Friday, April 12, 2013

कुर्सी ....कुर्सी ......कुर्सी का नशा ......


आग बेबसी की ..
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ये कैसी बरसात है दोस्त 
न पानी न ओले है 
बरस रही ये आग सभी पर 
ये कैसे छलों के अँधेरे हैं 

ये कैसी आंधी है दोस्त 
न पत्ते उड़े न धूल उड़े 
ज़िस्मों से चुस  रहा 
लहू सभी का,
ये कैसे पिशाच लुटेरे हैं 

ये कैसी बिजली चमकी दोस्त 
न कड़कना न गिरना जाने 
इस हरक़त से मन, 
त्रस्त सभी का 
ये कैसे कुर्सी को घेरे हैं 
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आकांक्षा सक्सेना 
जिला- औरैया 
उत्तर प्रदेश 

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