समलैंगिक सम्बंधों के लिये जिम्मेदार कौन ?




उपेक्षा

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आज टी.वी चैनलों पर बड़ी बहस चल रही है समलैंगिकता पर और इस मुद्दे को मीडिया में इतना हाईलाईट किया जा रहा है जो ठीक नहीं हैं क्योंकि जब समाचार देखते समय छोटे बच्चे पूछते हैं कि इसका क्या मतलब है तो माता-पिता के पसीने छूट जातें हैं कि क्या जबाब दूँ|फिर वो ही बच्चा अपना प्रश्न किसी और से पूछकर अपनी जिज्ञासा को शांत तो कर लेता है पर अपने कोमल मन में उपजे उस वासना के अंतरद्वन्द को शांत नहीं कर पाता और वह अतत: गलत राह पर चल पड़ता है जो सिर्फ पतन की ओर ही जाती है|इस समलैंगिकता को हमने ही बढ़ावा दिया है |हमने अपने सपनों को अपने बच्चों पर जबरदस्ती थौप दिया है और इतना ही नहीं कि अपने बच्चों से अत्यधिक अपेक्षायें पालकर और सिर्फ अपने बच्चों को बढ़ता देखना और बार-बार उसे नीचा दिखाना कि तुमसे ज्यादा तो तुम्हारा दोस्त होशियार है |वो देखो ! दिन-रात पढ़ता है और सुन्दर भी | वो देखो ! सरकारी नौकरी में हैं तुम यहीं पड़े हो |वो देखो: मि. शर्मा का बेटा अमेरिका में शिफ्ट हो गया और एक हमारी किस्मत है बहुत खराब अरे !  वो तो नशीबवाले माँ-बाप हैं|ये सब जो झींटाकसी करते हैं हम हमारे बच्चों पर| यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है | इससे बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है और यह उपेक्षा ही बच्चे को गलत कार्य करने की दिशा में मोड़ देती है जहाँ से फिर उसकी वापसी सम्भव नहीं|हाँ, मानती हूँ आज का समय गलाकाट प्रतियोगिता का है तो जरूरी है हम बच्चों के सहयोगी बनें उनको प्यार करें और उनकी छोटी सी भी उपलब्धी पर उन्हें गले से लगा लें |पर, आज माता-पिता दोनो ही जब कामकाजी हैं तो टाईम ही नहीं अपने बच्चों के लिये |आज आधुनिकता इतनी हावी है कि हम स्वीकार्य ही नहीं कर पाते कि हम माता-पिता हैं और हमको कितनी जिम्मेदारी से इस रिश्ते को सींचना हैं|हद तो तब हो जाती है जब हम बच्चों को सामने आपस में लड़ते-झगड़ते,शराब पीते और अश्लील बातें,गानें और वीडियों तक देखने में परहेज नहीं करते|हम हमारे बच्चों को पैसे तो दे देतें हैं पर समय और प्यार नहीं ,मोबाईल तो दे देते हैं पर मनोबल नहीं बढ़ाते तब उसका अकेलापन नेट पर गन्दी साईट्स  जिनपर सरकार की कोई रोक नहीं उन्हें देखनेमें बीतता है और फिर अधूरी मनोदशा की चिढ़चिढ़ाहट में बच्चा बस और बस प्रेम ढ़ूढ़ता है फिर उसे वो अपने ही सहपाठी बालक या बालिका से ही क्यों न मिलें वो अपनी भावनाओं जाहिर कर पाता हैं और जो उसे सुनता है समझता है बस उसी  को प्रेम करने लग जाता है|क्या सही क्या गलत वो निर्णय नहीं कर पाता फिर|इसी तरह समाज से सताये हुऐ और पारिवारिक कलह से आहत बच्चे क्या बड़े भी फिर उस प्रेम और अपनेपन को ढूढ़ते हैं जो कि उन्हें अपने माता-पिता,सगे-सम्बंधियों और समाज से नहीं मिलता तो फिर जहाँ उन्हें अपनापन और सम्मान मिलता है प्रेम मिलता,सुकून मिलता है वो उन्हीं में कुछ ऐसे घुलमिल जाते हैं कि यह सब भूल जाते कि वो लड़का है या लड़की| वो उसे हीअपना हमदम मान कर उसी के साथ सारा जीवन जीने का का निश्चय कर बैठतें हैं और वो भी कानूनी तौर पर |अब पैरैन्ट्स को समाज को दुनियाभर को अजीब लग रहा है और हर जगह हंगामा मचा है|अरे! जब आपके पास अपने बच्चों के लिये समय ही नहीं था |तो अब ये हंगामा क्यों ?हमने अगर अब भी भारत के भावी भविष्य पर ध्यान नहीं दिया तो  इसी तरह के परिणाम सामने आयेगें| अब हम सभी को ना सिर्फ यह सब देखने बल्कि स्वीकार्य करने के लिये भी तैयार रहना पड़ेगा और या फिर हमें हमारे आघुनिक स्वभाव में परिवर्तन कर प्रकृति और प्राकृतिकता को ससमम्मान आत्मसात करना होगा तभी भारत के भावी भविष्य को सुरक्षित, सुशिक्षित और संस्कारी सच्चा भारतीय नागरिक बना सकेगें|

धन्यवाद

आपकी दोस्त
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश
ब्लोग लिंक
http://akaksha11.blogspot.com




Comments

  1. Homosexuality is natural, nobody is responsible for it, just we dont accept it. Nature is filled with variety. We have right to believe that god exists, there is no limit to belief, we are differant than animals, we have power of thinking and imagination. Any good thing can be bad for someone and bad thing can become good for someone. There are different types of society exists in world, people can make new one. Time decides everything.

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