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रक्षाबंधन महापर्व पर विशेष -




  ''रक्षाबंधन'' महापर्व पर विशेष - 

यूँ तो अनेकों सभ्यताएं और संस्कृति को समेटे अपने खूबसूरत देश भारतवर्ष में अनेकों त्यौहार बहुत धूमधाम से बनाये जाते हैं जिनमें भाई बहन के पवित्र सम्बन्ध की पवित्रता को निखारने व स्थायित्व को बनाये रखने और समाज को पावन प्रेम और रक्षा सूत्र में पिरोने का महापर्व है।



     इस बार रक्षाबंधन महापर्व सम्पूर्ण भारत में 26 अगस्त को मनाया जाएगा। रक्षाबंधन के दिन एक शुभ संयोग बनने जा रहा है। दरअसल, चार साल में पहली बार राखी के दिन भद्रा के साये और  ग्रहण से भी मुक्त रहेगा। भद्रा दिन की शुरुआत में ही समाप्त होने से राजयोग बना रहेगा। राजयोग में राखी बांधना काफी शुभ माना जाता है।



         रक्षाबंधन दो शब्दों को मिलाकर बना है रक्षा और बंधन जिसका अर्थ होता है रक्षा सूत्र। कहते हैं यह त्योहार तब से शुरू हुआ था जब असुर बलि ने भगवान विष्णु से उसके साथ रहने का वचन लिया था। जब बलि ने अपनी ताकत से तीनों लोकों को जीत लिया था तब घबरा कर इंद्रदेव ने विष्णु जी से मदद मांगी थी। तब विष्णु जी वामन अवतार में बलि के पास पहुंचे और उससे दान में तीन पग भूमि मांगी। बलि बहुत ही दयावान था इसलिए उसने फ़ौरन हां कर दिया। तब विष्णु जी ने अपना आकार बढ़ाकर तीन पग में धरती, आकाश और पाताल नाप लिया किंतु इसके बदले में बलि ने विष्णु जी को अपने साथ रहने का वचन मांग लिया। जब लक्ष्मी जी को यह पता चला तब वे बहुत चिंतित हो उठीं और अपने पति को वापस लाने के लिए उपाय सोचने लगी।




 तब माता लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर राखी बांध कर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में माता ने बलि से विष्णु जी को उसके वचन से मुक्त करने के लिए कहा और भगवान को बैकुंठ वापस भेजने के लिए कहा। तब से राखी की यह परंपरा शरू हुई। 




इस दिन सभी बहने अपने भाईयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनसे अपनी रक्षा का वचन लेती हैं। और कहते हैं कि हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ काम बिना मंत्रोच्चार से पूर्ण नहीं होता। इसलिए रक्षाबंधन के पावनपर्व पर यह मंत्र उच्चारित करते हुये राखी बांधने की परम्परा है -



येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’ इस मंत्र का अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि ने रक्षासूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया। उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो और दृढ़ बना रहे।                     


       इसके अलावा  एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक, रक्षाबंधन समुद्र के देवता वरूण की पूजा करने के लिए भी मनाया जाता है. आमतौर पर मछुआरें वरूण देवता को नारियल का प्रसाद और राखी अर्पित करके ये त्योहार मनाते है। इस त्योहार को नारियल पूर्णिमा भी कहा जाता है।



         ये भी ग्रंथों में वर्णित है कि है कि महाभारत की लड़ाई से पहले श्री कृष्ण ने राजा शिशुपाल के खिलाफ सुदर्शन चक्र उठाया था, उसी दौरान उनके हाथ में चोट लग गई और खून बहने लगा तभी द्रोपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू धजीर से भगवान् श्री कृष्ण जी के हाथ पर बांध दिया था। इससे प्रसन्न होकर भगवान् श्री कृष्ण जी ने द्रोपदी को बहन मान कर भविष्य में आने वाली हर मुसीबत में रक्षा करने की कसम दी थी।



     एक एतिहासिक घटना के मुताबिक एलेक्जेंडर जब पंजाब के राजा पुरुषोत्तम से हार गया था तब अपने पति की रक्षा हेेतु  एलेक्जेंडर की पत्नी रूख्साना ने रक्षाबंधन के त्योहार पर  राजा पुरुषोत्तम को राखी बांधी और उन्होंने भी रूख्साना को बहन के रुप में स्वीकार कर रक्षा का वचन दिया था।  



इतिहास गवाह है कि चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने सम्राट हुमायूं को राखी भिजवाते हुए बहादुर शाह से रक्षा की मांग की थी जो उनका राज्य हड़प रहा था। अलग धर्म होने के बावजूद भी हुमायूं ने रानी कर्णावती को बहन मानकर उन्हें रक्षा का वचन दिया।
        रक्षाबन्धन की पूजा में भुजरियाा का भी विशेष महत्व है। भुजरिया/भोजली से अटूट प्रेम और दोस्ती  की ऐसी ही अनूठी प्रथा है उत्तर प्रदेश व छत्तीसगढ़ में, जहां रक्षाबन्धन केे दिन शाम के समय उल्लास देखते ही बनता है।


 इसकी शुरुआत सावन के महीने की नवमी को मिट्टी के टूटे मटके या कुल्हड़ व टोकरियों में मिट्टी डालकर प्रमुखता जौ /गेहूँ  बोए जाते हैं। एक हफ्ते में ही भुजरिया/ भोजली यानि जौ आदि की पौध थोड़ी बड़ी हो जाती है और सावन की पूर्णिमा तक इनमें ४ से ६ इंच तक के पौधे निकल आते हैं।इसे ही भुजरिया या भोजली कहते हैं।


रक्षाबन्धन के शाम के समय दिन बालक बालिकाएं  भोजली लेकर जलाशय पर ले जाकर उसकी पूजा अर्चना के बाद  उसे विसर्जित कर देते हैं और भुजरिया  को तोड़ कर रास्ते में मिलने जुलने वाले व सभी पड़ोसियों को बांट कर गलेे मिलकर  सुख दुख में साथ देनेे वाली अटूट दोस्ती का वचन देतेे हैं। यही भुजरिया बच्चे अपने माता-पिता, बहनें अपने बड़े भाईयों को भी देकर आशीर्वाद लेती हैं। 



रक्षाबंधन पर मेंहदी लगाने व श्रृंगार करने की भी परंपरा है। इस त्योहार पर बहने नये कपड़े व साफ कपड़े पहन कर पूरे श्रंगार के साथ मेंहदी लगे हाथों से अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं। 




      आज ही के दिन पूरे देश की रक्षा करने वाले भारतीय सेना के वीर जवानों की रक्षा के लिए सम्पूर्ण भारत की बहनें भगवान् से प्रार्थना करतीं हैं और उन्हें राखी बांधती भी है और भेजती भी हैं।




 गौरतलब हो कि भारतीय सेना के वीर जवानों के सम्मान और रक्षा की कामना से भारत के तमाम स्कूलों कॉलेजों व स्वंयसेवी, राजनैतिक संगठनों की बहने उन्हें प्रतिवर्ष भारी संख्या में रक्षासूत्र भेजती हैं।इसीलिए यह रक्षाबंधन महापर्व पावन प्रेम और सौहार्द का पर्व है। हमें लगता है कि सभी त्योहारों के बहाने हम हमारे अपनों और पड़ोसियों से भी मिलने का समय निकाल पाते हैं। कम से कम त्यौहार का बहाना ही सही पर समाज और देश में चहुँ ओर सुख, शांति और समृद्धि के खुशनुमा उजाले सभी के जीवन को सुन्दर और सफल बना दें क्यों जहां प्रेम, सम्मान लगाव, अपनापन और सहयोग की भावना है तो हर दिन त्योहार है।

-ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

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