- समाज और हम

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद और प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना.

Monday, December 17, 2012

                   सत्य
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मिटा दे अपनी हस्ती को मिटा दे गुरुर की बस्ती को ।।
फिर बचेगा तू जिसे कई नाम मिल जायेंगें,हमेसा की तरह ।।

आकांक्षा सक्सेना  
जिला - औरैया 
उत्तर प्रदेश 

1 comment:

  1. बहुत खूब सुन्दर लाजबाब अभिव्यक्ति।।।।।।

    मेरी नई रचना
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

    ये कैसी मोहब्बत है

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