरीब की आस बस भगवान.....!
सब जानकर बनते अनजान
चारों तरफ आज हाहाकार.....!


आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'

Published in National Newspaper Jan Samba.




Published in News portal Jansamna national newspaper kanpur u.p


http://jansaamna.com/?p=14846



.....🙏बहुत-बहुत धन्यवाद🙏....

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