Saturday, December 9, 2017

शोध पत्र : उच्च शिक्षा में दर्शन और नैतिक मूल्य अनिवार्य



शोधकर्ता ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 
मेम्बर ऑफ स्क्रिप्ट राईटर ऐसोसिएसन मुम्बई 
न्यूज एडीटर सच की दस्तक नेशनल मैग्जीन 
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शोधपत्र : शोधकर्ता ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 


विषय  : उच्च शिक्षा में दर्शन और नैतिक मूल्य 


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 हमारे देश की उन्नति और प्रगृति को उच्च आयाम दिलाने के लिये 
तथा उच्चशिक्षा के प्रति सभी का बढ़ते आकर्षण को देखते हुये बड़ी कोशिसों के बावजूद विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग 1948-49 में स्थापित हुआ | तथा 1854 में चार्ल्स वुड की अध्यक्षा में गठित समिति के वुड डिस्पेच नाम का एक घोषणापत्र प्रकाशित हुआ जिसमें देश के विश्वविद्यालयों को सर्वोच्च स्थान दिया गया | इसके बाद 1857 में सर विल्यम हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग का गठन हुआ और इस कमीशन ने महाविद्यालयों को उनकी प्रगृति और उत्थान लिये अनुदान देना आरम्भ किया| विश्व विद्यालयी शिक्षा का एक ही महत्वपूर्ण उदेश्य था कि शिक्षा में शोध को बढ़ावा मिले और देश विश्वगुरू के नाम से हमेशा ही ख्याति पाये | हमारे देश में नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय थे जहाँ देश-दुनियाँ के विद्यार्थी विद्याध्यन के लिये आते थे | फिर, इतिहास साक्षी है कि अलाउद्दीन खिलजी ने सोचा कि किसी देश को बर्बाद करना है तो उसके ज्ञान को मिटा दो, फिर उसने सबकुछ तहस-नहस कर दिया | यह देश के प्राचीन ज्ञान और विज्ञान के लिये बहुत बड़ी त्रासदी थी कि सब ज्ञान का भंण्डार उस अलाउद्दीन खिलजी की विध्वंशक सनक की अग्नि में स्वाहा हो गया | हम यह कह सकते हैं कि उस ज्ञान के महाभंण्डार की पूर्ति करना अब कभी सम्भव नही हो सकता पर आज जो ज्ञान भंण्डार हमारे शिक्षकों के मन-मस्तिष्क तथा पुस्तकालयों में है अफसोस! कि हम उस ज्ञान से भी आज भाग रहे हैं | हमें हर चीज की इतनी जल्दी है कि खाना तक चायनीज लच्छों में बदल गया है | हमारी मानसिकता हर अनैतिक अामर्यादित चीज पर पूर्णरूपेण आकर्षित है और हम केवल धन कमाने के कारण ही उच्चशिक्षा की डिग्री पाना चाहते बस | हमारे जीवन का भी बस एक ही उद्देश्य है बस धनार्जन करना और इस धनार्जन की कभी न मिटने वाली भूख ने ज्यादातर समस्त विद्यार्थियों ने अपने नैतिकमूल्यों और नैतिक कर्तव्यों को दूर खूँटी पर टाँग दिया है | उनको इस बात की कोई फिक्र नही कि उच्चशिक्षा हमारे देश में किन - किन दार्शनिकों के जीवनतप और कुर्बानियों से विकसित हुई है| उनको बस सर्टिफिकेट चाहिये ज्ञान नही | अब इस धन के लालच में भागती भीड़ से उच्चशिक्षा के उत्थान की क्या उम्मीद की जा सकती है | यह जो शिक्षा के प्रति उदासीनता दिख रही है यह नैतिकमूल्यों में आयी गिरावट और दर्शन में आयी रूकावट का परिणाम है | जिसे सुधारे बिना हम कोई बड़े सुखद परिणाम की उम्मीद नही कर सकते |
अब बात आती है कि दर्शन क्या है?


दर्शन की परिभाषा 

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हम हमारे शब्दों में कह सकते हैं कि किसी विशिष्ट विषय पर केन्द्रित क्रमबद्ध अन्तर्मन के ज्ञान की परिकल्पना को दर्शन कहते है |
अब बात आती है नैतिकमूल्य किसे कहते हैं?

नैतिकमूल्यों की परिभाषा
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बुनियादी स्वंय सहायताकारी, प्रतिभाशाली एवं परोपकारी मानवकर्म के तथा बुनियादी स्वंय सेवाकारी, मर्यादाशाली एवं सत्यवादी मानवधर्म के आपसी सभ्य मानवीय रिश्तों के, मैत्री के एवं सांस्कृतिक सम्बंधों के अनुशासन को नैतिकमूल्य कहते हैं |

अब बात आती है कि आखिर! कैसे सृजित कियें जायें नैतिकमूल्य : ..................................................



आपने इन दो शब्दों को सुना ही होगा एक जन्म और दूसरा अवतरण | हम अपने शब्दों में कह सकते हैं कि मताधिकार के सिस्टम के तहत देश की शिशु संताने अपनी माँ के गर्भ से सिर के बल उल्टी जन्म लेतीं हैं और जन्मजात ही सबसे पहली बार पशुओं का दूध पीतीं हैं | इसीलिये इन संतानों को उल्टी बात ही आसानी से समझ आती है और इनकी नजरों में नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्य हुआ ही नही करते|
देश के उत्तराधिकार सिस्टम के तहत देश की जनता की शिशु संताने अपनी माँ के गर्भ से पैरों के बल सीधी अवतरित होती हैं | जो सबसे पहली बार अपनी नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्यवान एवं शिशुवान अपनी माँ समान अपने रिश्ते या मैत्री या सांस्कृतिक सम्बंधों की मौसी का मानुष दूध पीकर फिर तब तक अपनी माँ के आँचल में दुग्ध बन जाने पर उस अमृततुल्य दुग्धपान करती हैं | ऐसी अनुशाषित नैतिक संताने ही ईश्वरीय नेक इंसान व भगवान हुआ करती हैं | जिन्हें सीधी बात ही आसानी से समझ आती है | इनकी नजरों में लोककल्याणकारी नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्य ही हुआ करते हैं | इनके पास अपनी व अपने जीवन की प्रमाणित एवं सत्यापित पहिचान हुआ करती है | इस बात का आशय यह है कि जब इस प्रक्रिया के नैतिक सभ्य संताने जब निष्कामभाव ये अपनी संतति बढ़ानेहेतु अपनी संतानप्राप्ति हेतु परमशक्ति से लोककल्याण की भावना से आवा्हन करतीं हैं तो जन्म नही फिर अवतरण ही होता है क्योंकि संतान लाने में ईश्वरीयगुण संतान पाने का पुकारभाव जो निहित होता है |
इन्ही संतानों को नैतिकमूल्यों से परिपूर्ण वैज्ञानिकभाषा में उन्नत मानवनस्लें और धार्मिक भाषा में अवतरित संतानें कहते हैं जिनका उद्देश्य लोककल्याण ही होता है | यह सब सबकी अच्छी उत्पत्ति, सबका अच्छा विकास एवं सबका अच्छा साथ से ही सम्भव है|
हम कह सकते हैं कि आखिर! ईश्वर ने प्रत्येक मानव को अपने समान नेक इंसान व एक भगवान क्यों बनाया ? क्योंकि ईश्वर यह भलीभाँति जानता है कि उसका काम सिर्फ मानव ही कर सकता है | इसलिये ईश्वर प्रत्येक मानव को भूखा तो जगाता है और खिलाकर ही सुलाता है | ईश्वर चाहता तो वह मानव को कुछ और भी बना सकता था | ईश्वर यदि अपनी पूजा अर्चना करवाना चाहता तो उसके पास इसकी भी कोई कमीं नही | देश का प्रत्येक व्यक्ति जब अपने ईश्वर की ओर उन्मुख होता है तो वह विचार करता है कि मैं कौन हूँ? मैं कैसे हूँ? मैं कहाँ हूँ? मैं कब से हूँ? मैं क्यों हूँ? मुझे ईश्वर ने कौन सा काम दिया है ? क्या मैं ईश्वरप्रदत्त कार्य कर रहा हूँ ? यहीं से अनुशासित लोककल्याणकारी नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्यों के सृजन का अनुसंधानिक शुभारम्भ होता है |
अत:, उपरोक्त विवरण के सार स्वरूप हम कह सकते हैं कि आज की वर्तमान व्यवस्था में केवल जन्म हो रहें हैं पर अवतरण नही क्योंकि इंसान ऊपर से तो मानव रहा पर अंदर से पशुगुणी हो गया है | 

न.1- उच्च शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि  : 

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सबसे पहले पृष्ठभूमि शब्द को समझते हैं - उच्चशिक्षा में समय और परिस्थितिवश पहले प्रयोग हो चुके महान शिक्षाशास्त्री और दार्शनिकों की विचारधारा एवं सुझाव के सामने नयी विचारधारा शोध एवं प्रयोग हो और उस नये प्रयोग से पिछले हुये शोध का स्वरूप स्पष्टता से प्रतिबिम्बित हो रहा हो, इसी को उच्च शिक्षा में दार्शनिकता की पारिभाषिकरूप से पृष्ठभूमि कहते हैं |
अत:, हम यह कह सकते हैं कि उच्च शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि हमारे देश में आदिकाल से बेहद आश्चर्यजनक और कौतुहलपूर्ण रही है | उदाहरणार्थ - वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि रामायणकाल यानि त्रेतायुग में लंकाधीश रावण के पास मन की गति से चलने वाला पुष्पक विमान था |
यह थी हमारे देश के इतिहास की प्राचीनतम् महान शिक्षा- तकनीकी और शोध - दर्शन की अद्भुद उपज या कहें अविष्कार | आज की उच्च शिक्षा और शोध-दर्शन प्राचीन शिक्षा, तकनीक, शोध और दर्शन की ही शोध यानि खोज कर रहा है और इन्ही प्राचीन धर्मग्रंथों की अजब तकनीक की उँगली पकड़े क्रमश: आगें बढ़ता जा रहा है | आज के शोधार्थियों ने अपने प्राचीन इतिहास से प्रेरणा लेकर उच्च आधुनिक तकनीक इजाद करके हवाई जहाज तथा तरंगों को मानो जीतते हुये मोबाइल इजाद करके पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ी सहूलियत देते हुये सभी को करीब ला दिया है | जिनसे आज एक देश से दूसरे देश बैठे व्यक्ति से उसको देखते हुये बात हो जाती है जिसे वीडियोचैट तकनीक कहते हैं | यहीं हैं उच्च शिक्षा में आधनिक शोध दर्शन के महानतम् प्रयोग जिन्हें पूरा विश्व सलाम कर रहा है |
हम कह सकते हैं कि हमारी उच्च शिक्षा शोध दर्शन के बिना पूर्णत: निर्थक है |
इसी बात को समझते हुये हमारे देश में स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, महात्मा गाँधी, सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, ओशो तथा ऐ,पी.जे अब्दुल कलाम जैसे महान शिक्षाप्रेमी दार्शनिक हुये हैं |
सर्व सम्माननीय हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति रहे स्व. ऐ.पी.जे कलाम जी ने कहा था कि सपना वो नही जो सोते समय आता है सपना तो वो है जो हमें सोने नही देता यह था कलाम सर का दर्शन कि जिनके इन स्वर्णिम अद्भुद अमर वाक्य ने देश-दुनिया के सभी शिक्षार्थियों के अन्तर्मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया और उन्हें आगें बढ़ने को प्रेरित कर दिया | महान भारतीय दार्शनिक ओशो यानि रजनीश ने देश-दुनिया के आध्यात्मिक शोधार्थियों से जब कहा कि बूँद ही सागर है |
तो अपने इस दर्शन से उन्होने विश्व को चौंका दिया था और फिर आध्यात्मिक पारलौकिक दुनिया के रहस्यों और मरने की कला तथा आत्मा को जानने के लिये पूरे विश्व के आध्यात्मिक शोधार्थी उनके पास हजारों- लाखों की संख्या में उनके शोध दर्शन ध्यान योग वैराग्य को जानने समझने पहुंचे |
हम कह सकते हैं कि शोध और दर्शन वो दिव्यता है जो सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित करती है | अत:, उच्च शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि के उपरोक्त विवरण के आधार पर हम बस यही कह सकते हैं उच्च शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि प्राचीन काल के दर्शन से ही पुष्पित और पल्वित होती रही है बस आज समय की मांग के अनुसार उसका आधुनीकरण हो रहा है और हो भी क्यों ना | जब हम हवाई जहाज बना रहें तो उसको आकाश में उड़ान भरने के लिये उसका खास पेट्रोल बनाना होगा और उससे भी जरूरी उस पर नियन्त्रण करने वाला सभ्य नैतिक गुण मूल्यों के साथ प्रतिभावान पायलट भी बैठाना होगा | क्योंकि पायलट का गलत चुनाव हवाई जहाज में बैठे सभी यात्रियों की जान पर बहुत भारी पड़ सकता है | आखिर! हम कब तक किसी की विचारधारा को पकड़े सिर धुनते रहेगें, हमें स्वंय अपनी सहूलियत और जन मानष की उन्नत सोच के साथ विकास और विस्तार के लिये उन्नत प्रयोग करने होगें और उनका आधुनिक तरीके से क्रियान्वयन भी करना हमारा कर्तव्य होगा | उपरोक्त विवरण का सार हमें एक लाईन में कहना हो तो हम कह सकते कि उच्चशिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि को दार्शनिकों की कर्मभूमि कहना भी गलत नही होगा |

न-2 उच्च शिक्षा : दिशा और उद्धेश्य 

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जब विद्धार्थी अपने पिछले ज्ञान का प्रयोगसहित विस्तृत ज्ञान की आकांक्षा रखकर स्कूल के बाद कॉलेज में कदम रखता है तो यह भी विचार करता है कि उसे ज्ञान- विज्ञान के साथ रोजगार भी मिलेगा पर अफसोस! आज हमारे देश में 222 से अधिक विश्वविद्धालय और 8000 से अधिक महाविद्धालय है | फिर भी विड्म्बना यह है कि राजनैतिक दबाव के चलते हर क्षेत्र प्रदूषित हो चुका है और उसका परिणाम यह है कि आज हमारे देश में 12 करोड़ लोग बेरोजगार है जो किसी भी विद्धार्थी के मनोबल को गिराने के लिये काफी है |
आज दिशाहीन होती उच्च शिक्षा को उचित सकारात्मक दिशा या बदलाव की जरूरत है जो निम्न तरीकों से आ सकता है :
1- विद्या के मंदिरों को किसी भी तरह की राजनीति से दूर रखा जाये | 2- उच्चशिक्षा में शोध तथा अनुसंधान और दर्शन तथा नैतिकशिक्षा, साहित्य संगोष्ठियों को अनिवार्य कर दिया जाये | 3- उच्चशिक्षा को रोचक और किफायती व सुलभ तथा रोजगारपरक भी बनाया जाये | 4- उच्चशिक्षा में शोध कार्यशालाओं प्रयोगशालाओं को आधुनिक बनाया जाये | 5- उच्चशिक्षा में छात्र उपस्थिति और अनुशासन का शिक्षक और छात्र दोनों के लिये समानभाव से लागू कर देना चाहिये |
हम कह सकते हैं कि इन सभी सुझाव के लागू होते ही उच्चशिक्षा की दिशा बहुत हद तक सुधरेगी जिसके दूरगामी परिणाम होगें एक दिन हम सभी के सामने होगें | अब! बात आती है उच्च शिक्षा के उद्देश्य की | तो, हम कह सकते हैं कि उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यही है कि शिक्षार्थी एक शोधार्थी बनके स्वंय और देश को एक नयी सोच और नयी पहिचान दे | 

न-3 शोध में नैतिक मूल्यों की भूमिका -
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किसी भी विषय पर शोध करने वाले शोधार्थी का शोध उसके अपने नैतिकमूल्यों और दर्शन का प्रतिबिम्ब होता है |
शोध मैं नैतिकमूल्यों की अहम भूमिका निहित होती रही है और होना चाहिये | कभी - कभी जब अनैतिकमूल्यों वाले व्यक्ति आतंक के लिये शोध करते है तो वह शोध विध्वंशक मानसिकता के परिणाम होते हैं जिनसे विध्वंस ही होता है जैसे कि उत्तर कोरिया का तानाशाह अपनी विध्वंशक शोध से बने भयंकर बम और मिसाइल से दुनियाँ को धमका रहा है, आई.एस.आई विश्व का सबसे क्रूर आतंकी संगठन जो दुनियाँ में दहसत फैलाने के लिये और अपना डर कायम रखने के लिये अत्याधुनिक शोधों के द्वारा भयंकर हथियार बना कर दुनियाँ को आँख दिखा रहा है | यही है आमनवता और अनैतिकता | बस यही कारण है आज के अपराधिक माहौल को देखते हुये कि प्राईमरी से उच्चशिक्षा और शोध में नैतिक शिक्षा एक विशेष और महत्वपूर्ण विषय के रूप में तुरन्त अनिवार्य कर देनी चाहिये | जिससे होने वाले शोध जनहित, लोकहित और विश्व शांति में हो सकें | हम यह कह सकते हैं कि हमारे शोध में नैतिकता और भविष्य के पार देखने की दूरदर्शता होगी तभी हमारे शोध सही मायने में सफल हो सकेगें | आज शोध के क्षेत्र में बहुआयामी प्रयोग हो रहे हैं | आज शोध अनंत अंतरिक्ष के ग्रहों के उन उन्नत प्राणियों की खोज कर रहा है जिनके यान पलक छपकते प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से गायब हो जाते है और हमारे शोध से बने विशेष राडारों भी जिन्हें नही पकड़ पाते | हम अपने पड़ोसी ग्रहों के प्राणियों के अस्तित्व को कतई नाकार नही सकते और नजरंदाज भी नही कर सकते क्योंकि अपारशक्ति और बेहद उन्नत तकनीकि वाले प्राणी की मनोस्थिति कब विध्वंशक रूप ले ले कोई नही जानता | इसलिये हमारे शोधार्थी भी नैतिक गुणमूल्यों वालें होने चाहिये जिनके शोध दुनिया को बचाने की सही नीति बनाने वाले व स्वच्छ और स्वस्थ्य नियत वाले होना बेहद महत्वपूर्ण है | तभी, हम ब्रह्माण्ड के अनंत ग्रही अनदेखे अद्भुद प्राणियों का सामना और बचाव कर सकें | अब ये हमें तय करना है कि हम उनका सामना करने के लिये कितनी हद तक तैयार है और अगर नहीं हैं तो हमें होने में कितना वक्त लगेगा | जब हम इतनी दूरदर्शी विश्व शांति की सोच रखते हुये अपने शोध की नींव रखेगें तो हमारे शोध व अविष्कार दोनों सफल होगें | क्योंकि जिस देश में जितने जनहित के महान अविष्कारों होगें उतना ही वह देश उन्नत होगा जहाँ किसी तरह के भय का नाम-ओ-निशाँ नही होगा | बस, यही
सफलतायें भविष्य में उन्नत मानव को जन्म देगीं जिनका आज सम्पूर्ण विश्व बेसब्री से इंतजार कर रहा है |

न- 4 आचार्य और विद्यार्थी के सम्बंधों में नैतिक मूल्य  :
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आचार्य शब्द बहुत ही व्यापक, विराट और महान है | आचार्य शब्द से आशय है पूर्णमर्यादित समानभाव से सदाचार सिखाने वाला और विद्यार्थी शब्द का आशय है पूर्ण मर्यादित सेवाभाव से विद्या का अर्जन करने वाला| इन्हीं महान नैतिक गुणों के होने के कारण ही आचार्य और विद्यार्थी के सम्बंध सुमधुर हुआ करते थे | अफसोस! समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदल गया हम पाश्चात् संस्कृति की चकाचौंध में कुछ इस तरह भ्रमित हो चुके हैं कि हम संस्कार को छोड़ केवल धन कमाने और अपनी जल्दी धनवान बनने की महत्वाकांक्षा को हर कीमत पर पूर्ण करने की की अँधी दौड़ में रात-दिन भागे जा रहे है | इसी अँधीदौड़ ने आज नैतिकता को बहुत पीछे छोड़ दिया है | आज इस दूषित मानसिकता ने आचार्य और विद्यार्थी के सम्बंधों पर भी ग्रहण लगा रखा है | आज इस आधुनिकता की चकाचौंध का यह हाल है कि लड़कियों की चोटियाँ गायब हो चुकी है और लड़के चोटी (पोनीटेल) बनाये हुये, आनंदित हो रहे हैं | आज के प्रवक्ता घड़ी से देखकर पढ़ाने और नोटबुक रंगाने की ओपचारिकता पूरी कर रहे हैं और विद्यार्थी नकल भरोसे केवल डिग्री चाहता है, योग्यता और ज्ञान नही |
आज आचार्य और विद्यार्थी के बीच नैतिकमूल्य जैसे- अभिवादन, श्रद्धा, सम्मान, मर्यादित आचरण, उच्च चरित्र, वाणी का संयम, समानता, पार्दर्शिता, दया, परोपकार, निस्वार्थ सात्विक आदर प्रेम, आशीर्वाद, उच्च शिक्षा से अदृर्श्य हो चुके हैं | आज जब तक शिक्षक अपनी निजि राजनीतिक विचारधारा छोड़ अपने विद्यार्थी को निष्पक्ष और पारदर्शी रूप से एक समान आत्मिक भाव से निस्वार्थ रूप से मर्यादित आचरण से पूरे मन से बिना बार-बार घड़ी देखे, उदासीनता त्याग कर अपने सभी विद्यार्थियों को समभाव से शिक्षा का शांत माहौल तैयार नही करता तथा सहजता से सद्ज्ञान देकर उन्हें शोध की ओर प्रेरित नही करता तब तक वह सामने बैठे विद्यार्थियों के मन अपने लिये सम्मान की उम्मीद नही कर सकता क्योंकि आज के माहौल में शिक्षा की ध्वस्त व्यवस्था को सुधारने के लिये पहल शिक्षकों को ही करनी होगी | फिर, जब विद्यार्थी भी शिक्षकों की भांति ही आचरण करने को बाध्य नही बल्कि सहजरूप से तैयार होगें | बहुत दुख की बात है कि बदलते समय ने शिक्षारूपी विशाल और दिव्य बृक्ष की जड़ें ही हिला दीं है | जब आज सुनने और देखने को मिलता है कि आजके कलयुगी गुरू अपनी शिष्याओं से प्रेम तथा बलात्कार तक कर रहे हैं | आज सबसे ज्यादा गिरावट आचार्य और विद्यार्थी के सम्बंधों में आयी है | आज विद्यार्थी का भरोसा अपने कुछ कलयुगी शिक्षक के ऊपर से पूरी तरह से उठ चुका है और छात्र उन्हें बीच बाजार पीटने पर आमादा हैं | आज शिक्षक स्वंय अपनी पद की गरिमाभूल अमर्यादित आचरण कर रहे हैं वह पान-गुटखा खाकर स्वंय कॉलेजों की दीवारें रंग रहा है और अपने कुछ ट्यूशन यानि कोचिंग की दुकान खोलकर उसमें पढ़ने वाले छात्रों को प्रायोगिक परीक्षा में अच्छे नम्बर का लालच देकर उनसे मनमानी फीस बसूल रहा है| इसी प्रेक्टिकल में अंक बढ़त के खेल में वह अपनी शिष्याओं को भी लालच देकर अथवा डरा -धमकाकर और गुमराह करके उसका यौनशोषण कर रहा है | इसी मर्यादाहीनता का दुष्परिणाम यह हुआ कि छात्र रिश्वत देकर अंक बढ़वाने पर आमादा है और कुछ शिष्यायें उन्हें पीटने पर तथा कुछ आत्महत्या पर आमादा है तथा गरीब छात्र जो कोचिंग की फीस देने में असमर्थ है वह उचित शिक्षा ना मिल पाने पर
खींज उठते हैं फिर गुट बनाकर अपना विद्रोह दिखाने पर नेता बनने पर आमादा है | आज स्थति यह है कि शिक्षक और विद्यार्थी के आपसी आदर प्रेमरूप संस्कारों की माला टूट कर बिखर चुकी है | जिसे केवल नैतिकमूल्यों और सभ्य और स्वस्थ्य दार्शनिक विचारधारा से ही जोड़ा या पुनर्जीवित किया जा सकता है |
आज ग्रामीण और शहरी दोनों में आचार्य और विद्यार्थी के सम्बंधों की मर्यादित गहराई का रूप अनैतिकता की खाई ने लिया है जिसे बिना नैतिकमूल्यों की पुनर्स्थापना किये पाट पाना सम्भव नही | सभी के स्वस्थ्य, सुन्दर और सुदृढ़ विकासहेतु यह प्रयास शिक्षक और शिक्षार्थी को स्वंय ही करने होगें | उन्हें समझना होगा कि वह कॉलेज में सहपाठियों या शिक्षकों (प्रवक्ता और प्रोफेसरों) के प्रेमजाल में फँसकर अपना और कॉलेज का नाम खराब करने व चरित्रहनन तथा समय और धन की बर्बादी करने आये हैं या अपने शिक्षकों से कुछ सीखकर अपने ज्ञान और स्वंय के शोध द्वारा विश्वशांति और विश्वसेवा में अविस्कार करने आये है | तथा,
पहले हो चुके अविस्कारों को सहेजने के लिये नवीन सुरक्षा साधन बनाकर अपना और अपने कॉलेजों, गुरूओं और राष्ट्र के नाम का परचम पूरे विश्व में फैराकर एक नयी पहिचान दिलाने आये हैं |
अत:, उपरोक्त विवरण के सार स्वरूप यह कह सकते हैं कि जो कुछ बुरा और अच्छा है वह सम्बंधित सिस्टम का प्रभाव है |

न.5- उच्चशिक्षा - परिवेश में नैतिकमूल्य 

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उच्चशिक्षा का आशय यही था कि अपने स्कूल, कॉलेज से मिले ज्ञान और जिज्ञासाओं को व्यापकरूप से शोध और प्रयोगों के आधार पर कुशल प्रवक्ता के सानिध्य में उनके शोध दर्शन द्वारा शांत करना |
आज भी कुछ विश्वविद्यालयों में पूर्ण लगन और मेहनत से मर्यादित परिवेश में शोध हो रहें हैं, जहाँ के व्यवहार- आचरण, मानसिकता और परिवेश में राजनीति का आना पूरी तरह वर्जित है | पर, अफसोस! बहुत से महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों राजनीत के काले साये से नही बच सके हैं और आज कॉलेज अपराध के अड्डे बन चुके हैं | आज कॉलेजों में हल्के हँसी- मजाक की जगह भयावह रैंगिग ने ले रखी है| जहाँ रैगिंग के नाम पर अपने ही सहपाठियों का सीमातोड़ आर्थिक,शारीरिक और मानसिक रूह कंपा देने वाला शोषण होता है और जिसे पीड़ित छात्र झिझकवश किसी से भी नही कह पाते और परिणामस्वरूप फिर हतासा और शर्मिंदगी से भर कर आत्महत्या कर लेते हैं | इस रैंगिग के कारण बहुत से कॉलेज बदनाम हुये हैं पर दुख इस बात का है कि आज भी यह मनहूसप्रथा बन्द नही है | आज कॉलेजों और महाविद्यालयों के परिवेश यानि माहौल का आलम यह है कि
आज क्लासरूम के ब्लेक बोर्ड खाली पड़े हैं और कॉलेजों के वॉशरूम की दीवारें बेहद भद्दी और अमर्यादित बातों और पान मसाले-गुटखे से रंगी पड़ी हैं | तथा कॉलेजों की प्रयोगशालाओं में ताले पड़े हैं और कहीं -कहीं तो प्रयोगशालायें हैं ही नही और कहीं हैं भी तो प्रयोगों की बस औपचारिकता निभाई जा रही है | हम कह सकते हैं कि आज प्रयोग नकल करके फाइलों में लिख कर और लिखवा कर शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ने पल्ला झाड़ा हुआ है| आज सीमातोड़ अंगप्रदर्शन और हिंसा का पर्याय बन चुके भारतीय सिनेमा का दुष्प्रभाव विद्यार्थियों के कोमल मन पर इस कदर हावी है कि कॉलेज कैंटीन में प्रेम-प्रसंगों पर गम्भीर चर्चायें हो रही हैं जिनमें शिक्षक और शिक्षार्थी प्रेम सम्बंध भी बहुलता से सामिल है | आज की आधुनिकता की चकाचौंध ने गुरूओं और शिष्याओं के पवित्र सम्बंधों को भी तार-तार कर रखा है और दूसरी तरफ कॉलेजों के चर्चा व संगोष्ठी कक्ष रिक्त पड़े हैं | इससे भी ज्यादा गम्भीर बात यह है कि आज कॉलेज, जो कभी शिक्षा के मंदिर हुआ करते थे वो आज अखाड़ा बने हुये हैं और जहाँ योग-खेल-व्यायाम की शिक्षा दी जानी चाहिये वहाँ आज दंगल यानि जंग मची है और आज शिक्षा क्षेत्र में आयी इस भयावह चारित्रिक गिरावट, आज देश की भ्रष्ट राजनीत के गिरते स्तर का प्रभाव ही है कि आज कॉलेजों पर बढ़ते अनावश्यक राजनैतिक दबाव के कारण विद्यार्थी प्रतिउत्तर में छात्रसंघ के नाम पर महाविद्यालय/ विश्वविद्यालय संसदभवन का रूप ले चुके हैं | हम कह सकते हैं कि आज देश की भद्दी राजनीति के सांप ने सबसे ज्यादा किसी को डसा है तो वह है शिक्षालय और शिक्षार्थी | आज कॉलेजों में भी जातिवाद-सामप्रादायिकतावाद और वैमनस्यता का खतरनाक जहर फैल चुका है |
हम कह सकते हैं कि उच्चशिक्षा मैं आयी नैतिकमूल्यों की गिरावट को स्वच्छ और स्वस्थ्य परिवेश देकर ही ठीक किया जाता है | उसके लिये शिक्षक और शिक्षार्थियों दोनों को अपने मन- मस्तिष्क से राजनीति को बाहर करके एक-दूसरे की बात का सम्मान करते हुये सकारात्मक दिशा में पहल करनी होगी | उपरोक्त विवरण के सार में हम कह सकते हैं कि आज पूरे शहर में उतना प्रदूषण नही कि जितना एक महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में है अगर जल्द इस ओर गम्भीरता से ध्यान नही दिया गया तो परिणाम बहुत ही भयावह होगें क्योंकि सभ्य और संस्कारी शिक्षा व मर्यादित आचरण और शोध ही देश की उन्नत नींव बनाने में अहम योगदान देते हैं | 

6- साहित्यिक शिक्षा और शोध दर्शन का महत्व  :
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साहित्यिक शिक्षा पर हमारा दर्शन यह कहता है- "जब हमारे तन-मन-धन और मानसिकता में सत्य की रक्षा हेतु लोकहित में निस्वार्थ और पारदर्शीरूप से सभी के हित का समभाव जुड़ जाता है और फिर जो हमारे दैनिक क्रिया -कलापों में जीवन्त हो उठता है, उसी महान जीवन्तता को सही मायनों में साहित्य कहते हैं |
तथा, इसी महान जीवन्तता से अनुभव किये विशेष ज्ञान और सुझावों को अपने दर्शन के साथ सदवाणी और सदकर्मों द्वारा जनहित और लोकहित में सर्वव्यापकरूप से प्रसारित करने की कला को साहित्यिक शिक्षा कहते हैं | साहित्यिक शिक्षा के अनेक विधायें अथवा अंग हैं जैसे- कविता, गीत, भजन, कहानी, पटकथा, उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबंध, आलोचना, व्यंग और यात्रावृतांत आदि | हम कह सकते हैं कि समाज एक व्यवस्था है और उसी व्यवस्था के अच्छे-बुरे अनुभवों से महान साहित्य का जन्म होता है|

साहित्यिक शिक्षा का महत्व-


आज शिक्षा के क्षेत्र में साहित्यिक शिक्षा का अपना विशेष स्थान और विशेष महत्व है यही है कि.. आज के आधुनिक परिवेश में जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापनाहेतु उच्च शिक्षा में साहित्यक शिक्षा अनिवार्य एवं परमावश्यक है|
अब बात आती है शोध दर्शन की - शोध यानि एक बदलाव लाने की महान सोच और उस सोच को आकार देने के लिये अपने जीवन अनुभवों से प्राप्त दर्शन और ज्ञान के आवेगों को मस्तिष्क और कागज पर एक प्रणालीरूप में लिखा, उकेरा और गढ़ा जाता है फिर उसके आधार पर लोकहित में जो जनकल्याणकारी अविस्कार होते हैं,उसी सर्वहित भाव की उन्नत सोच को ही खोज या शोध कहते हैं|
अत:, हम कह सकते हैं कि शोध और दर्शन आपस में शक्कर और पानी के मिश्रण की तरह हैं जो एक दूसरे में घुल कर ही मीठा बनाते हैं और उस मीठे स्वाद को गृहण करने वाला ही जान सकता है |

शोधदर्शन का महत्व :
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आज शिक्षा बिना शोध और दर्शन के बड़ी ही दयनीय स्थिति में राह ताकती उम्मीदभरी नजरों से बेसहारा अनावश्यक दबाव में अंधेरे की खाई में बड़ी ही तेज गति से लुढ़कती जा रही है और अगर इसे साहित्यिक शिक्षा का प्रकाश और शोध और दर्शनरूपी मजबूत हाँथ का सहारा और साथ मिल जाये तो उच्च शिक्षा पर लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके नैतिक मूल्य पुन:स्थापित किये जा सकते है और उच्च शिक्षा की दिशा और दशा में आश्चर्यजनक उन्नत परिवर्तन आ सकते हैं और उच्चशिक्षा का स्तर सभ्य और उच्च हो सकता है| जिससे देश-दुनियाँ को और भी नयी-नयी तकनीकों और अविस्कारों से सभी के चेहरे पर मुस्कॉन बिखेरी जा सकती है तथा देश को साहित्य और विज्ञान दोनों ही क्षेत्रों में उन्नत तकनीक से युक्त सशक्त बनाया जा सकता है | हम यह कह सकते हैं कि देश को उन्नत आधुनिक संस्कारी और सशक्त और विकसित बनाने में उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है|
यहाँ हम यह कह सकते हैं कि आज अंतरिक्ष को नापती सोच वाले हमारे देश हिन्दुस्तान को केवल साक्षर विद्यार्थियों की नही बल्कि खोजी मस्तिष्क के अतृप्त प्रतिभावान शोधार्थियों की जरूरत है जिससे देश और दुनियाँ की अच्छाइयों से हम हाँथ मिला सके और युद्ध हो तो दो - दो हाँथ करने से भी पीछे ना हट सकें| बस, यही है साहित्यिक शिक्षा और शोध दर्शन का महत्व की देश का बच्चे - बच्चे के मन में उठते हर सवाल का जवाब प्रमाणसहित उसे उसके माँ-बाप, शिक्षकों और इष्ट मित्रों द्वारा सहज ही मिल सके, हम हमारे महान देश हिन्दुस्तान के ऐसे उन्नत भविष्य का सपना देखते हैं कि देश की आबादी केवल साक्षर ही ना हो बल्कि अविष्कारक हो, तब हम कह सकेगें कि हाँ हम स्वतंत्र, मुक्त, आजाद,उच्च शिक्षित और साभ्रान्त देश विश्वगुरू भारतवर्ष के देशभक्त सभ्य नागरिक है|


7- उच्च शिक्षा में दार्शनिक चिंतन की
भूमिका :

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उच्च शिक्षा में दार्शनिक चिंतन उतना ही जरूरी है जैसे कि दिये में तेल, फूूल में सुगंध और मंदिर में भगवान की मूर्ति या विग्रह क्योंकि शिक्षा ही है जो इंसान को इंसान बनने के लिये प्रेरित करती है और दर्शन ही है जो इंसान की जिज्ञासाओं को शांत करता है और एक उन्नत बदलाव की कल्पना करता है फिर सही शिक्षण के माध्यमों से उस कल्पना को मूर्त रूप दिया जाता है जिससे देश-दुनियाँ का हित होता है|
उच्च शिक्षा का मतलब ही यही है कि पीछे पढ़े हुये ज्ञान और बचपन के अनगिनित अबूझ सवालों के जवाबों की व्यापकता को प्रयोग द्वारा सिद्ध करना और समझाना | अब, इसे समझाने के लिये शिक्षक का दर्शन किस स्तर का है और शिक्षार्थी के गृहण करके कुछ और नया करने की उसके अंदर कितनी उत्कण्ठा, लालसा तथा अपने दर्शन से मेहनत करने की कितनी क्षमता है क्योंकि दोनों के दर्शन पर ही एक महान अविस्कार की बुनियाद रखी जाती है और टिकी रहती है | यही उच्च शिक्षा में दार्शनिक भूमिका को इंगित करती है कि जितना प्रभावशाली दर्शन होगा उससे ज्यादा शानदार अविष्कार होगा | आज हमारे देश के विद्धार्थी को चमत्कार के पीछे ना भागकर अविष्कार को सामने लाना होगा | हमें चमत्कारी नही अविस्कारी बनना होगा | हमें ढ़ोगीं बाबाओं के आश्रम जाकर उनके चरणों में ना बैठकर बल्कि हमें देश- दुनियाँ के वैज्ञानिकों और अविष्कारकों से मिलना चाहिये और जाकर उनकी प्रयोगशालायें देखनी चाहिये फिर स्वंय सोचना चाहिये कि अब हम और क्या नया कर सकते हैं जिससे स्वास्थ्य सेवायें अच्छी हों सकें, हमारी फसलें उन्नत बीजवाली हो सकें, हमारी नदियाँ स्वच्छ हो सकें और हमारा पर्यावरण स्वच्छ हो सके तथा आर्थिक और सामाजिक स्तर पर क्या ऐसा कर सकते हैं कि देश की बेरोजगारी और गरीबी मिट सकें तथा इससे भी बढ़ कर ऐसा क्या हम कर सकते हैं जो हमारे अपने और ज्यादा जी सकें हम श्वासें तो नहीं बना सकते पर श्वासें बढ़ा तो सकते हैं, उनकी दैनिक दिनचर्या में कुछ उनकी जरूरत के प्रयोग देकर | जरा सोचें कि हमारी दादी-नानी ने हमें बचपन में खुद ऊन से बिनकर टोपे -मोजे पहनाये थे क्या यह उनका महान दर्शन और अविस्कार नही था कि जिससे हम शर्दी की मार से बच सके | अब हमारा समय है कि उच्च शिक्षित होकर हम हमारे दर्शन की आँखों से क्या कल्पनायें गढ़े और उन्हें शोध के माध्यम से अविस्कृत करें जिनसे हम हमारेअपनों के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व के अपनों के चेहरे पर मुस्कॉन बन बिखर उठें| यह सब यथार्थ में तब सार्थक होता है जब हम हमारी शिक्षा में दर्शन को मिला देते हैं | उच्च शिक्षा पाने वाला विद्घार्थी जब तक एक शोधार्थी मानसिकता से रखने वाला नही होगा तब तक उच्चशिक्षा भी खोखली सिद्ध होगी और हम ज्ञान लेकर नही बल्कि डिग्री का एक कागज का टुकड़ा लेकर ही लौटेगें जिसका ज्ञान और अविस्कार जगत में कोई मूल्य नही | हम कह सकते है कि उच्च शिक्षा में दार्शनिक चिंतन का आवेग शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों के मन -मस्तिष्क में उठना चाहिये क्योंकि किसी एक की उदासीनता किसी भी प्रयोग के लिये निष्फल ही सिद्ध
होगी |

न.8- आज की राजनैतिक शिक्षा में दार्शनिक चिंतन की अपेक्षा  : ..............................



सर्वप्रथम हम यही कहेगें कि वर्तमान परिवेश में देश की राजनीति हैवानियत को जन्म दे रही है और अपराध और अन्याय का पोषण कर रही है | आज राजनीति में पद पाने के लिये गला काट जंग मची हुई है| राजनीति वो अमरबेल है जो हरे-भरे बृक्ष को वजन, वजूद यहाँ तक की सबूत भी मिटा देती है | सच कहूँ तो
राजनीतिक व्यवस्था हमारे पूर्वजों जनहित में स्थापित की थी पर बड़े सीधे शब्दों में यही कहूँगी कि आज की राजनीतिक व्यवस्था मानकहीन, अनुमानित, जुगाड़ी एवं कबाड़ी व्यवस्था हो चुकी है जिससे हर व्यक्ति दुखी और तृष्त है | अत:, राजनीति का दर्शन यह कहता है कि जरूरत और समयानुसार, राजनीति देश में विभाजन एवं विनाश की अथवा संगठन एवं विकास की नीति लागू करती है | हम आज के तुष्टीकरण के राजनैतिक परिवेश में शिक्षा और दार्शनिक चिंतन की कोई अपेक्षा नही कर सकते | क्योंकि जिस नाली के पास बैठकर भोजन नही किया जा सकता ठीक उसी प्रकार राजनीति के प्रदूषित भय के माहौल में कोई दर्शन चिंतन कारगर नही हो सकता | क्योंकि राजनीति शासन की व्यवस्था है अनुशासन की नही और बिना अनुशासन के शिक्षा में गुणवत्ता सम्भव ही नही है |


न- 9 - मानव सफलता में दर्शन और नैतिक मूल्यों की भूमिका  : ...........................


आज कुछ सभ्य और नैतिक व्यक्तियों ने अपने साहित्य, शोध और दर्शन के आधार पर मजबूत इच्छाशक्ति और उन्नत सोच के साथ अंतरिक्ष में दस्तक दी है और आज उनके कदमों की आहटें अंतरिक्ष में गूंज रहीं हैं | हम यह कह सकते हैं कि सभ्य और उन्नत विचारधारा ने ही आज इंसान को इंसान की असीम क्षमताओं से रूबरू करा दिया है |
मानव को प्रत्येक क्षेत्र जैसे- शिक्षा तथा अनुसंधान, कृषि और स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में तथा इंसान की दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं पर खरा उतरने में बहुत कामयाबी हासिल की है | मानव की इन महान सफलताओं में उसकी सुलझी समानभावयुक्त मानसिकता और स्वभाव, कर्म व प्रयोगों में नैतिक गुणमूल्यों की ही झलक मिलती है | कोई भी मानव किसी भी क्षेत्र में अगर सेनाभाव से कार्य कर रहा है तो वह स्वंय में सफल है | मानव ने जिस भी क्षेत्र में रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की है वह उसने बेहद लगन और मेहनत से अपने प्रतिभाबल से मजबूत इच्क्षाशक्ति के बलबूते क्रमबद्ध और सही तरीके से हासिल की है क्योंकि जुगाड़ प्रणाली किसी भी मुद्दे का हल नही है और जुगाड़ से जुगाड़ ही होगा कोई महान अविष्कार नही क्योंकि अविस्कारक नैतिक, कार्यकुशल और लोककुशलता की सोच रखने वाला महान भविष्यद्रष्टा दार्शनिक होता है और यही स्वभाव उसे औरों से खास बनाता है | अत:, आज की अतिआधुनिकता और पाश्चातवाद को देखते हुये हमें हमारे आर्ट, सांइस और संगीत आदि सभी पाठ्यक्रमों में नैतिक मूल्यों और दर्शन को बतौर विषय अनिवार्य और परमावश्यकरूप से जोड़ देना चाहिये क्योंकि विद्धार्थी एक महान शोधार्थी बनकर विश्वशांति प्रयोगों में अपनी मजबूत और प्रभावशाली उपस्थति अपनी प्रतिभाबल पर दर्ज करा कर अपने गाँव, समाज और राष्ट्र का नाम ऊँचा कर सकें | अत:, हम यह कह सकते हैं कि मानव की सफलता मानव होने में है क्योंकि मानव वही जिसमें सम्पूर्ण प्राणी जगत के प्रति मानवता
हो |

निष्कर्ष

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देश की वर्तमान व्यवस्था को जनकल्याणहेतु परिवर्तित किया जाना महत्वपूर्ण, अनिवार्य एवं परमावश्यक है जिससे कि उच्चशिक्षा में नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्यों को समाहित किया जा सके | इस वास्ते अनुशासित उच्च शिक्षार्थियों को नैतिक दर्शन एवं नैतिक गुणमूल्यों पर लोककल्याणहेतु पुनर्खोज करनी चाहिये |

संदर्भ सूची

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पुस्तक का नाम - 'इन पुस्तकों से लिये गये कुछ तथ्य सन् इत्यादि '
भारत में शिक्षा व्यवस्था का विकास पेज संख्या- 477 पुस्तक लेखक- सुरेश भटनागर
पुस्तक का नाम- उदीयमान भारतीय समाज में शिक्षक पेज संख्या- 128 लेखक- एन.आर.स्वरूप सक्सेना
वेवसाइट - oshoworld.com

...........धन्यवाद..........
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