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दूर्वा का श्रृंगार _ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना




हम सब एक दूसरे को कहते हैं सुप्रभात, क्या हमने जाना कि आखिर! यह सुप्रभात का सु यानि शुभ यानि श यानि श्रृंगार है क्या? जब रात की ओस से कोमल दूर्वा के सजते हैं शुभ्र-पारदर्शी गहने से अनुरागित मन मयूर हो आत्ममुग्धता में रमण करने लगता है तभी सुबह की पहली किरण में वह बूँद हीरे की भांति हो उठती है और अगले पल ही एक बैरी हवा का झोंका उस मासूम दूर्वा का सब श्रृंगार छीन कर मिट्टी व हवा में मिला घोलमोल देता है, शायद इसलिये कि हे! दूर्वा इस बूंद को तुमने शाश्वत /अमर समझने की भूल कैसे कर दी। तो दूर्वा कहती है कि हर आहट पर मैं इकहरी काया कैसे अपना श्रृंगार सहेजती हूँ, यह मैं ही जानती हूँ....तुम अब मुझ घास के एक पल के श्रगांर की खुशी को भी ग़र अहंकार से तौला जाता है तो फिर कह दो उस मालिक से कि वह प्रेम की बूंदों को धरती पर बरसने से रोक लें। वह हर जीव के अंदर से प्रेम और खुशी को सोख लें। वो छीन लें धरती से रंग और सुगंध... क्योंकि जब तक आनंदित मन और अंहकारी मन की तुम समीक्षा न कर सको तब तक तुम मुझ दूर्वा को अंहकारी कहना छोड़ दो। हाँ! मुझे अंहकार है तो इस बात का कि मुझे भगवान श्री गणेश का सानिध्य प्राप्त है। हाँ मैं घास हूं । मुझे गर्व है अपने एक पल के श्रंगार पर जो श्रृंगार मैं अस्तित्व के संरक्षक सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए करती हूँ।


_ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

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