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अश्लीलता पर हो वज्र प्रहार

 

_आकांक्षा सक्सेना, न्यूज एडीटर 


अश्लीलता से उपजी मानसिक विचारधारा वह गम्भीर बीमारी है कि जिसकी शुरूआत में ही बलात्कार है और परिणाम में कारावास। यानि अश्लीलता वो राक्षसी है जो देश के युवाओं के जीवन को लतखोर बनाकर निगलती चली जा रही है और किसी को भनक तक नही। एक वो समय था जब श्री लक्ष्मण जी कह रहे थे कि भैया! यह आभूषण में क्या पहचानूं जब मैंने माता सीता के चरणों की ही वंदना की है। चरणों के ऊपर तो इतनी गौर से देखा ही नही। पर आज कलयुग में यह कैसा चारित्रिक पतन हुआ है कि हर रिश्ता अश्लीलता की भेंट चढ़ चुका है। अश्लील वेवसाईट पर खुले आम पवित्र रिश्तों की धज्जियाँ उड़ायीं जा रही हैं और हम सब खामोश हैं। अश्लील वीडियो पर बिल्कुल साफ हैडिंग होते हैं ससुर - बहू, देवर-भाभी, पिता-पुत्री, बहन-भाई, गुरू - शिष्या, विधवा और उसका बेटा, इस तरह के कंटेंट देखकर बच्चों में युवाओं में क्या संदेश जाता होगा? कि हर रिश्ते से शारीरिक सम्बंध बनाये जा सकते हैं क्योंकि वीडियो में देखा। टीवी सीरियल में देखो भाई - भाई को गोली मार दे रहा, देवरानी, जेठानी का, सास-बहू झगड़े, हत्या । क्या भारतीय संस्कृति में ऐसा था सोचिए! रामायण में चारों भाईयों का चरित्र ऐसा था कि बड़ा भाई भगवान समान। सीता माता की सब बहनें देवरानी में अनंत प्रेम, सास बहू में कोई झगड़ा नही । फिर यह हमारी महान संस्कृति के पतन का षडयंत्र कौन रच रहा है? कौन हैं जो देश की युवा पीढ़ी का मानसिक संहार करके करोड़ों कमा रहा है? आखिर! यह अश्लीलता का कितना बड़ा बाजार है और कौन है इसका मास्टर माईंड? क्या यह भयंकर घोटाला नहीं। 

एक अजीब सा जमाना है जब फटे कपड़े को फैशन कहा जा रहा हैं। आज अमीर और सेलेब्रिटी उसे माना जाता है जो अर्द्धनग्न है। अर्द्धनग्नता की बात ही क्या एक सैलीब्रिटी पुरूष तो पूर्ण नग्न ही लेटे हुए सुर्खियों में थे। क्या नंगे लोगों को सैलीब्रिटी माना जायेगा अब या ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। आज के सिनेमा का पर्यावाची ही अश्लीलता बन चुका है। जोकि आने वाली पीढ़ियों के पतन के लिये किसी मिसाइल और एटम बम से कम नहीं है। आज किसी का कैरियर चौपट करना हो या पथभ्रष्ट उसके लिए अश्लीलता श्रेष्ठ हथियार बन चुका है। आप सभी देखो! कि इंटरनेट के माध्यम से आज पूरी सोसल मीडिया पर वेवसाईट, बेवसीरीज, विज्ञापन आदि के द्वारा किस लेवल पर अश्लीलता परोसी जा रही है यह बात सरकार क्या  न्यायालय भी जानता है परन्तु उनकी दलील यह है कि अदालतें आदेशों के माध्यम से यह सुनिश्चित नहीं कर सकती हैं कि आदर्श व्यक्तियों का एक आदर्श समाज लाया जा सकता है, हालांकि, कानून और नियमों की योजना को उचित रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए कि किसी भी देश वासी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो बस। सन् 2018 की बात है जब दिल्ली उच्च न्यायालय में  द वायरल फीवर (टीवीएफ) द्वारा निर्मित वेब श्रृंखला 'कॉलेज रोमांस' मामले की सुनवाई कर रहा था कि इसमें इस्तेमाल की जाने वाली भाषा "अपवित्र", "अश्लील" है और इसमें कई प्लेटफार्मों पर उपलब्ध शो देखने वाले युवा दिमागों को "भ्रष्ट" करने की क्षमता है। बिना किसी अस्वीकरण के। यानि भारतीय मूल्यों' के अनुसार 'अश्लीलता' पर न्यायालय के विचार ऑनलाइन सामग्री के आने वाले केंद्रीकृत विनियमन के बारे में चिंताओं को बढ़ाते हैं। तथा मुद्दा सितंबर 2018 में यूट्यूब पर प्रकाशित शो के सीजन 01 के शीर्षक 'हैप्पीली फकड अप' के एपिसोड 05 के बारे में था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि एपिसोड में और फिर पूरी श्रृंखला में इस्तेमाल की गई भाषा "अश्लील" और "अभद्र" थी। और महिलाओं को "अशोभनीय रूप" में चित्रित किया। शिकायतकर्ता ने कहा, यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 292 और 294, सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी अधिनियम) की धारा 67 और 67ए और धारा 2 (सी), 3 का उल्लंघन था। जो ओटीटी प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, टीवीएफ वेब पोर्टल और अन्य एप्लिकेशन पर देखने के लिए उपलब्ध थी। बता दें कि इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली अश्लील वेबसाइटों के बारे में सरकार ने शुरूआत में शिकंजा कसा था और 857 अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन फिर उसने सिर्फ बच्चों की अश्लील वेबसाइटों पर अपने प्रतिबंध को सीमित कर दिया। 

अब इन्हें कौन बताये कि अश्लीलता सिर्फ़ अश्लीलता है जिसमें क्या बच्चे और क्या बूढ़े, सब अक्षम्य हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि उन टीवी चैनलों पर जो डिबेट के लिए मशहूर है परन्तु दु:खी हूँ यह सोचकर कि इन पर कभी भी अश्लीलता की सुनामी जो आयी हुई है जोकि सबसे बड़ी महामारी है । आखिर! इस पर इन मान-मर्यादा के मुद्दे पर डिबेट किंग क्यों मुंह चुराते हैं। यहां तक कि देश में संस्कृति और नैतिकतावादी, मर्यादावादी, हिजाबवादी झंडा बुलंद करने वाले तथाकथित दल संस्थाओं की चुप्पी भी कमाल की है। सभी साधु,मौलवियों, ग्रंथियों और पादरियों का मौन भी चौकाने वाला है। शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि इन्हें पता ही न हो कि इंटरनेट पोर्नोग्राफी क्या होती है?या यह युवा विरोधी कितना बड़ा षड्यंत्र है? यह तो इंदौर के वकील कमलेश वासवानी थे कि उन्होंने इस मामले को अदालत में लाकर अश्लील वेबसाइटों के सिर पर तलवार लटका दी थी।

सरकार को अब इस मुद्दे पर सख्त होना होगा और मोदी सरकार हमेशा चैलेंजिंग काम के लिए फेमस रही है तो क्या मोदी सरकार भारत में इस जबरन परोसी जा रही अश्लीलता को बेन कर देश के छोटे-छोटे बच्चों की मासूमियत की रक्षा कर सकेगी। क्योंकि आज हर छोटे बच्चे के हाथ में मोबाईल है, इंटरनेट है और गंदे विज्ञापन कहीं भी दिख सकते हैं और बच्चों के एक क्लिक से उसकी पढाई में तगड़ा व्यवधान आ सकता है यहां तक देखा गया है कि जो इस गंदगी को देख लेता है वह उसे खुद से करने का विचार करने लगता है और फिर शिकार होती है एक निर्दोष "बच्ची"।

किसी भी देश के निर्माण में वहां के बाल मन का अहम योगदान होता है। बाल मन में जैसे संस्कार भर दिए जाते हैं, वे ही प्रौढ़ावस्था तक उस व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित करते हैं। बच्चों का मन एक बीज है और बाद में बबूल के बीज में से आम की कल्पना व्यर्थ होगा। जोकि जबरन अश्लीलता परोस कर देश की पीढ़ियों को बबूल बनाने का वैश्विक षड्यंत्र जारी है। पहले मैगी षड्यंत्र के तहत बच्चों से मजबूत श्री अन्न से बना नाश्ता छीन कर उनसे स्वास्थ्य छीना, इम्यूनिटी कमजोर की। वहीं, अब उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रहार जारी है। जिस तरह पीएम मोदी ने मोटा अनाज यानि श्री अन्न सत्तू आदि का दौर बच्चों में वापस लौटाया है। ठीक वैसे ही अश्लीलता नामक बम पर वज्र प्रहार कर हमें हमारा मर्यादित भारत वापस लौटा दीजिए। 

अब भारत को इस अश्लीलता से आजादी चाहिये। विचारणीय है  कि अपनी प्राचीन सनातन संस्कृति में विद्यार्थियों का प्रथम लक्षण ब्रह्मचर्य को सर्वोपरि बताया गया है। जिस तरह बाढ़ आने पर नदी अपनी सीमाएं भूलकर तटबंध तोड़कर हर चीज़ को नुकसान पहुंचाने लगती है, ठीक वैसे ही अश्लीलता की सुनामी बाल मन, युवा मन, प्रौढ़  मन हर उम्र पर दुष्प्रभाव डालती है। सामाजिक रिश्ते - नातों के तटबंध तोड़कर उसकी मनोवृत्ति अपराधिक हो जाती है। आज अपराध का मूल कारण ही यह अवांछित स्वच्छंदता की पराकाष्ठा यही अश्लीलता है। 

आखिर! यह मुद्दे देश की संसद में क्यों नही उठाये जाते? इन मुद्दों पर क्यों नहीं होती हड़ताल? क्यों नहीं होते अनसन धरने? इन मुद्दों पर क्यूं नहीं लड़े जाते चुनाव? आखिर! चुनावी घोषणा पत्र में यह मुद्दे क्यों गायब रखे जाते हैं? बच्चियाँ तो हर घर में हैं फिर भी ऐसा क्यों? "अश्लीलता बेन" नाम पर क्यों नही सजते बड़े मंच? भाषण? कवि सम्मेलन? संगोष्ठी? अब इस चुप्पी को मैं क्या नाम दूं? सरकारों और न्यायालय की अजीब सोच है कि सिर्फ बाल-अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध को अदालत और सरकार दोनों ही उचित ठहरातीं हैं? उनका कहना है कि इसके लिए बच्चों को मजबूर किया जाता है। वह हिंसा है परन्तु क्या वयस्क वेबसाइटें औरतों पर जुल्म नहीं करतीं? औरतों के साथ जितनी क्रूरता से उनका शोषण, वीभत्स और घृणित बर्ताव इन वेबसाइटों पर होता है, क्या वह अश्लील नही अमानवीयता नहीं /प्रताड़ना नहीं है? महिला - पुरुष भी स्वेच्छा या प्रसन्नता से नहीं, पैसों के लिए अपना ईमान बेचते होगें। अपने मालिक के कहने पर वीडियो के हैंडिग रिश्तों को बदनाम के पेंट से पोतते होगें। 

उन सब स्त्री-पुरुषों की मजबूरी, क्या उन बच्चों की मजबूरी से कम है? कोई यह बताये कि इन चैनलों को देखने से आप बच्चों को कैसे रोकेंगे? इन गंदे चैनलों के लिए काम करने वाले बच्चों की संख्या कितनी होगी?लगभग कुछ हजार? लेकिन इन्हें देखने वाले बच्चों की संख्या करोड़ों में है। हे! देश के सभी माननीय लोगों क्या आप सब को भारत को युवा देश कहे जाने वाले मासूम बच्चों /युवाओं की गम्भीरता से चिंता है या नहीं? सारे अश्लील वेबसाइटों पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन पैसे की खदान है। इतिहास में झांके तो रोमन साम्राज्य के शासकों ने अपनी जनता को भ्रमित करने लिए हिंसक मनोरंजन के अनेकों साधन खड़े किये थे। पश्चिम के भौतिकवादी राष्ट्रों ने अपनी जनता को अश्लीलता की लगभग पूर्ण स्वतंत्रता इसीलिए दी है कि वे लोग इसी में समय बर्बाद करें और सरकार पर उनका ध्यान कम जाये लेकिन इसके भयावह दुष्परिणाम भी सामने हैं। हिंसा और दुष्कर्म के जितने अपराधी अमेरिकी जेलों में बंद हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं। हास्यास्पद बात जो लीडर अक्सर कहते हैं कि सरकार का काम लोगों के शयन-कक्षों में ताक-झांक करना नहीं है। तो क्या अपने शयन-कक्ष में आप हत्या या आत्महत्या कर सकते हैं? क्या किसी का बलात्कार कर सकते हैं? क्या ड्रग्स ले सकते हैं? अरे! भई ताक-झांक का सवाल ही नही होगा। जब सम्पूर्ण भारत में अश्लील वेबसाइटों पर पूर्ण प्रतिबंध होगा। 

यह अश्लीलता मनोरंजन नहीं, मनोभंजक है। यही हमारे देश में हो रहे बलात्कार को बढ़ा रही है।इस संबंध में गूगल के आंकड़े बेहद चौकाने वाले हैं। गूगल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कीवर्ड 'रेप' (बलात्कार) को एक महीने में औसतन 40,10,000 बार ढूंढा गया। इसके अतिरिक्त इंडियन गर्ल्स रेप्ड, रेपिंग वीडियो/ स्टोरीज, रेप इन पब्लिक, लिटिल गर्ल रेप्ड, जैसे शब्द शामिल थे। ये आंकड़े  सिर्फ गूगल सर्च का हिसाब हैं। अभी इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जो मोबाइल की दुकान या साइबर कैफे में जाकर चिप में यह गंदगी लेते हैं। कड़वा सच है कि लोग अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस अनैतिक मनोरंजन पर धुआंधार खर्च कर रहे हैं। भारत में लगभग सबके पास स्मार्टफोन हैं। अब सोचिए, स्थिति कितनी और कहां तक जटिल हो चुकी है।  वैसे इसी को ध्यान में रखते हुए इसी मार्च में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है कि क्रिएटिविटी के नाम पर अश्लीलता और अभद्र भाषा का इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील कंटेंट बढ़ने की शिकायतों को लेकर सरकार गंभीर है। अगर इस बारे में नियमों कोई बदलाव करने की जरूरत पड़ी तो उनका मंत्रालय इससे पीछे नहीं हटेगा। अश्लीलता, गाली-गलौज रोकने के लिए हम सख्त कार्रवाई करेंगे। मोदी सरकार इस मुद्दे पर गम्भीर है यह अनुराग ठाकुर जी के बयान से साफ जाहिर है। पर अब हम सबको पूरे देश को मिलकर अपना भी योगदान देना होगा। अभी तो स्थिति कुछ ऐसी बन चुकी है कि पहले घर बनायें या पहले घर को बचाएं? तथाकथित मॉडर्न लोग बहस करते हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, वो खुलेआम कुछ भी करें, हम कुछ भी पहनें आप अपनी नजरों और सोच पर काबू करें, यह क्रिएटिविटी आजादी है। तो फिर आप लोग पशुओं की तरह सड़कों पर ही शुरू हो जाया करो। आखिर! किस चीज की आजादी चाहिये? पशु बनने की। सच कहें तो इसमें इन लोगों की गल्ती नहीं बल्कि इनके उत्प्रेरक गुरू की है। यानि उत्तेजना फैलाने वाला विज्ञापन उद्योग गुरू जिसके यह चेलें हैं। विज्ञापनों में उत्तेजित करते दृश्य धीरे-धीरे कब मानसिक विकृति पैदा कर देते हैं, हमको पता भी नहीं चलता। आप फिल्म के तथाकथित हीरो हीरोइन को देखें तो अश्लीलता की पराकाष्ठा में गोते खाते सिगरेट शराब, ड्रग्स लेते फिल्मों में दिखाये जा रहे हैं। जब बच्चे यह फिल्में देखते हैं तो उन्हें यह सब करने का मन करता है और वह कर बैठते हैं जिसे कहते हैं अपराध। फिर जेल हुई तो पूरा जीवन बर्बाद। आज युवाओं में फैशन है कि खुश हैं तो बोतल, दु:खी हैं तो बोतल। और, जब-जब शराबबंदी पर रोक की बात उठती है, तब-तब शराब सिंडिकेट इतना शक्तिशाली बन जाता है कि क्या ही कहें। कुछ बिकाऊ अर्थशास्त्री शराबबंदी के द्वारा होने वाली राजस्व हानि की छाती पीटनी शुरू कर देते हैं। परन्तु मोदी सरकार ने शराब मामले में जिस तरह दिल्ली के मंत्री मनीष सिसोदिया को जेल भेजा है। इसने लोगों को प्रभावित किया है खासतौर पर महिलाओं को। तथा बिहार के सीएम नीतीश कुमार जी भी शराब मुद्दे पर सख्त हैं । यह अच्छी बात है। 

आप सोच रहे होगें कि अश्लीलता पर लोग कितने आजाद हैं कि सोसल मीडिया पर कुछ भी अपलोड करो कोई डर नही। तो ऐसी बात नही भारत में कानूनी नजरिए से अश्लीलता एक गम्भीर अपराध है और इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293 और 294 के तहत सजा का प्रावधान है। अश्लीलता के मामलों से जुड़ी एक धारा 509 भी है। अगर कोई व्यक्ति महिला की शील या लज्जा भंग करने वाली चीज दिखाता या बोलता है तो उसके खिलाफ इस धारा के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें 3 साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। तथा अगर कोई व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक माध्यम यानि सोशल मीडिया के जरिए कामुक या कामुकता को बढ़ावा देने वाला कंटेट को प्रकाशित या प्रसारित करता है तो उसके खिलाफ आईटी एक्ट 67(ए) के तहत कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में दोषी पाए जाने पर 5 साल की जेल और 10 लाख रुपये जुर्माना देने का प्रावधान है। दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 7 साल की सजा और 10 लाख रुपये जुर्माना देना पड़ा सकता है।अब महत्वपूर्ण बात यह है कि अपराधों को सिर्फ कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता क्योंकि भारतीय न्याय प्रक्रिया में एक प्रचलित डायलॉग है। भारत में विधि का शासन है, न्याय का नहीं। उस घटना को अपराध माना जाएगा जिसको विधि में अपराध माना गया है। इस प्रक्रिया में न्याय हुआ है या नहीं, इस पर विधि मौन है। शायद इसलिए ही गुनाह को प्रेरित करने वाले तत्वों पर कोई खास कार्रवाई नहीं हो पाती। न्यायालय यह भी कहता है कि हर संत का अतीत है और हर पापी का भविष्य। अब पापियों के भविष्य की चिंता गहरी होगी तो अश्लीलता की मीनारें कैसे ढ़हेगीं? विचारें माननीय। ऐसे में यदि गुनाह के तत्वों को हम पूर्व में ही नियंत्रित कर लें तो महिलाओं के प्रति अपराधों पर लगाम लग सकती है। देश में कितनी ही अश्लील किताबों का प्रकाशन होता है जिन्हें सेलेक्टिड लोग ही पढ़ पाते हैं परन्तु अश्लील वेबसाइटें तो करोड़ों लोग देखते हैं। आपको विचार करना चाहिए। जब हम अश्लीलता पर बेन की बात करते हैं तो तथाकथित लोग कुतर्त के साथ लड़ने पर उतारू हो जाते हैं और कहते हैं कि फिर खजुराहो और कोणार्क की प्रतिमाओं तथा महर्षि वात्स्यायन के कामसूत्र क्या है? उन लोगों की सोच पर मुझे दया आती कि उस जमाने में टीवी इंटरनेट नहीं था.. कुछ ही लोग खजुराहो पहुंच पाते होगें। आज तो हर बच्चे के हाथ में मोबाईल है आप इस चीज की गम्भीरता को को समझें कि वह सिर्फ़ बुत मूर्ति और यह चलते फिरते दृश्य वीडियो, आपको मौके की नजाकत समझ आ रही है? या मूर्ति की तुलना रिश्तों को तार-तार करते गंदी वीडियो से करेगें? वात्स्यायन ने कामसूत्र में क्रूरता नहीं, सर्वसुलभता नहीं थोपी गयी, पवित्र रिश्तों को काम अग्नि में नहीं झौंकता दिखाया गया? काम के प्रति भारत का रवैया बहुत खुला हुआ है। और, उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का अंग बनाता है। वह काम का उदात्तीकरण करता है जबकि ये अश्लील वेबसाइटें काम को घृणित, क्रूरता से परिपूर्ण यांत्रिक और विकृत और समस्त रिश्तों बाप - बेटी, गुरु-शिष्या, ससुर-बहू, मां-बेटे, देवर-भाभी, मालिक-नौकर, मानव-पशु, पुरूष - पुरूष, महिला - महिला क्या कोई भी रिश्ता छोड़ा है इन पॉर्न वेवसाईट ने। सबकुछ वासना की आग में खाक कर डाला। आज हर रिश्ते से लोगों का भरोसा उठ चुका है। कोई अपनी पांच साल की बच्ची भी किसी को गोद में खिलाने को देने से डरता कि कहीं कोई अपना ही दरिंदगी की हद पार करके पांच साल की बच्ची का रेप न कर दे। कलयुग को कलयुग हम इंसानों ने ही बनाया है कि आज 80 साल की बुजुर्ग महिला से भी दरिंदे रेप कर के मार के छोड़ जाते हैं । आप सब सोचो! कैसे हाल ही के दिनों में देश की बच्चियों के बलात्कार हुए, कैसे देश की बच्चियों के शरीर के टुकड़े किये गये, कैसे फ्रिज में रखे गए? आप इनका केन्द्र देखो क्या है? वह केन्द्र है अश्लील साईट के दुष्प्रभाव। आज समाज की दुर्दशा मानसिक सोच इस कदर विकृत हो चुकी है कि तथाकथित कोई लड़का बाहर नौकरी पर जाता है तो बहू को बुजुर्ग पिता की सेवा के लिए भी नहीं छोड़ना चाहता। कोई भी भाभी, देवर के साथ अकेले घर में रूकने से डरती है। छोटी बच्चियां चाचा, मामा के साथ खेलने से असुरक्षित महसूस की जाती हैं। मैं सबकी बात नहीं कर रही पर ज्यादातर । यह दौर ही ऐसा है कि क्या ही कहूं। इस अश्लीलता रूपी वायरस ने आपसी नि:स्वार्थ पवित्र प्रेम की दुनिया ही उजाड़ कर रख दी है। अफसोस! इस अश्लीलता नामक घातक महामारी का प्रकोप किसी को दिखाई नही देता। 

देश के जागे हुए युवाओं को ही अब अश्लीलता के विरूद्ध एक जबर्दस्त क्रांति करनी होगी कि विदेशी कपड़ों तक तो ठीक परन्तु विदेशी संस्कृति का पूर्णरूपेण अंधानुकरण ना करें? यह भी देखें कि विदेशी लोग किस तरह वृंदावन आकर भारतीय रंग में रंगे हरे कृष्ण हरे राम गाते नाचते भगवान श्री कृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। कैसे वह अयोध्या आकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, काशी विश्वनाथ के दर्शन कर भारत की पवित्र संस्कृति की गंगा में गोते लगा रहे हैं। यह बात हर भारतीय को सोचनी चाहिये कि हम विदेशी संस्कृति की नकल करते - करते उतने भी विदेशी न हो जायें कि एक दिन विदेशियों को भारत सिर्फ़ किताबों में पढ़ना और ढूंढना पड़ जाये। आप सभी सम्मानित देशवासियों! देश हमारा है और देश की संस्कृति की रक्षा करना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए कि मर्यादापुरुषोत्तम संस्कृति वाले देश में कुछ भी अमर्यादित बर्दाश्त नही करना चाहिए।













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